Holi 2021 : मातम के बीच खुशियों का उत्साह, यहां चिता के राख से भोले के भक्त खेलते हैं होली.. - Naya India
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Holi 2021 : मातम के बीच खुशियों का उत्साह, यहां चिता के राख से भोले के भक्त खेलते हैं होली..

New Delhi: भारत में होली 29 मार्च को खेली जाएगी. देश के अलग-अलग राज्यों में कई तरह की होली खेली जाती है. मथुरा-वृंदावन (Mathura-Vrindavan) की लठ्ठमार होली ( Lathmar Holi) देशभर में प्रसिद्ध है. इसी तरह देशभर में अलग-अलग तरह से होली खेली जाती है.  काशी ( kashi) में भी अलग ही तरह की होली खेली जाती है. शिव नगरी काशी में भोले के भक्त एकादशी से होली खेलना शुरु कर देते हैं. एकादशी के दिन भोले के भक्त अपने इष्ट के साथ महाशमशान घाट (GREAT CEMETRY) में चिता की राख के साथ होली खेलते हैं. इसके बाद से काशी में होली की शुरुआत हो जाती है. काशी को मोक्षदायिनी भी कहा गया है. मोक्षदायिनी काशी के महाशमशान के हरिशचंद्र घाट पर कभी चिता की आग ठंडी नहीं होती है. हरिशचंद्र घाट ( Harishchandra ghat)  पर शवों के आने का सिलसिला चलता रहता है. काशी के शमशान में चिता की राख के साथ  होली भी खेली जाती है.

इस अनोखी होली की मान्यता

 एकादशी पर खेली जाने वाली इस अनोखी होली के पीछे एक मान्यता भी है.  ऐसा कहा जाता है कि जब रंगभरी एकादशी के दिन भगवान विश्वनाथ मां पार्वती का गौना कराकर काशी पहुंचे तो उन्होंने अपने गणों के साथ होली खेली थी. लेकिन वो अपने प्रिय श्मशान पर बसने वाले भूत, प्रेत, पिशाच और अघोरी के साथ होली नहीं खेल पाए थे. इसीलिए रंगभरी एकादशी से विश्वनाथ इनके साथ चिता-भस्म की होली खेलने हर साल यहां महाशमशान पर आते है और अपने प्रिय भूत,प्रेत,अघोरी के साथ होली खेलते हैं.
  एक मान्यता यह भी है कि दक्ष के यज्ञ में सती जी ने अपने प्राणों को त्याग दिया था. तभी से भोलेनाथ और देवगढ़ खुश नहीं थे. कामदेव के भस्म होने के बाद माता पार्वती का विवाह शिव जी के साथ हुआ था. एकादशी के दिन ही भोलेनाथ माता पार्वती का गौना कराकर काशी ले आए जिससे शिवजी के गणों को काफी खुशी हुई.

एकादशी से शुरु होती है पंचदिवसीय होली

  एकादशी से पंचदिवसीय होली का पर्व शुरु हो जाता है.  यह अनूठी होली खेलने से पहले विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है.  इसके बाद हरिश्चंद्र घाट पर चिताओं की भस्म से महाआरती कर इस आयोजन की शुरुआत की जाती है. इस अनूठे आयोजन को कराने वाले डोम राजा परिवार के बहादुर चौधरी ने बताया कि यह सदियों पुरानी परंपरा चली आ रही है. इस दिन भोले अपने प्रिय भूत,प्रेत,अघोरी के साथ होली खेलते आते हैं.
शोभायात्रा  नाराम आश्रम से हरिशचंद्र घाट तक आती है. वहां बाबा की महाआरती के बाद यह विशेष होली खेली जाती है.  बाबा भोले का चिता की राख से ही श्रंगार किया जाता है.  काशी में यह होली आदिकाल से खेली जााती है. इस होली में महिलाएं भी खुदको यहां आने से रोक नहीं पाती है. शिव नगरी काशी में मातम में भी उत्साह का रंग कहीं दिखता है.  काशीवासी महाश्मशान को छूत-अछूत, अपशगुन से परे और नवजीवन से मुक्ति से मुक्ति पाने का द्वार मानते हैं. यही वजह है कि रंगों की होली के पहले चिता-भस्म की होली में जाने से आनंद कई गुना बढ़ जाता है.

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