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भाजपा का यह गाँधीवाद, पार्टीवाद

मुगलसराय को एक भाजपा नेता के नाम पर बदलना पार्टी के सामने देश को उपेक्षित करने जैसा है। अन्यथा जो क्षेत्र तुलसी, कबीर से लेकर भारतेंदु, महामना मालवीय, जयशंकर प्रसाद, रायकृष्ण दास, प्रेमचंद, उदय शंकर, बिस्मिल्ला खान जैसे मनीषियों, कलावंतों की भूमि रही, उसे एक पार्टी नेता का नाम क्यों दें? वह भी जबकि इन नेता के नाम पर वे देश भर में दर्जनों स्थानों, भवनों, अस्पतालों, सड़कों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों, स्टेडियमों, योजनाओं, डाकटिकटों के नाम पहले ही रख चुके!

यह तो बिलकुल कांग्रेसी नक्शे-कदम पर चलना हुआ। हर कहीं नेहरू, इंदिरा की तरह अपने नेता का नाम थोपना। तब ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का नारा व्यंग्य ही लगता है। यह भाजपा का भटकाव भी नहीं है। वस्तुतः यहाँ सभी पार्टियों में भाजपा सर्वाधिक गाँधीवादी है। इसलिए कांग्रेसी लच्छन अपनाने में उसे संकोच नहीं। यह कइयों ने नोट किया है।

भाजपा ने 1980 में स्थापना के साथ ही स्वयं अपनी विचारधारा ‘गाँधीवादी समाजवाद’ घोषित की। तब अंदरूनी खींच-तान हुई थी कि ‘एकात्म मानववाद’ या ‘गाँधीवादी समाजवाद’ में किसे रखें? यह भी एक व्यंग्य है कि अब भाजपा वह मुहावरा दुहरा रही है जिसे तब ठुकरा दिया था! जैसे गाँधीजी अपनी बात मनमर्जी बदल देते थे, मगर कहते थे कि बात नहीं बदली बल्कि सुनने वाले नासमझ हैं। 

पहले भाजपाई स्वदेशी आर्थिकी पर जोर देते थे। सादगी-पसंद और तड़क-भड़क से दूर थे। वे ‘मिस वर्ल्ड’ जैसे सौंदर्य-तमाशे, मांसाहार, मद्यपान, आदि के भी विरोधी थे। इस का कुछ तबकों द्वारा मजाक उड़ाना भी गाँधीजी के मिर्च-मसाले की वर्जना का मजाक उड़ाने से मिलता है।

जहाँ गाँधीजी हिन्दू दर्शन के विरुद्ध चलते थे, वहाँ भी भाजपा की समानता है। जैसे, समाज-सेवा को ही राजनीति समझना। उदारता दिखा कर विरोधियों, दुष्टों, विदेशियों तक को जीत लेने की झक पालना। हिन्दू दर्शन और शास्त्रों में कहीं राजनीति का यह अर्थ नहीं है। मगर गाँधी अपने उपवास, उपदेश और सेवा, आदि से ही राजनीति साधने में लगे रहते थे। सदैव विफल होकर भी उन की जिद नहीं छूटी।

भाजपा परिवार द्वारा बाढ़, भूकम्प, आदि में आगे बढ़ कर सेवा करने और इसे अपनी राजनीतिक श्रेष्ठता मानने में वही गाँधीवाद है। सेवा-कार्य उन की एक प्राथमिकता रही है, जो मदर टेरेसा जैसे मिशनरियों द्वारा छल-पूर्ण सेवा की तुलना में कई गुनी प्रशंसनीय है। चाहे इसे देशी-विदेशी मीडिया द्वारा कभी वह सम्मान नहीं मिला, जिस का भाजपा-परिवार हकदार है।

हिन्दू धर्म से लगाव में भी भाजपा गाँधीजी से निकट है। अन्य दल, शिव सेना को छोड़, हिन्दू धर्म-परंपरा से अपना जुड़ाव नहीं दिखाते। नैतिकता पर जोर भी गाँधीजी जैसा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के असंख्य कार्यकर्ता निःस्वार्थ भाव से काम करते रहते हैं। हालाँकि भाजपा में यह कम है। बड़ी संख्या में इन के नेता दूसरों जैसे ही निजी आपा-धापी में दिखते हैं। अब तो असंख्य कांग्रेसी ही भाजपा में उच्च पदासीन हैं।

भाजपा में विनम्रता भी गाँधीवादियों से मिलती है। कइयों का दिखावा और आत्म-दंभ भी तुलनीय है। भाजपा-परिवार के लोग अपने संगठन की आलोचना पर तुरत असहिष्णु, क्रोधित होने लगते हैं। जबकि हिन्दू धर्म, समाज, शास्त्रों या देवताओं की निंदा पर शान्त रहते हैं। गाँधीजी भी हिन्दू धर्म की आलोचना मजे से सुन कर भरसक उत्तर देते थे, किन्तु अपनी गलतियों, कमजोरियों पर ऊँगली उठने पर नाराज होकर बात बंद कर देते थे। हालाँकि यदि आलोचक महत्वपूर्ण व्यक्ति हो, तब नकली विनम्रता दिखाते रहते थे।

