मजबूरी में सही कदम

जब यूपीए सरकार ने ये प्रावधान किया, तो भाजपा ने उसे टैक्स आतंकवाद कहा था। मगर विदेशी कंपनियों के मामले में अगर ऐसा प्रावधान आतंकवाद है, तो आखिर देश के नागरिकों के लिए ऐसा कैसे नहीं है? फिर इस आतंकवाद को भाजपा सरकार ने अपने शासनकाल में सात साल तक क्यों जारी रखा?

रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स और चिदंबरम की खुशी

कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम बहुत खुश हैं। उन्होंने सार्वजनिक रूप से खुशी का इजहार किया है। केंद्र सरकार ने रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स लगाने वाले नियम को बदल दिया है।

रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स कानून खत्म होगा

केंद्र सरकार रेट्रोस्पेक्टिव टैक्स यानी पिछली तारीख से टैक्स लगाने के लिए बनाए गए कानून को खत्म करने जा रही है। इसे खत्म करने के लिए एक विधेयक संसद में पेश किया गया है।

स्वभाषाओं का स्वागत लेकिन….?

यह खुश खबर है कि देश के आठ राज्यों के 14 इंजीनियरिंग कालेजों में अब पढ़ाई का माध्यम उनकी अपनी भाषाएँ होंगी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की पहली वर्षगांठ पर इस क्रांतिकारी कदम का कौन स्वागत नहीं करेगा?

संघ परिवार:  इस्लाम व मुस्लिमों पर विचार

संघ प्रवक्ताओं के अनुसार, मुख्य समस्या व्यवहारिक है। जिहाद का इतिहास भी कोई मुद्दा नहीं है। इसलिए, मुसलमानों को यह संदेश दें कि उन्हें बाबर और औरंगजेब की विरासत से बचना चाहिए, और राष्ट्रवादी विरासत में आना चाहिए। यही समाधान है। इस्लामी मतवाद कोई समस्या है ही नहीं।

आयकर विभाग के दैनिक भास्कर समूह के छापे पर आया सीएम गहलोत का रिएक्शन, कही ये बात…

मोदी सरकार अपनी रत्तीभर आलोचना भी बर्दाश्त नहीं कर सकती है. यह भाजपा की फासीवादी मानसिकता है जो लोकतंत्र में सच्चाई का आइना देखना भी पसंद नहीं करती.

जात के कैक्टस से खलास किडनी!

पहले हिंदू-सिक्ख, फिर हिंदुओं के भीतर जातिय झगड़े और उसके बाद मंदिर यात्रा में हिंदू बनाम मुस्लिम के जितने घाव बने है वे हमें कहां ले आए है? देश के नेतृत्व और जनमानस का अब जैसा मानसिक स्तर है वह कुल मिलाकर क्या यह सत्य लिए हुए नहीं है कि हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा!

सबके लिए एक-जैसा कानून कब बनेगा?

uniform code of conduct : दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक बार फिर मांग की है कि सरकार देश के नागरिकों के लिए समान आचार संहिता ( uniform code of conduct  ) बनाए और संविधान की धारा 44 में जो अपेक्षा की है, उसे पूरा करे। समान आचार संहिता का अर्थ यह नहीं है कि देश के 130 करोड़ नागरिक एक ही भाषा बोलें, एक ही तरह का खाना खाएं या एक ही ढंग के कपड़े पहनें।उस धारा का अभिप्राय बहुत सीमित है। वह है, शादी, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने आदि की प्रक्रिया में एकता। भारत में इन मामलों में इतना अधिक पोगापंथ और रूढ़िवाद चलता रहा है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया था। इसलिए 1955 में हिंदू कोड बिल पास हुआ लेकिन यह कानून भी कई आदिवासी और पिछड़े लोग नहीं मानते। वे अपनी घिसी-पिटी रूढ़ियों के मुताबिक शादी, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने के अपने ही नियम चलाते रहते हैं। वे अपने आप को हिंदू कहते हैं लेकिन हिंदू कोड बिल को नहीं मानते। Corona Update: दुनिया में बढ़ रहा है कोरोना, सबूत हैं कि महामारी अभी खत्म नहीं हुई इसी तरह का एक तलाक का मुकदमा दिल्ली उच्च न्यायालय में आया हुआ था। उच्च न्यायालय… Continue reading सबके लिए एक-जैसा कानून कब बनेगा?

