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एनडीए क्या बिखर सकता?

तन्मय कुमार -- भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन, एनडीए में फूट की शुरुआत बिहार में हुई थी। सिर्फ एक विधायक वाली पार्टी हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने एनडीए से नाता तोड़ कर राजद और कांग्रेस गठबंधन से नाता जोड़ लिया। इसके बाद तेलुगू देशम पार्टी ने अपने दो मंत्रियों का केंद्र सरकार से इस्तीफा दिलाया और इसकी जवाबी कार्रवाई में भाजपा के दो मंत्रियों ने चंद्रबाबू नायडू की सरकार से इस्तीफा दे दिया। 

नायडू की पार्टी अभी एनडीए का हिस्सा है पर उसका अलग होना महज वक्त की बात है। टीडीपी के मंत्रियों के इस्तीफे के बाद शिवसेना ने कहा कि अभी और भी घटक दल अलग होंगे। तभी यह सवाल उठा है कि एनडीए में कितना बिखराव होगा? क्या इस बिखराव से भाजपा कमजोर होगी या इसका भी उसे फायदा मिलेगा? 

इसके साथ ही यह भी सवाल है कि क्या अपनी किसी रणनीति के तहत भाजपा यह बिखराव होने देना चाह रही है? ऐसा मानने का कारण यह है कि भाजपा को इस राजनीति से महाराष्ट्र, हरियाणा और नगालैंड में बड़ा फायदा हुआ है। 

भारतीय जनता पार्टी ने कई जगह जान बूझकर तालमेल तोड़ा है या टूटने दिया है। चार साल पहले 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा ने जान बूझकर महाराष्ट्र में शिवसेना से गठबंधन टूटने दिया था। गठबंधन में लड़ कर भाजपा ज्यादा से ज्यादा 60 से 70 सीटों तक जाती पर अकेले लड़ कर उसने 122 सीटें जीतीं। 

इसी तरह उसने हरियाणा में उसने कुलदीप बिश्नोई की पार्टी जनहित कांग्रेस से तालमेल तोड़ दिया और अकेले लड़ कर पूर्ण बहुमत में आ गई। नगालैंड में भी भाजपा ने पुरानी सहयोगी एनपीएफ की सरकार में बने रहते हुए नई बनी पार्टी एनडीपीपी से तालमेल किया, ज्यादा सीटों पर लड़ी और नई सहयोगी पार्टी की सरकार बना दी। भाजपा के 12 विधायक जीत गए, जिसमें से एक उप मुख्यमंत्री और छह मंत्री बन गए हैं। 

तभी यह भी माना जा रहा है कि भाजपा जान बूझकर कुछ सहयोगियों की अनदेखी कर रही है। आंध्र प्रदेश में अगर वह टीडीपी के साथ रहती है तो उसे बहुत कम सीटें मिलेंगी और चार विधायकों पर ही अटकी रहेगी। पर अकेली लड़ेगी या किसी दूसरी सहयोगी पार्टी के साथ लड़ेगी तो उसकी संख्या बढ़ सकती है। इसी तरह उसे यह भी भरोसा है कि टीडीपी और कांग्रेस का तालमेल नहीं हो पाएगा। 

भाजपा नए राज्यों की तलाश कर रही है, जहां उसको लग रहा है कि पार्टी की सीटें बढ़ सकती हैं। इन राज्यों में अब भी भाजपा को एक उम्मीद की तरह देखा जा रहा है। पार्टी ने विकास की राजनीति के साथ साथ राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति का जो समीकरण बनाया है, उसके उन राज्यों में कामयाब होने की संभावना देखी जा रही है, जहां भाजपा का राज नहीं है या कभी नहीं रहा है। यानी जहां के लोगों ने अपनी नजरों से भाजपा का राज नहीं देखा है वहां भाजपा अपने लिए संभावना देख रही है। 

ऐसे तमाम राज्यों में भाजपा को सफलता मिल रही है। तभी अब उसकी नजर केरल, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना आदि राज्यों पर है। त्रिपुरा और नगालैंड की जीत ने भाजपा का हौसला और बढ़ाया है। इसलिए वह टीडीपी की परवाह नहीं कर रही है। भाजपा के नेता यह भी कह रहे हैं कि बहुसंख्यक हिंदू वोटों की चिंता में ही चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा का साथ नहीं छोड़ा है। माना जा रहा है कि अगर भाजपा कर्नाटक में जीत जाती है तो नायडू अलग होने का फैसला शायद नहीं कर पाएं। 

कांग्रेस और दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियां खुश हैं कि एनडीए में बिखराव हो रहा है। पर सवाल है कि क्या यह बिखराव सचमुच का है और भाजपा को इसका नुकसान होगा? अब तक गठबंधन टूटने का भाजपा को कहीं नुकसान नहीं हुआ है। बिहार में भी लोकसभा चुनाव में उसे फायदा ही हुआ था। तभी भाजपा के नेता टीडीपी या शिवसेना की चेतावनी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। उनको लग रहा है कि भाजपा के संगठन, उसकी आर्थिक ताकत और नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की कोई काट किसी पार्टी के पास नहीं है। 

दूसरी ओर भाजपा की सहयोगी और विरोधी सभी पार्टियों की चिंता अपने को बचाने की है। पक्ष और विपक्ष दोनों की पार्टियां भाजपा के विस्तार की आक्रामक राजनीति से परेशान हैं। तभी कम से कम अभी ऐसा नहीं लग रहा है कि एनडीए के बिखराव से भाजपा की सेहत पर कोई बड़ा फर्क पड़ रहा है। सब कुछ कर्नाटक के चुनाव नतीजों पर निर्भर करेगा। अगर भाजपा वहां जीतती है तो पूरे दक्षिण भारत में वह मजबूत गठबंधन बनाएगी और बड़ी ताकत के तौर पर उभरेगी। अगर नहीं जीत पाई तो एनडीए में बिखराव तेज होगा।

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