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स्वस्थ जीवन का गुरुमंत्र है उपवास

नई दिल्ली। भारतीय धार्मिक रीति-रिवाजों में कई अवसरों पर किये जाने वाले व्रत की परम्परा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किये गये शोध में वैज्ञानिक आधार मिला है। चिकित्सकों ने दावा किया है कि उपवास रखने से कैंसर समेत कई गंभीर बीमारियों से बचाव हो सकता है और लंबा एवं स्वस्थ जीवन जिया जा सकता है।

विश्व के कई देशों की संस्कृति में भी उपवास का प्रचलन है और हर जगह इसके मायने अलग-अलग हैं। आम लोग धर्म और तीज-त्योहारों का हिस्सा मानकर उपवास की संस्कृति का पालन करते रहे हैं, लेकिन विज्ञान इसे गंभीर बीमारियों के खिलाफ ‘घातक’हथियार के रुप में देख रहा है।

आज भी देश में ऐसे कई बुजुर्ग मिल जायेंगे जो 90 की उम्र पार कर गये हैं और किसी तरह की दवा नहीं लेते हैं। यह जीवन शैली से जुड़ी उपलब्धि है जिनमें उपवास भी एक महत्वपूर्ण कारक है और यह वर्तमान पीढ़ी के उलट है, जहां बच्चे भी उच्चरक्त चाप, मधुमेह, दिल का दौरा आदि गंभीर रोगों के शिकार हो रहे हैं। चिकित्सा के लिए वर्ष 2016 के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित जापान के जीवविज्ञानी योशिनोरी ओसुमी ने ऑटोफैगी की प्रक्रिया की खोज की है।

उन्होंने शोध किया है कि मानव शरीर की कोशिकाएं किस तरह, क्षतिग्रस्त एवं कैंसर समेत कई बीमारियों के जिम्मेदार कोशिकाओं को स्वयं नष्ट करती हैं। स्वास्थ्य के लिए उत्तम ‘तंदुरुस्त’ कोशिकाओं का पुनर्निर्माण करती है और उन्हें ऊर्जावान बनाती हैं। यह प्रक्रिया ‘ऑटोफैगी’ कहलाती है। योशिनोरी को ऑटोफैगी की प्रक्रिया की खोज के लिए नोबल पुरस्कार दिया गया है। नोबल पुरस्कार की घोषणा के समय ज्यूरी ने जापानी जीवविज्ञानी के शोध पर प्रकाश डालते हुए कहा था,“इस प्रक्रिया में कोशिकाएं खुद को खा लेती हैं और उन्हें बाधित करने पर पार्किंसन एवं मधुमेह जैसी बीमारियां हो सकती हैं।

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ऑटोफैगी जीन में बदलाव से बीमारियां हो सकती हैं। इस प्रक्रिया के सही तरह से नहीं होने से कैंसर तथा मस्तिष्क से जुड़ी कई गंभीर बीमारियों की आशंका कई गुना बढ़ जाती हैं। ‘ऑटोफैगी’ ग्रीक शब्द है। यह शब्द ‘ऑटो’ और ‘फागेन’ से मिलकर बना है। ऑटो का मतलब है ‘खुद’ और ‘फागेन’ अर्थात खा जाना।

इस शोध से भारतीय संस्कृति के वैज्ञानिक हाेने की काफी हद तक पुष्टि होती है और संभवत: ऋषि-मुनियों इसके महत्व को समझ कर ही कई-कई साल तक अन्य त्यागे और लंबी आयु पायी। शोध के अनुसार उपवास करने से ऑटोफैगी की प्रक्रिया बढ़ती है। ‘द नेचर डाइरेक्ट’ की रिपोर्ट के अनुसार इस ऑटोफैगी की प्रक्रिया में कोशिकाएं प्रोटीन और अन्य कोशिका अवयव को तोड़ती हैं और उनसे ऊर्जा प्राप्त करती हैं। इस दौरान कोशिकाएं वायरस और बैक्टेरिया को खत्म करती हैं।

इस प्रक्रिया में क्षतिग्रस्त एवं बीमार कोशिकाएं नष्ट होती हैं और ‘अनुशासनहीन’ होकर बढ़ने वाली कैंसरकारक काेशिकाओं पर भी लगाम लगता है।  उपवास के अलावा व्यायाम समेत स्वस्थ्य जीवन के लिए उठाये जाने वाले कई कदमों से शरीर के कई हिस्सों की कोशिकाओं में ऑटोफैगी की प्रक्रिया बढ़ती है। कोशिकाओं के स्वास्थ्य के लिए ऑटोफैगी की प्रक्रिया बेहद आवश्यक है। वैज्ञानिकों का दावा है कि 12 से 24 घंटे तक का उपवास कोशिकाओं को ऑटोफैगी की प्रक्रिया शुरू करने में मददगार होता है और इस प्रक्रिया में स्वस्थ्य एवं लंबी उम्र की ‘संजीवनी’ छिपी है।

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जर्मनी के दो प्रतिष्ठित संस्थानों-डीजेडएनई और हेल्महोल्ज सेंटर के साझा शोध में भी उपवास के कई फायदा गिनाये हैं। वैज्ञानिकों ने चूहों के दो समूहों पर उपवास का प्रयोग किया। जिन चूहों को उपवास कराया गया था उनके शरीर में कैंसरकारक कोशिकाओं की नष्ट होने की प्रक्रिया तेज पायी गयी।

लॉस एंजिल्स स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ सर्दन कैलिफोर्निया में लॉन्जेविटी इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ़ वाल्टर लोंगो ने बताया कि यूनान के इकारिका द्वीप के लोगों की लंबी आयु का राज ‘उपवास’ में छिपा है। विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक मौकों पर वे लोग साल मेंं कम से कम 150 बार उपवास रखते हैं। डॉ़ लोंगो ने कहा,“ हमें उपवास करने से पहले अपने चिकित्सक से जरूर बात करनी चाहिए। कई अनुसंधानों में साबित हुआ है कि मस्तिष्क और शरीर दोनों के लिए उपवास ‘अमृत तुल्य’ है।

उपवास खून में ग्लूकोज का स्तर नियंत्रित रखने ,सूजन घटाने, मोटापे से मुक्ति दिलाने और मस्तिष्क की कार्यप्रणाली को तंदुरूस्त करने समेत हमें मानसिक और शरीरिक रुप से स्वस्थ्य रखने की दिशा में कई महत्वपूर्ण के कार्य के लिए जिम्मेदार है। उन्होंने कहा तंदुरूस्ती का बीज है उपवास। ‘त्याग’ का सही मायने में फल चाहिए तो उपवास रूपी पौधे को दिल से पालें और चुस्त-दुरुस्त रहें।

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