राज्यपालों के तबादले, नियुक्तियों की तैयारी

modi government transfer : केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में फेरबदल को लेकर चल रही अटकलों के बीच खबर है कि सरकार कुछ राज्यपालों के तबादले और कुछ नई नियुक्तियों की सिफारिश राष्ट्रपति को करने वाली है। कुछ राज्यों में राज्यपाल, उप राज्यपाल, प्रशासक आदि के पद खाली हैं। कुछ जगह खाली होने वाले हैं और कुछ जगहों पर राज्यपालों का कार्यकाल पूरा हो गया है लेकिन वे अपने पद पर काम कर रहे हैं। तभी कहा जा रहा है कि अगले कुछ दिन में इसकी घोषणा हो सकती है। मंत्रीजी का रुतबा.. रेलमंत्री ने आते ही इंजीनियर से कहा कि आप मुझे सर नहीं बॉस बोलोगे मिजोरम की राज्यपाल और लंबे समय तक राज्यसभा में उप सभापति रहीं नजमा हेपतुल्ला का कार्यकाल इसी महीने 24 जुलाई को खत्म हो रहा है। उनकी जगह नया राज्यपाल नियुक्त हो सकता है। अगले महीने जगदीश मुखी का कार्यकाल भी पूरा होगा। उनको अगस्त 2016 में अंडमान निकोबार का उप राज्यपाल बनाया गया था और अक्टूबर 2017 में असम का राज्यपाल बनाया गया। जानकार सूत्रों का कहना है कि हरियाणा और एक-दो और राज्यों के राज्यपालों का तबादला हो सकता है। मोदी की नई कैबिनेट के 90 प्रतिशत मंत्री करोड़पति हैं, 42% पर… Continue reading राज्यपालों के तबादले, नियुक्तियों की तैयारी

एक्सटेंशन वाले अफसरों के सहारे सरकार

modi government extension officers : भारत सरकार का कार्यकाल तो पक्का है और पूर्ण बहुमत भी है लेकिन सरकार एक्सटेंशन यानी सेवा विस्तार पाए अधिकारियों के सहारे ही चल रही है। सरकार के थोड़े से अधिकारियों को छोड़ दें तो ज्यादातर महत्वपूर्ण विभागों के अधिकारी सेवा विस्तार पर चल रहे हैं। भारत सरकार की नीतिगत दिशा तय करने वाली सर्वोच्च संस्था यानी नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी,  सीईओ अमिताभ कांत को एक साल का सेवा विस्तार दिया गया। यह उनका तीसरा सेवा विस्तार है। अब वे जून 2022 तक सीईओ बने रहेंगे। यह भी पढ़ें: अतिरिक्त प्रभार वाली शासन व्यवस्था भारत सरकार के सबसे बड़े कानून अधिकारी यानी अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल भी सेवा विस्तार पर चल रहे हैं। उनको दूसरा सेवा विस्तार मिला है। उनका पहला सेवा विस्तार जुलाई 2020 में खत्म हुआ था और दूसरे अभी खत्म हुआ। लेकिन सरकार ने उनको एक साल का सेवा विस्तार दिया है। वे अगले साल जुलाई तक अटॉर्नी जनरल रहेंगे। कुछ ही दिन पहले भारत सरकार ने देश की दो सबसे बड़ी खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों को एक-एक साल का सेवा विस्तार दिया। रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ के प्रमुख सामंत गोयल और खुफिया ब्यूरो यानी आईबी के प्रमुख… Continue reading एक्सटेंशन वाले अफसरों के सहारे सरकार

