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समझदार हिंदू जाए तो कहां जाए?

शंकर शरण
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भारत में सचेत हिन्दू आज भी बहुत कम हैं। अर्थात जिन्हें देश-दुनिया की ठोस जानकारी के साथ हिन्दुओं की तुलनात्मक स्थिति मालूम है। तदनुरूप जो अपना कर्तव्य निभाने की कोशिश करते हैं। इन की संख्या संभवतः देश में एक प्रतिशत भी न हो। इनमें लेखक, पत्रकार, विद्वान और हर कार्यक्षेत्र के लोग हैं। यद्यपि यहाँ ‘ओपिनियन मेकर’ वर्ग में प्रभावी हिस्सा वामपंथियों, इस्लाम-परस्तों और जाने-अनजाने देशघातियों, हिन्दू-विरोधियों का ही है। 

सो, संख्यात्मक दृष्टि से सचेत हिन्दू यहाँ नगण्य हैं। देश के प्रभावी बुद्धिजीवी उन्हें संघ-भाजपा से जोड़कर देखते हैं। यह कुछ सच भी है क्योंकि चुनावों में ये प्रायः भाजपा समर्थक होते हैं। किन्तु यही सचेत हिन्दुओं की कठिनाई भी रही है। उन की समझ भाजपा की देन नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिन्तन का परिणाम है। इसीलिए उन्हें एक ओर से लांछन, तो दूसरी ओर से ताना सुनना पड़ता है। सहयोग कहीं से नहीं मिलता। 

लम्बे समय से प्रभावशाली सेक्यूलर-वामपंथी बुद्धिजीवियों ने उन्हें ‘सांप्रदायिक’, ‘मुस्लिम-विरोधी’, ‘संघी-भाजपाई’ तत्व कहकर विचार-विमर्श में अछूत-सा बनाए रखा है। जबकि भाजपा के अनुयायी उन पर अंध-समर्थक बनने का दबाव देते रहे हैं। इस प्रकार, स्वतंत्र सोच-विचार के कारण सचेत हिन्दू पर दोतरफा चोट होती है। अर्थात् ठीक उस कारण जिस के लिए उस का महत्व होना चाहिए था!

इस प्रकार, ऐसे हिन्दुओं को दूसरे हिन्दू ही ब्लैकमेल करते हैं। वे कौन हैं?

वे ऐसे लोग हैं जो विशेष प्रसंगों पर चिन्ता दिखा कर हिन्दू-रक्षक होने का संकेत करके राजनीतिक, चुनावी, आर्थिक सहयोग, आदि लेते हैं। फिर उन पर तब तक मुँह नहीं खोलते जब तक कि फिर चुनाव न आ जाए।

जो दिवंगत और वर्तमान हिन्दू विद्वानों, कर्मयोगियों की उपेक्षा करते हैं। जो पार्टी-प्रचारकों से विद्वानों को सीख दिलाने की जिद रखते हैं। सीधे और छल-पूर्वक, दोनों प्रकार से। जो राष्ट्रीय, सामाजिक, धर्म चिन्ताओं को दलीय घेरे के अंदर रखकर सोच-विचार की जबर्दस्ती थोपते हैं। जिस का अर्थ होता है कि कमरे के अंदर आप जो चाहे बोलें, बाहर दल व नेता की जयकार करें। 

जो शिक्षा, संस्कृति को बड़ा हल्का काम मानते हैं। जिस से इन क्षेत्रों में काम करने वाले सच्चे, गंभीर, परिश्रमी लोग – जो वैसे ही ढूँढने पर मिलते हैं – सदैव बेहद उपेक्षित रहते हैं। 

जो अपने सामान्य नेताओं तक को ऋषि, मनीषी, संत, आदि प्रचारित करने में राजकोष का बेहिसाब धन नष्ट करते हैं। इस कारण भी सच्चे ज्ञानियों, उन की शिक्षाओं को नई पीढ़ी कम जानती है। फलतः सांस्कृतिक गिरावट बढ़ती जाती है। 

