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हिंदू राजनीतिः धोखा या नौसिखियापन?

शंकर शरण
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शिव सेना या तेलुगु देशम, आदि भाजपा पर ‘धोखे’ का आरोप लगा रहे हैं। जबकि कांग्रेस ने ‘ड्रामेबाजी’ का आरोप लगाया है। कुछ लोगों के अनुसार अगले चुनाव में भाजपा के विरुद्ध मुख्य नारा होगा ‘धोखा’। हालाँकि ‘ड्रामेबाजी’ पर अधिक सहमति संभव है। भाजपा समर्थकों में भी एक वर्ग नाटक की आदत वाली बात मानने लगा है। इसलिए सही लग ने के कारण ‘ड्रामेबाजी’ का आरोप ज्यादा घातक है। इस में नेतृत्व की अच्छी नीयत, परिश्रम, कर्मठता, ईमानदारी, आदि की स्वीकृति है - फिर भी निराशा है। इसलिए, जैसा मुकदमे में होता है, यदि छोटा आरोप भी साबित हो जाए, तो सजा निश्चित मिलती है।  

एक अर्थ में यह पूरी हिन्दू राजनीति के आत्मावलोकन का विषय है। मामला किसी व्यक्ति नहीं, पूरे संगठन का है। आखिर, उन समस्याओं को वे दशकों से पहचानते हैं, जिस के लिए सत्ता लेना अनिवार्य मानते थे। तब सत्ता लेकर कुछ करने के बजाए नारे बदलना, बहाने बनाना और समय काटना क्या दर्शाता है? स्वच्छता, शौचालय, विकास, बेटी, पिछड़ा, गरीब, अधिकाधिक टैक्स वसूलने की तिकड़म, आत्म-प्रशंसा, विरोधियों पर तंज और रोजाना प्रचार-विज्ञापन – इन सब में एक सूत्र समान है। वह यह कि किसी बुनियादी राजनीतिक समस्या को छुआ तक नहीं जाता, जिन का नाम ले लेकर पार्टी बनाई और सत्ता चाही गई थी।

अतः केवल अच्छी नीयत, परिश्रम, आदि गुणों से कुछ नहीं होता। यह सब महात्मा गाँधी और नेहरू जी में भी थे। उन्हें जनता का और अपार समर्थन था। लेकिन उन्होंने भारत की भारी हानि की। लाखों पंजाबी, बंगाली हिन्दुओं को बेमौत मरवाया। हिन्दू धर्म के पक्के, ऐतिहासिक दुश्मन (मतवाद) को अभूतपूर्व ताकत पहुँचाई। यह सब नौसिखिएपन के कारण हुआ। राजनीति, धर्म और इतिहास के प्रति अज्ञान के कारण भी।  राजनीति और शासन अत्यंत तकनीकी काम है। इसे केवल जनसमर्थन या चुनाव जीतने की जुगत में सीमित कर देना घोर अज्ञान है। सरकार चलाना, उपयुक्त नीतियाँ बनाना और उसे लागू कर सकना बिलुकल भिन्न काम है। आखिर, मुगलों या अंग्रेजों ने यहाँ कोई चुनाव नहीं जीता था। आज भी चीन या सऊदी अरब में चुनाव नहीं होते। तो वहाँ नेता क्या करते हैं?

अर्थात, सत्ता में आना या बने रहना एक तरह का काम है। चाहे वह जैसे हो। लेकिन शासन में आकर वांछित नीति बनाकर लागू करना दूसरे प्रकार का काम है। यह दूसरा वाला काम हिन्दू राष्ट्रवादियों को नहीं आता। वे केवल पहला काम कर-कर के स्वयं विभोर होते रहे हैं। दशकों का अनुभव यही बताता है। 

यह मुख्यतः बेध्यानी और प्रशिक्षित न होने की कमी है। उन्होंने अब तक केवल संगठन बनाने, चुनाव लड़ने और कांग्रेस द्वारा बनी सत्ता-लीक पर बैठ कर सुखपूर्वक समय बिताने का प्रदर्शन किया है। कई राज्यों में कई बार तथा केंद्र में दो बार भाजपा अनुभव ने दिखाया कि वे किसी गंभीर मुद्दे पर एक कदम नहीं बढ़ा सके, जिस पर निन्दा कर-कर के उन्होंने कांग्रेस के विरुद्ध दावा बनाया था। 

हिन्दू-विरोधी सेक्यूलरिज्म का कानूनी और बौद्धिक दबदबा; धर्महीन शिक्षा, फलतः राष्ट्रीय संस्कृति का निरंतर पतन; अंग्रेजी का बढ़ता विशेषाधिकार; काशी, मथुरा, भोजशाला जैसे असंख्य मंदिरों पर इस्लामी या सरकारी कब्जा; मिशनरी कुचक्र व संगठित धर्मांतरण चलते रहना; बढ़ते अपराधकर्म; आम प्रशासनिक बदहाली; तथा सोवियत ढंग का सफेद हाथी जैसा राज्यतंत्र विस्तार; आदि कुछ मूल समस्याएं हैं। इन में से अनेक का समाधान बिना शासन में आए भी, केवल कटिबद्ध दबाव से भी कराए जा सकते थे।  

पर भाजपाई तो शासन में आकर भी कुछ नहीं करते! रुटीन समय बिताते हैं। ठीक कांग्रेसी नक्शे-कदम वोट-लुभावन योजनाएं, उदघाटन, देश-विदेश दौरे, पार्टी प्रचार, लगुओं-भगुओं को जहाँ-तहाँ पद-सुख देना, तथा अगले चुनाव का ध्यान करना। यहाँ तक कि शिक्षा, संस्कृति, खेल, साइंस, आदि संबंधी कार्यक्रमों, भवनों पर कांग्रेसी शैली में अपने नेता के नाम चिपकाना। इस आत्म-प्रचार से देश या हिन्दुओं का क्या भला होता है? मगर पूछिए, तो पवित्र आक्रोश से भरकर वे ऐसे देखते हैं, मानो वह सब तो उन्हें करना ही था!