वे काले दिन बनाम ये अच्छे दिन

जनतंत्र को अपने ठेंगे पर रखे घूम रहे लठैतों के इस दौर में इंदिरा जी का कद तो और भी सौ गुना बढ़ जाता है। इसलिए 46 साल पहले के आपातकाल के 633 दिनों पर खूब हायतौबा मचाइए, मगर पिछले 2555 दिनों से भारतमाता की छाती पर चलाई जा रही अघोषित आपातकाल की चक्की के पाटों को नज़रअंदाज़ मत करिए। दिल पर हाथ रखकर बताइए कि आज आप के कितने मौलिक अधिकार सचमुच शेष रह गए हैं? गंगा जल हाथ में ले कर पूरी ईमानदारी से बताइए कि वे दिन तो चलिए काले थे, लेकिन ये ‘अच्छे दिन’ कैसे हैं? यह भी पढ़ें: लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर Indira Gandhi Emergency : हर साल आपातकाल की सालगिरह पर चूंकि उन ‘काले दिनों’ पर हाय-हाय करने का दस्तूर है, इसलिए इस बार जब 46 साल पूरे हो गए हैं, मैं भी आप से कुछ गुज़ारिश करना चाहता हूं। इसलिए कि इन साढ़े चार दशकों में यह धारणा बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी गई है कि जनतंत्र से इंदिरा गांधी का कोई लेना-देना था ही नहीं। 1975 के बाद जन्म लेने वाली पीढ़ी को तो यह सिखाने में कोई कसर छोड़ी ही नहीं गई है कि इंदिरा जी… Continue reading वे काले दिन बनाम ये अच्छे दिन

लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर

क्या कभी आप ने सोचा कि प्रेमचंद, अमृता प्रीतम, कमलेश्वर और खुशवंत सिंह ने जन्म लेना क्यों बंद कर दिया? कबीर-रहीम तो छोड़िए; रवींद्र नाथ टैगोर, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह दिनकर भी अब क्यों पैदा नहीं होते? मीर और ग़ालिब को जाने दीजिए; फ़िराक़ गोरखपुरी, साहिर लुधियानवी और बशीर बद्र तक अब जन्म क्यों नहीं लेते? कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, पंडित रविशंकर और एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी के गुण-सूत्र अब क्यों दिखाई नहीं देते? होमी जहांगीर भाभा और हरगोविंद खुराना के बाद हमारे विज्ञान-जगत की गर्भधारण क्षमता को क्या हो गया है? यह भी पढ़ें: सिंहासन-सप्तपदी के सात बरस बाद क्या आप ने कभी सोचा कि सियासत रेगिस्तानी क्यों होती जा रही है? छोटे हों या बड़े, जो राजनीतिक दल पहले हरे-भरे गुलमोहर हुआ करते थे, अब वे बबूल के ठूंठों में तब्दील क्यों होते जा रहे हैं? तमाम उठापटक के बावजूद अंतःसंबंधों का जो झरना राजनीतिक संगठनों के भीतर और बाहर बहता था, उसकी फुहारें सूखती क्यों जा रही हैं? परिवार और कुनबा-भाव आपसी छीना-झपटी की हवस से सराबोर क्यों होता जा रहा है? वैचारिक सिद्धांतों पर आधारित पारस्परिक जुड़ाव की ओस-बूंदें मतलबपरस्ती के अंगारों में क्यों बदलती जा रही हैं? आंखों का परिस्थितिजन्य तिरछापन नफ़रत के… Continue reading लुच्चों, टुच्चों, नुच्चों, कच्चों का धमाचौकड़ी दौर

संघ परिवार:  संगठन या सराय?

तो यह संगठन किस का है, जिसे हिन्दू समाज पर पड़ती चोटों से तिलमिलाहट नहीं होती? उत्तर है – केवल अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं का, बस अपना हितचिंतक। तुलना करें:  चर्च, इस्लामी हितों को छूते ही देश में छोटे-बड़े क्रिश्चियन/मुस्लिम नेता फौरन, सड़क से संसद, हर जगह चीखते-चिल्लाते सिर पटकते हैं। बेपरवाह कि उन के पास क्या संगठन, कितने सांसद, विधायक हैं या नहीं हैं। वे सीधे अपने को झोंकते हैं। संघ परिवार का सारा जोर ‘संगठन’ पर है। शाखा, प्रकल्प, सम्मेलन, संस्थान, भवन, आदि। किन्तु इन के कामों में कोई एकता या संगति शायद ही होती है। एक उदाहरण उन के नेताओं में परस्पर अविश्वास-ईर्ष्या-द्वेष भी है। मानो वे किसी सराय में हों। जहाँ अलग-अलग लोग अपने-अपने अच्छे, बुरे, अनर्गल काम करते रहें। संघ को ‘परिवार’ कहना भी वही है। आखिर मोहनदास, देवदास, हरिलाल, तीन तरह के चरित्र एक ही परिवार के थे। इसे भी पढ़ें : संघ-परिवार: बड़ी देह, छोटी बुद्धि फिर, संघ ‘हिन्दू’ संगठन होने से इंकार करता है। अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हुए मुसलमानों का भी नेता होने का मंसूबा पालता है। जो गाँधीजी ने किया था और हिन्दुओं को अपनी जेब में समझा था, कि ये कहाँ जाएंगे! इस प्रकार, हिन्दू समाज बिलकुल नेतृत्व-हीन है। इसीलिए हर… Continue reading संघ परिवार: संगठन या सराय?