एक और समानता हैः एकाधिकारी प्रवृत्ति। किसी भी बिन्दु पर गाँधी सदैव अपनी राय ही सही मानकर चलते थे। स्वयं को ही हिन्दू धर्म-समाज का सर्वोच्च प्रतिनिधि मानते थे। न केवल राजनीति, बल्कि दार्शनिक, बौद्धिक मामलों में भी। इसलिए समकालीन दूसरे नेताओं, ज्ञानियों की उपेक्षा, बल्कि उन्हें तुच्छ मानने तक की प्रवृत्ति गाँधी में थी। किसी से गाँधी सीखें, इस का सवाल ही नहीं था। चाहे वह साहित्य, इतिहास, दर्शन हो या अंतर्राष्ट्रीय राजनीति। जबकि दूसरों को गाँधी हर विषय पर सीख देने को तैयार रहते थे। इसी तरह, अन्य राष्ट्रवादियों को मान, स्थान देने या सहयोग करने में गाँधीजी की कोई रुचि नहीं थी। इस का घातक दुष्परिणाम भी हुआ।

गाँधीजी स्वयं को सभी भारतवासियों का नेता मानते थे। मुस्लिम लीग द्वारा उन्हें केवल हिन्दुओं का नेता बताने के बावजूद गाँधीजी ने न केवल सभी हिन्दुओं, बल्कि मुसलमानों का भी नेता होने की जिद नहीं छोड़ी। इसीलिए, हिन्दू महासभा को दो कौड़ी का नहीं समझा, जो मुस्लिम लीग के हिन्दू-विरोध को संतुलित कर कांग्रेस को बल ही पहुँचाती! लेकिन गाँधीजी ने हिन्दू महासभा को इसीलिए तिरस्कृत किया, क्योंकि वे स्वयं को जनता का एक-छत्र प्रतिनिधि मानते थे।

वह राजनीतिक दृष्टि से अक्षम्य भूल थी। शत्रु को हराने में मोर्चे-बंदी उपयोगी होती है। पर नेतृत्व या काम में हिस्सा देने की प्रवृत्ति गाँधीजी में बिलकुल नहीं थी। वही प्रवृत्ति भाजपा में है, जो संपूर्ण हिन्दू समाज, बल्कि भारत का भी अकेले नेतृत्व करने का भाव रखती है। यह खतरनाक किस्म का अज्ञान है, जिस से ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ जैसे नारे बने हैं।

इसी कारण भाजपा अपने नेताओं को ही राष्ट्रीय महापुरुष और ज्ञानी मानते हुए उन्हीं का प्रचार करती है। उन में विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, टैगोर, सावरकर, राम स्वरूप, सीताराम गोयल, आदि से लेकर आज तक अपने परिवार से बाहर के चिन्तकों, समाजसेवियों को मात्र औपचारिक आदर देने की आदत रही है।

यह ठीक गाँधीजी वाली एकाधिकारी – और हानिकारक – प्रवृत्ति है, जो देश-सेवा पर अपना एकाधिकार समझती है। दूसरों का कर्तव्य है इन्हें सहयोग देना, न कि स्वयं कुछ सोचना करना। जो लोग स्वतंत्र रूप से कोई अच्छा कार्य कर रहे होते हैं, उन के प्रति भाजपा में आम तौर पर उपेक्षा, बल्कि प्रतिद्वंदिता और द्वेष तक देखा गया है। भाव रहता है कि वे या तो इन के कहे अनुसार चलें या घर बैठें।

जैसा गाँधीजी के समय हुआ, आज भी इस का लाभ हिन्दू-विरोधी, भारत-विरोधी शक्तियाँ उठा रही हैं। वे लोग विविध संगठनों में या अकेले भी काम करते हुए अपनी गतिविधियों में आपसी सहयोग करते हैं। जबकि भाजपा-परिवार की सारी गतिविधि स्वयं-केंद्रित होती है। हिन्दू हित या राष्ट्रीय कार्य में लगे दूसरों को भी सहयोग देना उन की चिन्ता में नहीं है। बल्कि, यदि कहीं किसी ने कोई अच्छा कार्य किया तो उस संगठन या व्यक्ति पर कब्जा करने या उसे निपटाने की प्रवृत्ति ही दिखती है।

यह सब राष्ट्र-हित को उपेक्षित कर पार्टी-हित साधना भर है। जैसा कांग्रेस में हुआ, यह अंततः संकीर्ण गुटीय या पारिवारिक हित में पतित हो जाता है। केवल सदिच्छा इसे रोक नहीं सकती। आखिर नेहरू से लेकर मनमोहन सिंह की सदिच्छा पर तो भाजपा को भी संदेह नहीं रहा है!

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