पर वह सब बेकार के काम, घटिया नियुक्तियाँ, आडंबरी कार्यक्रमों की भरमार, आदि नौसिखियापन है। कर्णधारों को मालूम ही नहीं कि चालू हानिकारक नीतियों, संरचनाओं, कायदों, परंपराओं को कैसे बदलें? अधिकांश को इस की चेतना तक नहीं। उन के दर्जनों मंत्रियों, सासंदों और सैकड़ों विधायकों को यह सब सुन कर हैरत होगी कि उन से ऐसी आशाएं भी है! वे केवल कुर्सी पर बैठे मगन हैं। सत्ता की बागडोर और जिम्मेदारी उन्होंने हाथ में ली ही नहीं! इसीलिए अधिकांश काम पूर्ववत्, कांग्रेसी-ब्रांड हो रहे हैं। 

ऐसी आलोचनाओं के जबाव में भाजपा समर्थक जो सफाइयाँ देते हैं, वह सब कांग्रेस के पक्ष में भी फिट बैठती हैं। चाहे जम्मू-लद्दाख की उपेक्षा, या इस्लामियों की मनुहार, वेटिकन के सामने सलामी, तिब्बत पर नजरें चुराना, दिनो-दिन अंग्रेजी माध्यम का वर्चस्व बढ़ाना, काशी-मथुरा पर इस्लामी कब्जे की अनदेखी, गर्हित अपराधों में वृद्धि अथवा हर कहीं दल-बदलुओं, स्वार्थियों का स्वागत। इन सब पर भाजपा सत्ताधारियों का रुख या चुप्पी उन के नौसिखिएपन का संकेत है। दुनिया के किसी अग्रणी देश में गंभीर मुद्दों, घटनाओं या अपराधों पर सत्ताधारी ऐसे बगलें झाँकते और मुँह सिले नहीं दिखते। यह सब क्लूलेसनेस का प्रमाण है। 

भारतीय ज्ञान परंपरा में अज्ञान व अहंकार एक ही सिक्के के दो पहलू माने गए हैं। इसलिए गाल बजाकर ‘हम अच्छे’, ‘हम मेहनती’, ‘हम लाजबाव’, आदि कहना और गंभीर मुद्दों से अनजान बने रहने का नाटक धीरे-धीरे सब को समझ आने लगता है। अतः मार्गदर्शकों को सोचना चाहिए कि कमी कहाँ रही है? 

संभवतः कमी योग्य राजकर्मियों के चयन और प्रशिक्षण के अभाव में है। वे अपने कार्यकर्ताओं को आजीवन केवल मिलने-जुलने, विविध संगठन बनाने, रुटीन सभा-सम्मेलन, पर-निंदा और आत्म-प्रशंसा ही सिखाते हैं। यही सब करते-करते कार्यकर्ता एक दिन सांसद, मंत्री या राजकीय संस्था का चेयरमैन बना दिया जाए – उसे कहाँ से आकाशवाणी होगी कि किसी बिन्दु पर क्या करना है, और कैसे? वह तो पहले दिन से अच्छे बच्चे की तरह अफसरों की सलाह और रूटीन फाइल निपटाने के सिवा कुछ नहीं जान सकता। बल्कि ‘अच्छा’ दिखने के लिए वह जान-बूझ कर मामूली गलत परंपराओं को भी नहीं तोड़ता।

वैसे बिरले भी होते हैं जिन्हें प्रशासनिक नियम, विभागीय शक्तियों, सीमाओं, आदि की जानकारी रहती है। जरूरी बातें जानने-समझने में रुचि और उस का तरीका पता होता है। प्रमुख-गौण, जरूरी-गैरजरूरी कामों की परख आती है। जिन में देश-विदेश से विशेषज्ञ ढूँढ लाने और उन्हें साधन व काम देकर करवाने का हौसला होता है। जो अपने मातहतों, सहयोगियों, उत्तराधिकारियों को जरूरी प्रशिक्षण देने-दिलाने की फिक्र करते हैं। आगे की कल्पना छोड़ जो हाथ में मौजूद शक्ति व समय का सदुपयोग करते हैं। उन से ही महान राष्ट्रनेता बनते हैं। दुर्योगवश, स्वतंत्र भारत में ऐसा कोई नेतृत्व नहीं उभरा। 

हिन्दू राष्ट्रवादियों को सोचना होगा कि यह कमी कैसे दूर करें? केवल राहुल गाँधी पर हँसने से काम नहीं चलेगा। वही हँसनीय लोग इकट्ठे, या अकेले भी (आम आदमी पार्टी) उन्हें हरा सकते हैं। यह बार-बार हुआ है। एकाध प्रतिशत लोगों की उदासीनता भी चुनावी परिणाम बदल देता है। इतने लोग तो अभी स्वयं भाजपा में हैं जिन्हें लगता है कि नेतृत्व के पास कोई कार्य-योजना नहीं। इस मायूसी का उपाय किसी नये नाटक या नारे से होना कठिन लगता है।  

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