जो राष्ट्रीय, शासकीय, नीतिगत जिम्मेदारियाँ देने में योग्यता नहीं, बल्कि निजी वफादारी और चाटुकारिता को महत्व देते हैं। समाज हित से ऊपर निजी या दलीय हित को प्रश्रय देते हैं।  

जो अपने शुभचिन्तकों, सहयोगियों से भी दोहरी बातें करते हैं। 

जो राष्ट्रीय नीति-निर्माण पर कभी सच्चा विचार-विमर्श नहीं, बल्कि पार्टी-प्रोपेगंडा करते हैं। इस प्रकार समय, सत्ता और संसाधन की नियमित बर्बादी करते हैं। 

जो अपनी और अपने दल की छवि बनाने के लिए अतिरंजना, मिथ्या और अनर्गल बोलते रहते हैं। पर इसे जरूरत बताकर अपने असहज सदस्यों को चुप करते हैं। 

जो शिवाजी, दयानन्द, विवेकानन्द, श्रद्धानन्द, श्रीअरविन्द, टैगोर, अज्ञेय, जैसे मनीषियों  पर श्रद्धा रखते हैं, किन्तु उन की किसी सीख की परवाह नहीं रखते। प्रायः उलटा करते हैं। इस से होती राष्ट्रीय हानि की जिन्हें कोई समझ नहीं है।   

जो देश, समाज और धर्म-रक्षा के लिए स्वतंत्र रूप से काम करने वालों को बाधा देते, झूठी बदनामी तक करते हैं। ताकि तत्संबंधी कुछ भी करने, जैसे चाहे करने, या न करने का उन का एकाधिकार बना रहे। 

जो समाज के जाने-माने घोर शत्रुओं पर चोट के बजाए अपने प्रतिद्वंदी हिन्दू नेताओं या मामूली दलों, आदि को निपटाने के लिए पूरी बुद्धि, समय और संसाधन लगाते हैं। इस तरह वास्तविक शत्रुओं को मजबूत होने के लिए पूरा अवकाश देते हैं। 

जो सत्ता में आने पर विशिष्ट ज्ञानयोगियों, हिन्दू-हितैषियों, हिन्दू-सेवकों को सम्मान देने के बदले उन पक्के विरोधियों व मतलबियों को मान देते हैं, जो स्वार्थवश इन की ओर निहारते हैं। फलतः हिन्दुओं में सच्चे योद्धाओं, ज्ञानियों की वृद्धि कुंठित होती है। आखिर जिन लोगों का सार्वजनिक महत्व दिखे, वैसा ही बनने की प्रेरणा फैलती है। सो समाज में ज्ञानियों, समाज-सेवकों, योद्धाओं के बदले चाटुकारों, अनुचरों, प्रचारकर्मियों की वृद्धि होती है।

जो दशकों सत्ता में रह कर भी हिन्दुओं को सामाजिक सबल बनाने के लिए कुछ नहीं करते, बल्कि उन्हें अपने दल, नेता पर निर्भर रहने को विवश करते हैं। इस बहाने से कि ‘हानिकर लोग’ सत्ता में न आएं तथा ‘और बुरा’ न हो। इस प्रकार, जो हिन्दुओं को सामाजिक रूप से असहाय बनाए रखते हैं। 

जो हिन्दुओं को सबल बनाने के बजाए कोई बुरा अतीत या संभावना दिखाकर डराते हैं, कि यदि उन्हें समर्थन न दिया, तो दुष्ट, दानव सत्तासीन हो कर हिन्दुओं को और सताएंगे। अथवा, ‘यदि हम ने कुछ न भी किया, न कर सके, वगैरह, तो दूसरों को समर्थन देकर अपनी हानि करोगे।’

यदि यह सब हिन्दुओ को ब्लैकमेल करना नहीं, तो क्या है? 

