कानून व्यवस्था या बदले की कार्रवाई

देश में कानून का राज चलेगा या जंगल राज होगा? न्याय होगा या बदले की कार्रवाई होगी? इसके जवाब से तय होगा कि आने वाले दिनों में एक देश और सभ्य समाज के नाते भारत का भविष्य क्या होगा।

पुलिस की वहीं पुरानी कहानी

भारत के चाहे किसी राज्य की पुलिस हो उसके पास हर चीज के टेंपलेट बने हुए हैं। वह जिस बात को चाहे जस्टिफाई कर सकती है और बिल्कुल एक जैसे तर्क से।

उंगलियों के पोरों से बहती क्रांति के युग में

विकास दुबे को तो मारा जाना ही था। आज नहीं तो कल। अगर कोई इतने पुलिस वालों को मार देने की घटना का केंद्रीय पात्र हो तो वह कितने दिन अपनी जान बचा सकता है? जो भी ऐसा करेगा, भरेगा। इसमें कौन-सा मानव-अधिकार? अगर अपराधियों के मानवाधिकार हैं तो सुरक्षाकर्मियों के भी मानवाधिकार हैं। इसलिए एक ऐसे व्यक्ति के अंत पर दीदे बहाने का कोई मतलब नहीं है, जो अलग-अलग राजनीतिकों और प्रशासनिक अफ़सरों के बूते इतना बेख़ौफ़ हो गया था कि सारी व्यवस्था को अपने ठेंगे पर रख कर घूम रहा था। अगर बिकारू जैसे बित्ते भर के गांव से निकल कर दस बरस के भीतर कोई विकास दुबे अरबपति भी बन जाए और उसका गब्बरपन भी सारी हदें पार करने लगे तो आख़िर एक-न-एक दिन तो उसका यह अंजाम होना ही था। इसलिए जिन्हें अब उससे ज़रा सहानुभूति जैसी हो रही है, मुझे उन पर तरस आ रहा है। उसके लिए मन गीला करने वाले उससे कम बड़े खलनायक नहीं हैं। वह किसी के आंसुओं का हक़दार नहीं है। आंसू तो बहने चाहिए उस व्यवस्था पर, जो विकास दुबेओं को जन्म देती है, पालती-पोसती है, इस्तेमाल करती है और चूस लेने के बाद थोथे की तरह उड़ा देती… Continue reading उंगलियों के पोरों से बहती क्रांति के युग में

कार नहीं पलटी, सरकार पलटने से बचाई है: अखिलेश

उत्तर प्रदेश पुलिस के मोस्टवांटेड अपराधी विकास दुबे की पुलिस अभिरक्षा में मुठभेड़ के दौरान हुयी मौत पर सवाल खड़े करते हुये विपक्ष ने सरकार पर प्रहार करने शुरू कर दिये हैं।

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