‘एथनिक क्लींजिंग’ का सियासी प्री-प्लान

कश्मीर घाटी ऐसे किरदारों, ऐसे सियासतदानों से कलंकित है, जिसमें कोई कश्मीरियत से भले प्रधानमंत्री बना हो लेकिन कुल मिलाकर वह धोखेबाज प्रमाणित हुआ। जिसे भारत का गृह मंत्री बनने का मौका मिला उसके हाथ भी जन सफाए-संहार याकि ‘एथनिक क्लींजिंग’ के खून से रंगे हुए।

हिंदूओं को भगवाने की भूमिका शेख की!

यदि हिंदू राज में हर शाख पर उल्लू के अंदाज में घाटी हैंडल हुई है तो भला आईएसआई का इस्लामियत रंग क्यों नहीं चढ़ेगा? कश्मीर में एक तरफ शेख अब्दुल्ला की गिरफ्तारी (1953 में) के बाद श्रीनगर में जहां कठपुतली मुख्यमंत्री थे तो दूसरी और कश्मीरी मुसलमानों का दिल-दिमाग जीतने की आईएसआई की जमीनी कोशिशें थीं।

उफ! हर शाख पर उल्लू ….

आजाद भारत का कश्मीर अनुभव इस एक वाक्य में है- भारत राष्ट्र-राज्य, उसके हिंदू नेता डरे और भागते हुए, जबकि कश्मीरी मुसलमान संविधान, धर्मनिरपेक्षता, जम्हूरियत, इंसानियत और कश्मीरियत को अल्लाह हो अकबर के नारे से खारिज करता हुआ

नेहरू को धोखा या शेख को?

कश्मीर अनुभव धोखे और विश्वासघात से तरबतर है। न केवल नेताओं, एजेंसियों, अफसरों ने देश, धर्म और कौम को गुमराह किया व लूटा, बल्कि धोखे में दोस्ती भी कुरबान! हां, पंडित नेहरू और शेख अब्दुल्ला की दोस्ती में विश्वासघात वह वाकया है, जिससे अंततः कश्मीरियत, इंसानियत, धर्मनिरपेक्षता भी कुरबान हुई।

उफ! शेख का हिंदुओं से वह खेला!

कश्मीर मामले को नेहरू-पटेल संभालते थे तो गांधी बोलते हुए थे। वे हर मोड़ पर राय देते थे। तीनों जिन्ना-लियाकत अली की रणनीति को समझ नहीं पाए। जिन्ना ने रियासत के जम्मू क्षेत्र में हिंदू-मुस्लिम हिंसा का ऐसा भंवर बनवाया कि महाराजा, नेहरू, पटेल और गांधी सभी उसी में उलझे।

भोले हिंदू नेता, शेख को बनाया शेर!

 शेख अब्दुल्ला शेर-ए-कश्मीर कहलाए। क्यों? इसका अधिकारिक खुलासा नहीं है। तथ्य है न उनके कारण राजशाही खत्म हुई और न वे और उनके कार्यकर्ता पाकिस्तानी हमलावरों को ललकारने, कबाईलियों को रोकने जैसी बहादुरी की दास्तां लिए हुए हैं।

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