यूरोप को बाइडेन से उम्मीदें

यूरोपीय नेताओं की प्रतिक्रियाओं से जाहिर है कि नए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से उन्हें बड़ी उम्मीदें हैं। यूरोपीय संघ के नेताओं को आशा है कि यूरोप- अमेरिका के संबंध अब पहले जैसे हो जाएंगे।

बाइडेन की मोदी से क्या पटेगी?

नहीं। वैसे कतई नहीं जैसे डोनाल्ड ट्रंप से पटी थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परिस्थितिजन्य, वक्त की राम मिलाई जोड़ी थे। यह अलग बात है कि बावजूद इसके डोनाल्ड ट्रंप से भारत का भला नहीं हुआ।

झूठ नहीं जीता!

बीस जनवरी को दुनिया के हर कोने में सत्य का विश्वासबना। न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया से लेकर यूरोप, ब्रिटेन, जापान, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, लातिनी अमेरिका आदि के सभ्य समाज, सत्यवादी दुनिया, मीडिया में जो बाइडेन के शपथ के बैनर हेडिंग इस भाव में छपे मानो झूठ से मुक्ति तो लोकतंत्र अनमोल, नाजुक, पर विकट घड़ी में जीत अंततः लोकतंत्र की

पर झूठ तो बेशर्म व नीच!

डोनाल्ड ट्रंप ने लोकतंत्र परंपरा का लोकव्यवहार, सामान्य सद्भाव भी नहीं दर्शाया। लेकिन यह आर्श्चयजनक इसलिए नहीं है क्योंकि झूठ और नीचता में जिनका जीवन ढला होता है वे सोच नहीं सकते हैं कि क्या पाप है और क्या पुण्य

आगामी यथार्थ का शिला-पूजन

आपको दिख रहा है या नहीं कि वैश्विक सियासत के समंदर में प्राकृतिक न्याय की लहरें उफ़नने लगी हैं। जो बाइडन का आना और डॉनल्ड ट्रंप का जाना अमेरिका में ही नहीं, पूरे संसार में नए वसंत के आगमन का क़ुदरती पैग़ाम है।

अमेरिकी लोकतंत्र और बाइडेन का भाषण

जो बाइडेन ने अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद जो भाषण दिया वह कई मायने में ऐतिहासिक था। हम भारत के लोगों के लिए इतने भर से वह ऐतिहासिक हो गया कि भारतवंशी विनय रेड्डी ने वह भाषण तैयार किया था।

भारत व अमेरिका का फर्क

अपने सुधी पाठक परेश ने राष्ट्रपति जो बाईडेन की शपथ के बाद पाठिकाजी की एक प्रतिक्रिया भिजवाई जिसका भाव है कि अमेरिका बोरिग देश है। जो बाईडेन को भारत से सीखना चाहिए।

बाइडेन और ट्रंप का फर्क

अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति जो बाइडेन और विदा हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भाषणों में ठीक वैसा ही फर्क है, जैसा दोनों के व्यक्तित्व में है। ट्रंप अमेरिकी इतिहास के सबसे कलंकित राष्ट्रपति हैं तो बाइडेन अमेरिका की उज्ज्वल-धवल उम्मीदों के प्रतीक हैं।