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विकास अब पिछली सीट पर!

यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि विकास के जिस मॉडल को दिखा कर नरेंद्र मोदी और भाजपा ने लोकसभा और एक के बाद एक राज्यों की विधानसभा चुनावों में वोट लिया, उस मॉडल राज्य के चुनाव में विकास को पिछले सीट पर बैठा दिया है और चालक की सीट भगवान राम, भगवा और लोक लुभावन घोषणाओं ने ले ली है! विपक्ष जरूर विकास को खोज रहा है और उसके पागल होने का अभियान चलाया हुआ है लेकिन सत्तापक्ष इसे छोड़ कर दूसरे मुद्दों वोट मांगने की तैयारी में है। औपचारिकता के लिए विकास के आंकड़े बताए जा रहे हैं और विकास को लेकर कांग्रेस शासन के रिकार्ड पूछे जा रहे हैं। लेकिन भाजपा के लिए अब असली चुनावी मुद्दा विकास नहीं है। 

सवाल है कि भाजपा क्यों विकास को मुद्दा नहीं बना रही है? जिस मॉडल को देश भर में बेचा गया, उसे गुजरात में बेचने में क्या दिक्कत है? इसे एक हिंदी मुहावरे से कह सकते हैं – दूर के ढोल सुहाने होते हैं। गुजरात के विकास के ढोल की आवाज देश भर में तो सुहानी लगी, लेकिन स्थानीय लोगों के लिए यह आवाज उतनी सुहानी नहीं है। तभी चुनाव के मुद्दे, विमर्श और समीकरण बदलने की जरूरत महसूस हुई है। अगर गुजरात के हर जिले में हो रही घोषणाओं और गुजरात चुनाव की घोषणा टाले जाने के साथ जोड़ कर देखें तो तस्वीर और साफ होती है। चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया, लेकिन गुजरात की घोषणा टाल दी। आयोग का बचाव करते हुए देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह कही कहा कि गुजरात और हिमाचल प्रदेश दोनों के चुनाव की तारीखें हमेशा अलग अलग होती हैं, लेकिन वे यह बात दबा गए कि इन अलग अलग तारीखों की घोषणा हमेशा एक ही साथ होती हैं। सो, इस तर्क से आयोग के रवैए को सही नहीं ठहराया जा सकता है। 

अब यह साफ भी हो गया है घोषणा क्यों टली है! प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 23 अक्टूबर को गुजरात जाएंगे और वडोदरा में 780 करोड़ रुपए की योजनाओं की शुरुआत करेंगे। प्रधानमंत्री की यह यात्रा गुजराती नव वर्ष की शुरुआत से ठीक पहले हो रही है। माना जा रहा है कि इसके बाद चुनाव आयोग तारीखों की घोषणा करेगी और आदर्श आचार संहिता लागू होगी। उससे पहले राज्य सरकार अपने स्तर पर कई तरह की लोक लुभावन घोषणाएं कर रही है। जैसे राज्य सरकार ने सफाई कर्मचारियों के बच्चों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की घोषणा की है। बाढ़ से प्रभावित दो राज्यों बनासकांठा और पाटन में सौ फीसदी राहत व पुनर्वास का ऐलान हुआ है और इसके लिए बड़ा आवंटन किया जा रहा है। ऐसे ही हर जिले में कुछ न कुछ योजना घोषित की जा रही है। 

इस पूरी प्रक्रिया को इस तथ्य के साथ देखने की जरूरत है कि गुजरात में 22 साल से भाजपा का शासन है और उसमें से 13 साल नरेंद्र मोदी खुद प्रधानमंत्री रहे हैं। पिछले साढ़े तीन साल से उनके चुने हुए लोग सरकार चला रहे हैं और केंद्र में उनकी खुद की सरकार है। इस तरह करीब 17 साल से राज्य की कमान उनके हाथ में है। फिर भी विकास अधूरा है! छह करोड़ की आबादी वाला गुजरात, जो पहले से औद्योगिक रूप से विकसित राज्य रहा है, वहां 22 साल के भाजपा के और उसमें से 17 साल नरेंद्र मोदी के परोक्ष या प्रत्यक्ष शासन के बावजूद विकास अधूरा है! फिर सवाल है कि अगले पांच साल में सवा सौ करोड़ लोगों का देश ‘न्यू इंडिया’ कैसे बनेगा? कैसे भ्रष्टाचार, गरीबी, पर्यावरण की समस्या, विषमता, बेरोजगारी सब दूर हो जाएंगे? यह अलग से और पूरे देश के लोगों के लिए सोचने का विषय है। 

असल में गुजरात में कभी भी भाजपा ने विकास को नहीं बेचा है और न विकास के नाम पर वोट मांगा है। पहले भी गुजरात भाजपा और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की प्रयोगशाला रहा है और अब भी है। पिछले 17 साल में गुजरात में गोधरा और उसके बाद हुए दंगों की राजनीति हावी रही है। बहुसंख्यक हिंदुओं के मानस में इन दो घटनाओं ने जो स्थायी छवि अंकित की है, वह भाजपा की जीत का सबसे बड़ा और संभवतः एकमात्र कारण है। 

पर पिछले साढ़े तीन साल के प्रचार से हुआ कि ये छवि थोड़ी धुंधली पड़ने लगी और उसकी जगह विकास की तस्वीर ने ले ली। तभी विकास को पिछली सीट पर बैठाना पड़ रहा है। ड्राइविंग सीट पर अब दो मुद्दे हैं। एक हिंदुत्व का और दूसरा लोक लुभावन घोषणाओं का। फिलहाल जिला प्रशासन और राज्य के मुख्यमंत्री लोक लुभावन घोषणाओं में लगे हैं और 23 अक्टूबर के दौरे में प्रधानंमत्री भी कुछ बड़ी घोषणाएं करेंगे। हिंदुत्व का झंडा इस बार योगी आदित्यनाथ के हाथ में थमाया गया। दो दिन के रोड शो में उन्होंने जम कर भगवा राजनीति की। वे अयोध्या में सरयू किनारे राम की बड़ी मूर्ति लगवाने जा रहे हैं और उससे पहले सरकारी बसों को भी भगवा में रंग दिया है। उनको राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ ने राष्ट्रवाद का चेहरा बताया है। उनका प्रचार गुजरात के लोगों को भावनात्मक रूप से उद्वेलित करेगा और राजनीति वापस उस लीक पर लौटेगी, जिस पर पिछले 22 साल से चल रही है। गुजरात की प्रयोगशाला में इसके सफल होने पर फिर इसे पूरे देश में आजमाया जाएगा। सो, यह तय मानना चाहिए अगले लोकसभा चुनाव तक विकास पिछली सीट पर ही रहने वाला है।

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