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रोमांचित करता है लोनार झील का रहस्य

लोनार। महाराष्ट्र में विदर्भ क्षेत्र के बुलढाणा जिले की लोनार झील प्रकृति का धरती पर एक ऐसा विचित्र रहस्य है जिसका विवरण पुराणों, वेदों एवं दंत कथाओं में है और जो वैज्ञानिकों के लिए अब भी पहेली बना हुआ है।

लोनार की समतल धरती को आधा किलोमीटर से ज्यादा चीरकर बनी इस विशाल झील के बारे में कहा जाता है कि यहां एक लाख 70 वर्ष पहले उल्का पिंड 22 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से आकर गिरा था जिसके कारण यहां गहरा गड्ढा बना। दूसरी कहानी में कहा जाता है कि यहां ज्वालामुखी फूटा था जबकि तीसरी कहानी एक राक्षस के वध से जुड़ी है जिसका संहार खुद भगवान विष्णु ने किया था।

पुरातत्ववेत्ताओं का कहना है कि यह विश्व की अनोखी झील है और दुनिया में इस तरह की सिर्फ तीन झीलें मिली है जिसमें लोनार झील के अलावा अमेरिका के कैलोफोर्निया की मोनो झील तथा केन्या की मगादी झील है। इन तीनों झीलों में पानी खारा है और वैज्ञानिक मानते हैं कि यह तीनों गड्ढे उल्का पिंड के गिरने से बने थे।

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देश के कम वर्षा वाले विदर्भ क्षेत्र में स्थित लोनार झील आधा किलोमीटर से अधिक गहरी है लेकिन इसमें महज 30 मीटर पानी है। झील के चारों तरफ हरियाली है और भांति भांति के जीव जंतु हैं। इस झील का व्यास करीब 1.8 किलोमीटर है। झील के चारों तरफ का किनारा जंगली है और इसकी गोलाई करीब आठ किलोमीटर है। वैज्ञानिकों ने इस झील के आसपास विशिष्ट प्रजाति के कीड़े मकोड़े खोजे हैं जो भारत में ही नहीं दुनिया में अनोखे बताये गये हैं।

प्रकृति का चमत्कार इस झील की मिट्टी और पानी में भरा है। झील के पास एक कुआं है जिसके एक हिस्से का पानी अत्यघिक खारा है और आधे हिस्से का पानी मीठा है। प्रकृति का इस तरह का अनोखा रहस्य दुनिया में शायद ही कहीं हो जहां एक ही स्रोत से निकली जलधारा से निकला सतह पर तैरता पानी आधा मीठा और आधा खारा होता है। कुएं में मीठा और खारा पानी होने की विशेषता के कारण आसपास के लोग इसे ‘सास बहू का कुआं’ भी कहते हैं।

लोनार झील के रहस्य से लोग सदियों से रोमांचित होते रहे हैं और आज भी जो झील देखने आता है वह रोमांचित हुए बिना नहीं लौटता। इसी रोमांच का परिणाम है कि 10वीं शताब्दी में झील के खारे पानी के तट पर शिव मंदिर का निर्माण हुआ था जिसमें 12 शिवलिंग स्थापित किए गये। कहते हैं कि उसी समय से श्रद्धालु झील में स्थापित इन लिंगों की पूजा 12 ज्योतिर्लिंग के रूप में करते हैं। शिव मंदिर के साथ ही झील के अंदर कमलजा माता का मंदिर है जहां देवी की पूजा की जाती है।

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लाेनार नगर की तरफ झील के पास सार्वजनिक निर्माण विभाग का वीरान पड़ा गेस्ट हाउस है। इस गेस्ट हाउस को अंग्रेजों ने झील का नजारा देखने के लिए बनाया था लेकिन विरान पड़े इस अतिथि गृह को अब पुरातत्व विभाग ने कब्जे में ले लिया है और झील की तरफ जाने सभी रास्तों पर कंटीले तार की बाढ लगा दी है। झील के नजदीक यात्रियों के ठहरने के लिए महाराष्ट्र पर्यटन विकास निगम का एक होटल है जहां खाने और रहने की अच्छी व्यवस्था है।

निगम से अधिकृत टूरिस्ट गाइड शैलेश सरदार का कहना है कि स्कंध पुराण और ऋग्वेद में इस झील के रहस्य का उल्लेख है। यहां के आसपास की मिट्टी अत्यधिक लौहयुक्त है और इसकी मिट्टी चुम्बक के टुकड़े के ऊपर रखे कागज पर घूमती है। उन्होंने झील के आसपास के कई पत्थर दिखाए जो रहस्यों से भरे हैं । झील को लेकर एक कथा यह भी है कि यहां लोनासुर नाम का राक्षस था जिसका वध भगवान विष्णु ने खुद किया था। उसका रक्त भगतवान के पांव के अंगूठे पर लग गया था जिसे हटाने के लिए भगवान ने मिट्टी के अंदर अंगूठा रगड़ा और यहां गहरा गड्ढा बन गया।

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शैलेश कहते हैं कि इस झील की स्थापना के बारे में दो अन्य बाते कहीं जाती हैं। एक में कहा गया है कि ज्वालामुखी के फूटने से यह झील निर्मित हुई थी। दूसरी कहानी उल्का पिंड को लेकर है, जिसमें कहा गया है कि यहां उल्का पिंड गिरा था जिससे यहां डेढ किलोमीटर गहरा गढ्ढा बन गया। इस पिंड के बारे में कहा जाता है कि वह 22 किलोमीटर प्रति सेकेंड की रफ्तार से यहां गिरा था जिसके कारण जबरदस्त विस्फोट हुआ था और यहां पर धरती हिल गयी थी और रिक्टर पैमाने पर छह तीव्रता का भूकंप जैसा महसूस किया गया था। उस समय लोनार का तापमान बहुत बढ़ गया था।

यह उल्का पिंड धरती पर कब गिरा इसके समय को लेकर भी रहस्य है। एक गणना के अनुसार इसका समय 52 हजार वर्ष पूर्व बताया गया है जबकि दूसरी गणना के अनुसार इसका समय पांच लाख 70 हजार वर्ष बताया गया है। दुनिया में इस तरह की सिर्फ तीन झीलें ही मिली है जिसमें लोनार झील के अलावा अमेरिका के कैलोफोर्निया की मोनो झील तथा केन्या की मगादी झील है।

शैलेश ने बताया कि इस झील का पानी अत्यधिक खारा है लेकिन रहस्य यह है कि वहां एक कुआं है जिसका पानी आधा मीठा तो आधा खारा है। उनका दावा है कि इस झील का जिक्र अकबरे आइना में भी है। उसने बताया कि झील का पानी अत्यधिक खारा है और इसका प्रमाण उन्होंने इसके पानी में हल्दी डालकर दिखायी जिससे पानी का रंग एकदम लाल हो गया।

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