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चुनाव होगा दो ध्रुवीय?

तन्मय कुमार -- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 के चुनाव में जब अकेले दम पर पूर्ण बहुमत हासिल किया तो यह माना जाने लगा कि अब देश की राजनीति में त्रिशंकु लोकसभा का दौर खत्म हो जाएगा। गठबंधन की राजनीति रहेगी लेकिन सरकारें उसकी मोहताज नहीं होंगी। ऐसा मानने का एक कारण यह था कि राज्यों के चुनाव में लगातार लोग किसी एक पार्टी या चुनाव पूर्व गठबंधन को पूर्ण बहुमत दे रहे थे। 

सो, जब केंद्र में भाजपा ने अकेले 284 सीटें जीतीं तो लगा कि त्रिशंकु लोकसभा का दौर खत्म हुआ। उसके बाद राज्यों में हुए चुनावों में भी भाजपा जहां जीती वहा उसे निर्णायक बहुमत मिला या जहां हारी वहां भी विपक्षी पार्टियों को पूर्ण बहुमत मिला। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि अब देश के मतदाता परिपक्व हो गए हैं और उनके त्रिशंकु लोकसभा या विधानसभा से होने वाले नुकसान का अंदाजा हो गया है। 

पर अब जिस अंदाज में अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी हो रही है उसे देख कर ऐसा लग रहा है कि देश की पार्टियों को मतदाताओं की परिपक्वता पर पक्का भरोसा नहीं बना है। सारी पार्टियां गठबंधन बनाने में जुटी हैं और प्रयास हो रहा है कि आमने सामने का चुनाव बनाया जाए। यानी जनता के विवेक पर फैसला छोड़ने की बजाय उसके सामने विकल्प ही ऐसा दिया जाए कि वह दो में से किसी एक को चुने। माना जा रहा है कि कर्नाटक विधानसभा चुनाव की वजह से ऐसी सोच मजबूत हुई है। 

पिछले लोकसभा चुनाव के साथ जो प्रक्रिया शुरू हुई थी उसका एक चक्र कर्नाटक विधानसभा के साथ पूरा हुआ है। लोकसभा चुनाव में और उसके बाद राज्यों में हुए चुनाव में मतदाताओं ने किसी तीसरी पार्टी को भाव नहीं दिया था। ज्यादातर राज्यों में सारे वोट दो पार्टियों के बीच बंटे और कई राज्यों में तो लोगों ने विपक्ष को भी खत्म कर दिया। 

जैसे दिल्ली में भाजपा को सिर्फ तीन सीटें मिलीं या राजस्थान में कांग्रेस बड़ी मुश्किल से विपक्षी पार्टी बनने लायक सीटें हासिल कर पाई। लोकसभा में तो कांग्रेस को इतनी सीटें भी नहीं मिलीं कि उसे मुख्य विपक्षी पार्टी का दर्जा मिले। बिहार से लेकर बंगाल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब सब जगह लोगों ने एक पैटर्न पर वोट किया। पर कर्नाटक पहुंचते पहुंचते राजनीति बदल गई। वहां न सिर्फ त्रिशंकु विधानसभा बनी, बल्कि भाजपा, कांग्रेस और जेडीएस तीनों अपना वोट बैंक बचाने या बढ़ाने में कामयाब रहे। 

विपक्ष कर्नाटक चुनाव के पहले से ही एकजुटता का प्रयास कर रहा था, कर्नाटक चुनाव के बाद भाजपा ने भी यह प्रयास शुरू कर दिया है। कर्नाटक चुनाव के बाद देश की दोनों बड़ी पार्टियां आमने सामने का चुनाव बनाने के प्रयास में जी जान से लग गई हैं। 

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने समर्थन के लिए संपर्क अभियान शुरू किया और अपने रूठे हुए सहयोगियों को मनाना शुरू किया। उन सहयोगियों को भी जिनको वे छोड़ चुके थे। ध्यान रहे भाजपा ने 2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना से नाता तोड़ लिया था। पर अमित शाह फिर टूटे हुए नाते को जोड़ने उद्धव ठाकरे के यहां पहुंचे। वहां से वे अकाली दल के नेताओं से मिलने पंजाब गए और कहा जा रहा है कि जल्दी ही बिहार जाकर नीतीश कुमार से मिलने वाले हैं। 

उससे पहले उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान और उनके सांसद बेटे से मुलाकात की। अभी अमित शाह अपने सहयोगियों को एकजुट कर रहे हैं और कहा जा रहा है कि दूसरे चरण में वे कुछ और पार्टियों को एनडीए में शामिल करेंगे। चुनाव आते आते एनडीए में भाजपा की सहयोगी पार्टियों की संख्या 40 से ऊपर जाने का अंदाजा है। शाह पूरे देश में एनडीए का नेटवर्क बना रहे हैं। उनको लग रहा है कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां यहीं राजनीति करने वाली हैं। सो, वे पहले से जवाब तैयार कर रहे हैं। 

सबसे पहले विपक्ष की नेता ममता बनर्जी ने दो ध्रुव बना कर आमने सामने चुनाव में उतरने की बात कही थी। उन्होंने वन ऑन वन यानी एनडीए के हर उम्मीदवार के मुकाबले विपक्ष का एक उम्मीदवार उतारने की थीसिस दी थी। विपक्ष के नेता इस पर काम कर रहे हैं। 

विपक्ष इसे लेकर कितना गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अखिलेश यादव ने कहा है कि वे बसपा के पीछे नंबर दो पार्टी बनने को तैयार हैं तो कांग्रेस ने कहा है कि वह गठबंधन के लिए कोई भी कुर्बानी देने को तैयार है। पार्टी ने इसी योजना के तहत कर्नाटक में जेडीएस का मुख्यमंत्री बनाया तो केरल में अपने कोटे की राज्यसभा सीट केरल कांग्रेस एम को दे दी। 

मोटे तौर पर विपक्ष की एकता बन गई है। दक्षिण की दो या तीन पार्टियों और लेफ्ट को लेकर संशय है। इसके बावजूद इस बात का पुख्ता अनुमान है कि देश के तीन या चार राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों में विपक्षी एकुजटता बन जाएगी और भाजपा के मुकाबले कोई तीसरा मोर्चा नहीं होगा। सो, संभव है कि 2019 के चुनाव में दो ध्रुवों पर दो गठबंधनों के बीच बिल्कुल आमने सामने की लड़ाई हो। 

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