आईबीएम के भारत व द. एशिया एमडी बने संदीप पटेल

आईबीएम कंपनी ने आज भारत और दक्षिण एशिया (आईएसए) के संचालन के लिए संदीप पटेल को प्रबंध निदेशक (एमडी) के रूप में नियुक्त करने की घोषणा की है।

बिना बने, लड़े, जीये ही निर्वाण!

इस पहेली का कोई जवाब नहीं है। और मुझे नहीं लगता कि हमारी सभ्यता की एंथ्रोपोलॉजी कभी इसका जवाब तलाश भी सकेगी। पहेली मतलब भला कैसे सिंधु नदी घाटी के सभ्यतागत पालने ने भारत के होमो सेपियंस को शिकारी से शिकार में तब्दील किया?

सीबीआरई ने भारत में लांच किया फाउंडेशन

नई दिल्ली। रियल एस्टेट कंसल्टिंग कंपनी सीबीआरई साउथ एशिया प्राइवेट लिमिटेड ने पांच करोड़ रुपए के कोष के साथ भारत में अपने फाउंडेशन सीबीआरई केयर्स को लांच करने की घोषणा की है। कंपनी ने मंगलवार को कहा कि देश भर के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवासी मजदूरों की स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधी समस्याओं के समाधान के उद्देश्य से सीबीआरई केयर्स को लांच किया गया है। सीबीआरई इंक के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी रॉबर्ट ई. सुलेंटिक और समूह के भारत, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और अफ्रीका के अध्यक्ष एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी अंशुमन मैगज़ीन ने सीबीआरई केयर्स के भारतीय संस्करण सीबीआरई केयर्स- एक पहल को लांच किया। कंपनी ने कहा कि बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर और उनके परिवार निर्माण कार्य में शामिल होते हैं, जिन्हें मूल स्वास्थ्य सेवाएं तक नही मिल पातीं। वे कुपोषण, असुरक्षित एवं गैर-हाइजीनिक वातावरण की समस्याओं से जूझते रहते हैं और उनमें इन विषयों को लेकर जागरुकता की कमी होती है। प्रवासी मजदूरों और उनके परिवार के सदस्यों के लिए मूल स्वास्थ्य सेवाओं की इन खामियों को दूर करने के लिए ही ‘एक पहल’ की शुरूआत की गई है।

बिखरी सभ्यता में राज  की गायब इंद्रियां!

अपने डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कल फिर लिखा कि बने एक वृहद आर्यावर्त! कई हिंदू विचारक, महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया से ले कर तमाम तरह के सेकुलरअपने-अपने अंदाज में यह साझा सपना लिए रहे थे या लिए हुए हैं कि दक्षिण एशिया एक साझा चूल्हा है।

लंदन में नए दक्षिण एशिया का सपना

लंदन के दस दिन के प्रवास में ‘दक्षिण एशियाई लोक संघ’ (पीपल्स यूनियन ऑफ साउथ एशिया) का मेरा विचार जड़ पकड़ता लगता है। पड़ौसी देशों के ही नहीं, ब्रिटेन और इजरायल के भद्र लोगों ने भी सहयोग का वादा किया है। उनका कहना था कि इस तरह के क्षेत्रीय संगठन दुनिया के कई महाद्वीपों में काम कर रहे हैं लेकिन क्या वजह है कि दक्षिण एशिया में ऐसा कोई संगठन नहीं है, जो इसके सारे देशों के लोगों को जोड़ सके।

लंदन की ताजा एक झलक 

अब से ठीक 50 साल पहले मैं लंदन पहली बार आया था। उस समय यहां गांधीजी की जन्म शताब्दि (1969) मन रही थी। कई देशों के गांधी भक्त इकट्ठे हुए थे। उनमें मैं सबसे छोटा था लेकिन मुझे भी उस सम्मेलन में बोलने के लिए कहा गया था। इस बार शायद 8-10 साल बाद मेरा लंदन आना हुआ है। वह सिर्फ गांधीजी के डेढ़ सौ साल मनाने के लिए।

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