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लालू, नीतीश की लड़ाई और बिहार!

अजित कुमार -- लोकसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल बाकी हैं और बिहार में विधानसभा का चुनाव समय पर हुआ तो उसमें तीन साल बाकी हैं। फिर अभी क्यों लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने एक दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोला है? यह लाख टके का सवाल है। आए दिन राजद और जदयू के बीच विवाद हो रहे हैं। कभी लालू प्रसाद को लेकर तो कभी उनके बेटों को लेकर। 

उनके दोनों बेटों ने जदयू के साथ साथ भाजपा के खिलाफ भी मोर्चा खोला है। इसका भी अभी कोई महत्व नहीं है क्योंकि निकट भविष्य में कोई चुनाव नहीं होने वाला है। बिहार में राजनीतिक गरमागरमी का तात्कालिक कारण तो विधानसभा का सत्र है। पर उसके आगे भी बड़े राजनीतिक कारण बताए जा रहे हैं। 

माना जा रहा है कि राजद और जदयू दोनों बिहार की राजनीति में अपने नंबर एक और आक्रामक राजनीति के कारण कांग्रेस पर से फोकस हटा है और उसकी टूट की अटकलें थम गई हैं। सो, कहा जा रहा है कि बड़े राजनीतिक मकसद से यह लडाई चल रही है। 

लालू प्रसाद अपने बेटों के जरिए अपने वोट बैंक को एड्रेस कर रहे हैं। नब्बे के दशक में लालू प्रसाद जिस अंदाज में राजनीति करते थे उस अंदाज में उन्होंने अपने बड़े बेटे तेज प्रताप को तैयार किया है। बिल्कुल लालू की तरह तेज प्रताप के तेवर हैं। उन्होंने सुशील मोदी को कहा कि घर में घुस कर मारेंगे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कहा कि खाल उधेड़वा देंगे। 

इन दो बातों से उनके बड़े वोट बैंक को यह मैसेज गया कि लालू प्रसाद का परिवार डरा नहीं है और उसके तेवर वहीं हैं, जो पहले थे। पहले लालू प्रसाद इसी अंदाज में भूराबाल साफ करो कहते थे और डॉक्टर जगन्नाथ मिश्रा को गालियां देते थे। हेलीकॉप्टर से उतर कर लोगों को दिखाते थे कि इसी हेलीकॉप्टर से जगन्नाथ मिश्रा उड़ते थे, अब यह उनसे छीन लिया है। 

इन्हीं बातों से वे पिछड़ों के मसीहा बने थे। छोटे और बड़े मोदी के खिलाफ उलटी सीधी बातें करके तेज प्रताप भी उनके विरोधी वोट को राजद के साथ जोड़ने की राजनीति कर रहे हैं। उनका बयान सोची समझी राजनीति का हिस्सा है। दूसरे बेटे तेजस्वी के जरिए लालू प्रसाद उस वोट बैंक को लक्ष्य कर रहे हैं, जो नीतीश के साथ जुड़ा था। 

नीतीश कुमार को इस बात का अंदाजा है कि लालू प्रसाद उनकी जड़ काट रहे हैं। बिहार में पिछड़ों के दो मसीहा नहीं रह सकते हैं। अगर लालू प्रसाद को पिछड़े अपना नेता मानते हैं और अल्पंसख्यक का वोट उनके साथ बना रहता है तो फिर नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति में जगह नहीं मिलेगी। इसलिए उन्होंने राजद प्रमुख और उनके दोनों बेटों की हर बात का जवाब देने का फैसला किया है। वे खुद ट्विटर पर जवाब दे रहे हैं या उनकी पार्टी प्रेस कांफ्रेंस करके जवाब दे रही है। वे यह नहीं चाहते हैं कि मुकाबला लालू प्रसाद बनाम भारतीय जनता पार्टी का बने। लालू प्रसाद यहीं मुकाबला बनवाना चाहते हैं। 

भाजपा को बैठे बिठाए यह खेल अपने पक्ष में करने का मौका मिल सकता है। पर नीतीश कुमार वह मौका नहीं देना चाहते हैं। इसलिए वे अपने ऊपर फोकस बनवाए हुए हैं। 

वे राजद बनाम जदयू का मुकाबला बनाए रखने की राजनीति कर रहे हैं। यह राजनीति जिंदा रहेगी, तभी भाजपा नीतीश कुमार को भाव देगी और उनका चेहरा आगे रखेगी। 

बिहार में जब 2005 के अंत में जब जनता दल यू और भाजपा गठबंधन की सरकार बनी तो पहली बार ऐसा लगा कि बिहार में राजनीति के अलावा शासन और प्रशासन की बातें भी हो सकती हैँ। पांच साल सुशासन की चर्चा होती रही। पांच साल के बाद लोगों ने जदयू, भाजपा को और बड़ा बहुमत दिया। राजद सिर्फ 22 और कांग्रेस चार सीटों पर सिमट गई। 

सो, आगे भी राजनीति हाशिए में रही और सुशासन चलता रहा। पर 2013 में जब नीतीश कुमार ने भाजपा से तालमेल तोड़ा, उसके बाद पिछले चार साल से बिहार में सिर्फ राजनीति हो रही है। नीतीश फिर भाजपा के साथ लौट आए हैं, लेकिन राजनीति थमी नहीं है। 

बिहार में अब कामकाज की चर्चा नहीं हो रही है और न सुशासन की बात हो रही है। सिर्फ राजनीति की चर्चा हो रही है। राजद, जदयू, भाजपा और कांग्रेस चारों पार्टियां राजनीतिक दांवपेंच में उलझी हैं और कामकाज भी इसी में उलझ कर रह गया है। 

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