Holi 2021: कोरोना से तो अभी प्रभावित , लेकिन देश के इन स्थानों में 100-150 सालों से नहीं मनायी गयी होली - Naya India
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Holi 2021: कोरोना से तो अभी प्रभावित , लेकिन देश के इन स्थानों में 100-150 सालों से नहीं मनायी गयी होली

होली भारत के प्रमुख त्यौहारों में से एक है. देशभर में होली का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता रहा है. लेकिन इस बार कोरोना ने रंग में भंग डाल दिया है. देश के कई राज्यों में होली के पहले से ही धारा 144 लागू कर दी गयी है. इसके साथ ही राज्यों में इस बार सरकारें लोगों से बढ़ते सक्रंमण को देखते हुए सांकेतिक होली खेलने की अपील कर रही है. साथ ही भारत सरकार ने भी संपूर्ण देश में किसी भी प्रकार के सार्वजिनक आयोजन और सम्मेलन पर रोक लगा दी  है. जाहिर से बात है कि मस्ती के त्योहार होली में पाबंदियों के कारण इस बार होली का रंग  फीका रहने वाला है. लेकिन आपको बता दें कि भारत में कुछ गांव ऐसे भी है जहां पिछले कुछ 100-150 सालों से होली नहीं मनाई जा रही हैं. कहीं इसके पीछे मान्यता तो कहीं पौराणिक कहानियां होली के ना खेले जाने का कारण है. आइयें जाने भारत के इन गांवों में क्यों नहीं   मनती होली …..

देवी को पसंद नहीं है शोर-शराबा..

उत्तराखण्ड के रूद्रप्रयाग जिले में कुरझां और क्विली नाम के दो गांव हैं.  जहां करीब 150 साल से होली का त्योहार नहीं मनाया गया है.  यहां के स्थानीय निवासियों की मान्यता है कि इलाके की प्रमुख देवी त्रिपुर सुंदरी को शोर शराबा बिल्कुल पसंद नहीं है. इसलिए यहां के लोग होली मनाने से डरते हैं. देवी सुंदरी कहीं क्रोधित ना हो जाएं इसलिए यहां के लोग होली नहीं मनाते हैं.

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भगवान शिव को पड़ा था छिपना…

उत्तराखण्ड में जहां मंदाकिनी नदी और अलकनंदा नदी का संगम होता है,उस पवित्र स्थल का नाम है रुद्रप्रयाग. श्रद्धालु यहां कोटेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करने जरुर आते हैं. ऐसी मान्यताएं हैं कि भस्मासुर नामक राक्षस की नजरों से बचने के लिए भगवान शिव ने यहीं एक चमत्कारी गुफा में खुद को छिपा लिया था. इसी वजह से यहां के लोग होली नहीं मनाते है।

100 साल से राजा का आदेश मान रही है जनता….

झारखंड के दुर्गापुर गांव में बोकारो का कसमार ब्लॉक होली नहीं मनाता है. इस गांव में रहने वाले करीब 1000 लोगों ने 100 से भी ज्यादा सालों से होली का त्यौहार नहीं मनाया है. लोगों का दावा है कि अगर किसी ने होली के रंगों को उड़ा दिया तो उसकी मौत पक्की है. गांव वालों का कहना है कि 100 साल पहले यहां एक राजा ने होली खेली थी. जिसकी कीमत उसे चुकानी पड़ी थी. राजा के बेटे की मृत्यु होली के दिन हो गई थी. संयोग से राजा की मौत भी होली के दिन ही हुई थी.मरने से पहले राजा ने यहां के लोगों को होली न मनाने का आदेश दे दिया था. तब से यहां के लोग होली महीं मनाते है.

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तमिलियन में होली का त्योहार मनाने का नहीं है रस्म

तमिलनाडु में रहने वाले लोग भी पारंपरिक रूप से होली का त्योहार नहीं मनाते हैं. जैसा कि उत्तर भारत में हर साल मनाया जाता है. ऐसा कहा जाता है होली पूर्णिमा के दिन पड़ती है और तमिलियन में यह दिन मासी मागम को समर्पित है.

दक्षिण भारत के लोगों की सोच अलग..

दक्षिण भारत के एक गांव में यह मान्यता है कि इस दिन उनके पितृ पवित्र नदियों और तालाबों में डुबकी लगाने के लिए आकाश से धरती पर उतरते हैं. इसलिए इस दिन होली मनाना गलत समझा जाता है.

नहीं रही होली खेलने की  परंपरा

गुजरात के बनसकांता जिले में स्थित रामसन नाम के एक गांव में भी पिछले 200 साल से होली का त्योहार नहीं मनाया गया है. इस गांव का नाम रामेश्वर हुआ करता था. मान्यता है कि भगवान राम अपने जीवनकाल में एक बार यहां आये थे. यहां कभी भी होली खेलने की नहीं रही परंपरा .

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