इन सब को जैसे भी उचित ठहराएं, यह वह चेतना या कर्म नहीं है जिस की सीख समकालीन महान हिन्दू मनीषियों ने भी दी थी। यह राष्ट्रवाद भी नहीं, बल्कि अंध-पार्टीवाद है। कम्युनिस्टों की नकल है। केवल कम्युनिस्ट ही हमेशा पार्टी को पहली टेक बनाते थे। वही टेक इन्होंने भी अपना ली। इस के बाद कम्युनिस्टों की तरह ही निरंतर प्रपंच जरूरी हो जाता है। एक झूठ छिपाने को सौ झूठ बोलने जैसा। 

सो, स्वामी विवेकानन्द ऊपरी आदर्श हैं। केवल फोटो दिखाने और हिन्दुओं को भ्रमित करने के लिए। इसीलिए विवेकानन्द की किसी सीख पर नहीं चला जाता। वास्तविक आदर्श जैसे-तैसे चुनाव जीतने के गुर सोचने वाले पार्टी-पुरुष हैं। 

इसलिए, हिन्दुओं की असहायता वस्तुतः तनिक भी नहीं घटी है। चाहे भाजपा ताकतवर लगे, पर हिन्दू-शत्रु जरा भी कमजोर नहीं पड़े। उन की गतिविधियाँ उसी उद्धतता से जारी हैं। तमाम हिन्दू-विरोधी वैसे ही कटिबद्ध अपना काम कर रहे हैं। अतः भाजपा सत्ता अपने आप में कोई उपलब्धि नहीं है। क्योंकि इन में वह योग्यता, तैयारी, कर्मनिष्ठा बिलकुल नहीं, जो हिन्दू-शत्रुओं में है। भाजपा सत्ता लेकर भी असल मुद्दों पर बगलें झाँकती है, जबकि हिन्दू-शत्रु सत्ता के बिना भी मौके का इस्तेमाल जानते हैं। 

जिस मनोयोग से भाजपा ने सत्ता का प्रयोग प्रतिद्वंदी पार्टियों को निपटाने में किया, उस का दसांश भी हिन्दू-विरोध रोकने और सच्ची शिक्षा के प्रसार के लिए नहीं किया। ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ का फूहड़ नारा उन की अयोग्यता का स्व-घोषित प्रमाण है।

इस प्रकार, सचेत हिन्दुओं की विडंबना विचित्र है। वे भाजपा समर्थक हैं, पर उन्हें ही ब्लैकमेल किया जाता है कि भाजपा का अंध-समर्थन करें। जबकि हिन्दू-विरोधियों को छुट्टा छोड़ दिया गया, बल्कि उन का आदर किया जाता है! यह ठीक गाँधीजी की तरह हिन्दुओं को फॉर-ग्रांटेड लेना हुआ। उस के अनिष्टकारी परिणामों से सीख लेने के बजाए सारी बुद्धि पार्टी-प्रचार में लगाई जाती है।

इस बीच हिन्दू या राष्ट्रीय हितों पर चौतरफा घात चलता रहता है। क्योंकि हिन्दुओं के शत्रु किसी पार्टी के बंधक नहीं हैं। वे अधिक सचेत, साफ नजर और चतुर हैं। वहाँ लल्लुओं, मतलबियों को पद, संसाधन और महत्व नहीं दिया जाता। इसीलिए वे हर पार्टी से काम लेना, उन का इस्तेमाल करना जानते हैं। उन के लिए पथ नहीं, लक्ष्य महत्वपूर्ण है।

अतः पार्टी-भक्ति को देश-भक्ति समझना बहुत बड़ी भूल है। जुमलेबाजी को नीति, महान मार्गदर्शकों को भुलाकर पार्टी नेताओं को मनीषी या जादूगर समझना, उन्हीं पर भरोसा, उन्हीं का प्रचार, आदि घातक है। सदैव लक्ष्य का ध्यान रखना चाहिए, पथ का नहीं। यह हिन्दुओं के शत्रुओं से भी सीखना चाहिए। 

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