मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

मृत्युलोक में मर मर कर जीना! : लाखों-करोड़ों लोग बीमारी में मरे या दिल्ली में नादिरशाह की तलवार से, मध्यकाल हो या आधुनिक काल, हिंदू की कलियुगि बुद्धि से ‘उफ’ भी नहीं निकलेगा। भले संविधान-संसद बना ली हो लेकिन यह सवाल-जवाब तब भी नहीं कि गंगा के शववाहिनी बनने के लिए कौन जिम्मेवार? इतनी मौतों, गुमनाम मौतों, लोगों के हजारों किलोमीटर पैदल चलने से ले कर ऑक्सीजन की कमी से फड़फड़ाते मरीजों की मौत जैसी त्रासदियों के लिए कौन जिम्मेवार? भारत कलियुगी- 18: भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि! भारत कलियुगी- 19: मृत्युलोक में मर मर कर जीना! जरा उन लोगों को याद करें जो सन् 2020-21 की महामारी में लावारिस और लाचार थे। याद करें भारत के उन लाखों लोगों को जो भयाकुल सैकड़ों किलोमीटर पैदल चले। याद करें उन परिवारों को, जिनके सदस्य संक्रमित हुए तो समझ नहीं आया करें तो क्या करें और मौत हुई तो लाश गंगा में बहा दी। यों दूसरी सभ्यताओं का भी महामारी अनुभव है मगर भारत में करोड़ों लोगों की त्रासदी के अनुभव क्या अलग नहीं? यह जो अलग फील, हकीकत है वह अपने कलियुगी वक्त का स्थायी मामला है। हम हैं ही ऐसे कि जीना भी भय, चिंता, असुरक्षा, अनिश्चितता और भगवान भरोसे है… Continue reading मृत्युलोक में मर मर कर जीना!

भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

bhaarat kaliyugee भटका स्वभाव भटकी बुद्धि : पृथ्वी क्या, मृत्युलोक। संसार क्या, सांसारिकता का झमेला। अच्छा क्या, गुजरा वक्त अपना अतीत! कर्मफल क्या, भाग्य में लिखा हुआ! विश्वास, रास्ता और विकल्प क्या, भगवानजी के शरण और जैसे रामजी रखेंगे। जीवन का लक्ष्य क्या, मृत्युलोक के दुखों से मुक्ति! कर्म किसलिए, अगले जन्म के लिए!… ऐसा स्वभाव, यह अध्यात्म सदियों की गुलामी में दिल-दिमाग, बुद्धि का कलियुगी रूपांतरण है। भारत कलियुगी-17: बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा! भारत कलियुगी- 18: लाख टके का सवाल है इक्कीसवीं सदी में हिंदू कैसे जीवन जीता है? मतलब आर्ट ऑफ लिविंग, आर्ट ऑफ बीइंग, आर्ट ऑफ डूइंग याकि जीने की कला, स्वभाव और कर्म क्या? सवाल बड़े हैं और हिसाब से इस पर वर्तमान के संदर्भ में नहीं, बल्कि पिछले तीन हजार सालों के अनुभव में विचारना चाहिए। इसलिए कि हम जैसे आज जी रहे हैं वैसे तीन हजार सालों से लगातार जीते हुए हैं। ऐसा भरतवंशियों की बनाई जीने की पद्धति, तरीके मतलब सतुयगी स्वभाव-अध्यात्म के भटकावों से है। अपना जीना कुछ विश्वासों-मान्यताओं पर जीने की प्रक्रिया और तरीका है। भरतवंशियों के दिल-दिमाग-बुद्धि का जो स्वभाव बना और वह जिन मान्यताओं-विश्वासरूपी अध्यात्म में ढला था तो उसी से आत्मा-परमात्मा, ब्रह्मज्ञान, कर्मकांड, निर्वाण के जितने दीये बने… Continue reading भटका स्वभाव-अध्यात्म और भटकी बुद्धि!

बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी दिमाग सोचता हुआ नहीं है। वह ठहरा हुआ, जड़, कुंद, मंद की उस मानसिक विकलांगता में है, जिसमें न चेतना है, न बोध-समझ के तंतु हैं और न जिज्ञासा। पूरी तरह अवैज्ञानिक चित्त, कूपमंडूक वृत्तियां और गैर-साइंटिफिक दिमाग।.. दरअसल सभ्यता का अपना सफर और इतिहास भ्रम और भटकने की कई गांठे लिए हुए है। उनसे बुद्धि बंधी हुई है, जिन्हें सुलझाने, खत्म करने का किसी भी वक्त में, किसी भी युगपुरूष के हाथों प्रयास नहीं हुआ। तभी बुद्धि कैंसर वंशानुगत ट्रांसफर होता गया। भारत कलियुगी-16: कलियुगी बीमारी और लक्षण भारत कलियुगी-17: कलियुगी हिंदू शरीर की अबूझ कैंसर गांठ बुद्धि है। दरअसल हिंदू का जीवन सफर विचित्र व उलटा रहा है! बचपन में बुढ़ापे वाले काम और जवानी में बुढ़ापा व भक्ति और गुलामी! मैं विस्तार से पहले लिख चुका हूं कि सभ्यताओं के पालने में सप्तसिंधु के भरतवंशियों की चेतना-बुद्धि गजब दौड़ी थी। उन्होंने वेद रचे। प्रकृति को साधा। सनातन जीवन पद्धति का ध्यान, चिंतन-मनन किया। स्मृति-श्रुति परंपरा में जीवन तत्वों का ज्ञान-विज्ञान-सत्य शोध किया तो वहीं नगर विकास भी सोचा। चार-पांच हजार साल पहले के उस बाल काल में गणित, विज्ञान, दर्शन, पतजंलि, चार्वाक, बुद्ध आदि की तमाम धाराएं थी। वह समझ भारत का अपूर्व बौद्धिक बल था।… Continue reading बुद्धि जड़ (जाहिल), जीवन बूढ़ा!

कलियुगी बीमारी और लक्षण

हम ओलंपिक-नोबेल-ज्ञान-विज्ञान-सत्य की वास्तविकता में गरीब, दरिद्र होने का कलियुगी जीवन लिए हुए हैं तो यह सच श्रीमद्भागवत से चला आ रहा है।…बाकी सभ्यताओं में शरीर ऐसा नहीं क्योंकि कलियुगी कैंसर के मारे सिर्फ हम हैं। बाकी सभ्यताओं ने पृथ्वी और जीवन को यदि कर्मलोक, जिंदगी के भोग का मौका माना है जबकि हिंदू दिमाग, उसका चित्त यदि पृथ्वी को मृत्युलोक व  संसार निसार की मान्यता में जीता हुहै तो हिंदू का शरीर न तो किंगकांग होगा और न दिमाग से अल्बर्ट आइंस्टीन! भारत कलियुगी-15: लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन! भारत कलियुगी-16:  आखिर कैसे बना हिंदू जीवन का अंधकार काल?  इस पर विचार से पहले जानना चाहिए कि हिंदू धर्मग्रंथों ने हमारे कलियुगी जीवन के क्या लक्षण बताए हैं? जवाब श्रीमदभागवत गीता से लेकर रामचरितमानस आदि ग्रंथों के श्लोक, चौपाई, दोहों में है। इन्हीं के आधार पर मैं हिंदू कलियुगी जीवन के डायग्नोसिस को तीन हिस्सों में बाटंता हूं- हिंदू शरीर-जीवन, हिंदू समाज-धर्म और हिंदू देश-व्यवस्था-राजनीति। इन तीनों अंगों में जीवन जीने के तरीके, दशा-दिशा के सार में ये प्रतिनिधि दस लक्षण गागर में सागर हैं- शरीर-जीवनः1- शारीरिक बल व याद्दाश्त और सत्य में दिनों दिन गिरावट (श्रीमद्भागवत,12.2.1)। 2- लोग छोटी-घटिया दृष्टि-बुद्धि वाले, अभागे, पेटू, कामी व दरिद्र होंगे (श्रीमद्भागवत,12.2.31)| धर्म-समाजः… Continue reading कलियुगी बीमारी और लक्षण

लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

तभी सदियों से चेतना का अपना ज्वालामुखी सोया हुआ, सुषुप्त है। असंख्य हमलावरों, तरह-तरह के अत्याचारों-गुलामी और सत्ता-हाकिमों की ज्यादतियों के बावजूद हिंदू चेतना का लावा कभी फटता नहीं। न बगावत, न कोई विद्रोह, न क्रांति-प्रतिक्रांति मतलब पूरी तरह अपना मृत्युलोक वह पाताल बनाए हुए है, जो हिमखंड में रचा-पका है। ऐसा बर्फीला, बेहोश दिमाग क्या तो रियलिटी बूझेगा, क्या सत्य स्वीकारेगा और क्या अपने और अपने देश को सुधारेगा। न व्यक्ति सुधर सकता है और न बाड़ा। भारत कलियुगी-14: जान लें, जीना नहीं हमारा जीना! भारत कलियुगी-15:  जैसे गुजरी सदियों में समझ नहीं थी वैसे इक्कीसवीं सदी में भी कलियुगी हिंदुओं को बोध नहीं है कि हमारा जो जीना है वह मर-मर कर जीना है। वह अपने ही बनाए मृत्युलोक का नारकीय जीवन है! कुछ लाख एलिट-शासक-हाकिम भले अलग जिंदगी जीते हों अन्यथा बतौर मनुष्य 140 करोड़ भारतीय बिना मानवीय गरिमा से जीते हुए हैं। भारत का वर्तमान, खासकर महामारी काल वह वक्त लिए हुए है, जो मानव सभ्यता के आधुनिक इतिहास में बतौर कलंक दर्ज रहेगा। एक ओर आधुनिक इक्कीसवीं सदी में पृथ्वी का इंसान अंतरिक्ष यात्रा करता हुआ तो दूसरी तरफ भारत के अमिट फोटो….शववाहिनी गंगा..गर्मी में लाखों-करोड़ों लोगों का तपती सड़कों पर पैदल घर जाना….कंक्रीट के… Continue reading लब्बोलुआबः बेसुध, बेहोश जीवन!

जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

बाकी सभ्यताओं और कलियुगी हिंदू सभ्यता का यह कैसा विकट अंतर है जो हम 140 करोड़ लोग और भारत देश मृत्युलोक में मर-मर के जीवन जीने का ख्याल लिए हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन आदि सभ्य विकसित देश और उनके लोग पृथ्वी की कर्मलौकिकता में जीवन बनाते, जीवन भोगते हुए ब्रह्माण्ड के परलोक में अपनी कॉलोनी बसाने की जीवंतता से जी रहे हैं। वे महामारी काल में भी अपने लोगों को अंतरिक्ष की यात्रा कराने स्पेस यान की टेस्टिंग करवाते हुए हैं। कलियुगी भारत-13: कोरोना मंदिर, मोदी मंदिर! भारत कलियुगी-14: इक्कीसवीं सदी का सत्य है मनुष्य की देवलोक जैसी उपलब्धियां। इस बात को हम हिंदू न मान सकते हैं और न समझ सकते हैं। तब भी कल्पना करें कि इक्कीसवीं सदी में पश्चिम के लोग क्या कुछ करते हुए हैं? जवाब है मंगल पर बस्ती बसाने, लोगों को अंतरिक्ष में घूमाने, कृत्रिम मेधा या एआई से मनुष्य जीवन स्वचालित बनाने और रोबो बना कर मनुष्य को श्रम से पूरी तरह मुक्त बना देने के प्रोजेक्ट हैं। ये ऐसे प्रकल्प हैं कि परलोक में यदि कहीं ईश्वर है तो वह मानव प्रतिभा-विकास से जलन करेगा। जानने वाली बात है कि सभ्य-विकसित देशों में मनुष्य देवलोक की कल्पनाओं को साकार बनाता हुआ है।… Continue reading जान लें, जीना नहीं हमारा जीना!

ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

महामारी का सामना कैसे हो, वक्त की चुनौतियों से कैसे पार पाएं, कैसे भविष्य बनाएं, इन सवालों का हल हिंदू चेतना में न सन् 1918-20 में था और न सन् 2021-22 में है। जैसे पशुओं-भेड़-बकरियों को बीमारी, महामारी क्या और कैसे बचें का बोध नहीं होता है वैसे ही कलियुगी भारत को नहीं है।..हम ठहरे हुए हैं, कलियुगी हिंदू मानस न कंटेम्पररी है और न चैतन्य।..21 वीं सदी की सन् इक्कीस की महामारी ठहरे कलियुगी जीवन का रिपीटेशन है, भंडारण है, फ्लैशबैक है पिछले आचरण का। कलियुगी भारत-12 वैश्विक मान्यता है इतिहास रिपीट नहीं होता। जगत में कुछ भी नहीं दोहराता। पुनरूक्ति नहीं हो सकती। लेकिन भारत और हम हिंदुओं के साथ क्या होता है? बार-बार वहीं होता है जो सदियों से चला आ रहा है। क्या आप नहीं मानते? तब जरा सन् 1918-20 बनाम सन् 2020-21 के दो महामारी काल की तुलना करें। जैसे 1918-20 में हिंदुओं ने बिना बुद्धि, बोध, अवैज्ञानिकता, लावारिस, भगवान भरोसे महामारी को झेला था वैसा क्या सन् 2020-21 में नहीं है? ऐसे मानो हमारी बुद्धि, हमारी चेतना सौ सालों में सोती हुई जड़ है, जो सन् इक्कीस के कोविड-19 के आगे भी वैसे ही बेसुध जैसे सन् अठ्ठारह में स्पैनिश फ्लू के सामने थे।… Continue reading ठहरा वक्त, रिपीट इतिहास!

बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

कलियुग ने बुद्धि-ब्रेन को छोटा बनाया है। वह गुलामी में घिस कर छोटी हुई है। गुलामी और भक्ति से पराश्रित है (जो करना है ईश्वर और उनके अवतार को करना है)। गुलाम कितना सोच सकता है? भक्त कितना पौरूषवान हो सकता है? जब मेंढ़क कुएं की टर्र-टर्र में दुनिया, देश, समाज की सत्यता सोचने-विचारने की प्रवृत्ति लिए हुए नहीं है तो उसका दिमाग कैसे बढ़ेगा? कोऊ नृप हो हमें का हानी और विश्वगुरू की आत्ममुग्धता की वृत्ति में बुद्धि जब लगातार सोती हुई है तो ब्रेन अनिवार्यतः सिकुड़ेगा ही। कलियुगी भारत-10: ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता! कलियुगी भारत-11: तथ्य है भारतीयों का मष्तिष्क, ब्रेन पश्चिमी-कॉकेशियन लोगों, फार-ईस्ट-चाइनीज-कोरियाई लोगों से छोटा है। भारतीयों का औसत ब्रेन आकार बाकी नस्लों से ऊंचाई, चौडाई, मोटाई सभी में छोटा है। यह तथ्य आईआईटी हैदराबाद द्वारा भारतीय ब्रेन एटलस के प्रोजेक्ट से है। ब्रेन एटलस न्यूरोसाइंस व कई बीमारियों के संदर्भ-इलाज की खातिर बनी है। इसके डाटा संग्रह में सबसे छोटा ब्रेन भारतीयों का है! इस जानकारी पर डार्विन की क्रमिक मानव विकास थ्योरी का सहारा लें। सिंद्धात अनुसार समय के साथ जीवधारियों का रूप-रंग, आकार-प्रकार, उनके अंग कम-ज्यादा उपयोग से बढ़ते-घिसते व खत्म होते हैं। तभी सवाल है कहीं इसी के चलते तो… Continue reading बड़े दिमाग की छोटी खोपड़ी!

‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

हमें कलियुगी हिंदू मनोविज्ञान की चीर-फाड़, ऑटोप्सी से समझना होगा कि हमने इतने देवी-देवता क्यों तो बनाए हुए हैं और इतनों को पूजते हुए भी क्यों नहीं उनका आशीर्वाद है?…सोचें इतने करोड़ देवी-देवता और जीवन का हर चक्र उन्हें समर्पित बावजूद इसके कलियुगी हिंदू ‘चित्त’ अकेले इस सूत्र का काला धागा बांधे हुए है कि सब भाग्य-नियति का नतीजा! कलियुगी भारत-9: ‘चित्त’ की मनोवैज्ञानिक ऑटोप्सी में वक्त! कलियुगी भारत-10: पता नहीं किस मोड़ पर हिंदुओं के 33 करोड़ देवी-देवताओं का कलियुगी शिलालेख बना। मैं इसे मृत्यु दर घटाने और भारत में जनसंख्या विस्फोट वाली बीसवीं सदी के विज्ञान से पहले का मोड़ मानता हूं। कलियुग में हिंदुओं का एक वह वक्त था, जब जितने बच्चे पैदा होते थे उसमें से ज्यादातर मर जाते थे। मुगल काल से अंग्रेजों के वक्त में हिंदुस्तान की आबादी का आंकड़ा दस से पैंतीस करोड़ के बीच अनुमानित है। मेरा मानना है अंग्रेज लोग आबादी, धर्म, रहन-सहन के अधिक जिज्ञासु थे तो उन्हीं ने 18वीं सदी में तुक्का बनाया कि जितने हिंदू उतने भगवान! अंग्रेजों के 18वीं सदी के बनारस वृतांत में यह आश्चर्य है कि जिधर जाओ उधर देवी-देवता और मूर्तियां। आज भी जब जिंदा साधु-संत-प्रवचक अपने को भगवान बताते हुए हैं तो दो सौ साल… Continue reading ‘चित्त’ से हैं 33 करोड़ देवी-देवता!

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