मोदी है तो मुमकिन है: आप मत लेना दिवाली में चाइनीज लाइट, भले सरकार चीन से करती रहे रिकार्ड आयात ( आंकड़ों पर बात)

देश में मोदी सरकार के आने के बाद से भारत-पाकिस्तान और भारत-चीन के रिश्ते को लेकर समय-समय पर विवाद चिढ़ता रहा है. आपके पास भी तो दिवाली में चाइनीस लाइट नहीं खरीदने के मैसेज तो व्हाट्सएप पर आए होंगे. लेकिन आज हम आपको जो बताना जा रहे हैं यह सुनकर आपको भी धक्का लग सकता है. यह तो सबको पता है कि भारत और चीन के बीच गहरा व्यापारिक संबंध है. इसके बाद भी देश के लोगों को चुनाव के समय देश के लोगों को बरगलाने की कोशिश की जाती है. ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि चीन से आयात कभी कम हुआ ही नहीं बल्कि साल दर साल बढ़ता ही गया है. आंकड़ों के अनुसार 2018 19 देश में कुल आयात का 13.6% हिस्सा चीन का था. इसके बाद 2019-20 में या आंकड़ा बढ़कर 13.73% हो गया. अब शायद आपको भी झटका लग सकता है कि 2020-21 में यहां पड़ा सर्वाधिक 16.92% पहुंच गया. मतलब साफ है देश की सरकार चीनी सामानों का विरोध से दिवाली और चुनाव के समय करना चाहती है जिससे उनके वोट बैंक में विस्तार हो सके. चीन की ग्रोथ रेट बढ़ाने में भारत का बड़ा योगदान 2022 की आखिरी तिमाही जनवरी-मार्च में भारत… Continue reading मोदी है तो मुमकिन है: आप मत लेना दिवाली में चाइनीज लाइट, भले सरकार चीन से करती रहे रिकार्ड आयात ( आंकड़ों पर बात)

राजद्रोहः दुआ और रामदेव

भारत में राजद्रोह एक मजाक बनकर रह गया है। अभी तीन-चार दिन पहले ही सर्वोच्च न्यायालय ने आंध्र के एक सांसद के खिलाफ लगाए राजद्रोह के मुकदमे के धुर्रे बिखेरे थे। अब राजद्रोह को दो मामलों पर अदालतों की राय सामने आई है। सर्वोच्च न्यायालय ने पत्रकार विनोद दुआ के मामले में और बाबा रामदेव के मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने इन दोनों पर राजद्रोह का मुकदमा ठोकने वालों की खूब खबर ली है। जो लोग किसी पर भी राजद्रोह का मुकदमा ठोक देते हैं, उन्हें या तो राजद्रोह शब्द का अर्थ पता नहीं है या वे भारत के संविधान की भावना का सम्मान करने की बजाय अंग्रेजों के राज की मानसिकता में जी रहे हैं। उन्होंने अपने अहंकार के फुग्गे में इतनी हवा भर ली है कि वह किसी के छूने भर से फटने को तैयार हो जाता है। विनोद दुआ और रामदेव का अपराध क्या है ? दुआ ने मोदी की आलोचना ही तो की थी, शाहीन बाग धरने और कश्मीर के सवाल पर और रामदेव ने एलोपेथी को पाखंडी-पद्धति ही तो कहा था। इसमें राजद्रोह कहां से आ गया ? यह भी पढ़ें: किसे राजद्रोह कहें और किसे नहीं ? क्या इन दोनों के बयान से… Continue reading राजद्रोहः दुआ और रामदेव

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