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राहुल गांधी पर न हंसे!

राहुल गाँधी पर हँसना असंख्य लोगों का शगल हो गया है। पर किसी पर ज्यादा हँसने से उसे सहानुभूति भी मिलती है। फिर, पिछले सौ साल से यहाँ राजनीति योग्यता से कम, किसी न किसी की कृपादृष्टि और खानदानी तरीके से अधिक चली है। वरना सुभाषचंद्र बोस या सरदार पटेल की महत्ता होती। उस के बदले गाँधी-नेहरू गुणगान का राजकीय अनुष्ठान बना। 

उन गाँधी और नेहरू का जिन के हिस्से में इतना राजनीतिक अज्ञान-भोलापन, भयंकर परिणाम और विफलताएं हैं जिन का सानी खोजना कठिन है। लेकिन यहाँ नेता की योग्यता और उस के काम के परिणाम के बदले उस की नीयत व भंगिमा को अधिक महत्वपूर्ण बताया गया। इसीलिए ठोस मूल्यांकन नहीं, बल्कि अंधभक्ति, अंधविश्वास और झूठा प्रचार भारतीय राजनीति की तकनीक बनी है। पोजीशन और पोजीशनिंग। सभी दलों ने कमो-बेश यही अपनाया है। इसीलिए अच्छे, सच्चे नेता उभर नहीं पाए।

सो, किसी भ्रम में न रहें। राहुल के सत्ताधारी बनने में योग्यता-अयोग्यता मुद्दा ही नहीं है। सोनिया, राजीव, इन्दिरा के लिए भी यही था। केवल मोतीलाल नेहरू ने अपने बूते राजनीति की थी। उन के बाद उन की चारो पीढ़ी ने कोई क्वालिफाइंग मैच नहीं खेला। वे सीधे राजनीति के फाइनल या सेंट्रल कोर्ट पर उतरे। पहचान, धन या समर्थन जुटाने के लिए उन्हें विशेष कवायद नहीं करनी पड़ी। 

अब कोई अनाड़ी भी सीधे फाइनल खेले तो कोई ट्रॉफी निश्चित है। यहाँ यह गत सौ वर्ष से हो रहा है। जवाहरलाल की जीवनी पढ़ें तो लंदन में कॉलेज पढ़ते हुए उन के ध्यान में राजनीति नहीं थी। किसी धनी भारतीय युवक की तरह वे भी आई.सी.एस. बनने की कल्पना में थे। पर यहाँ आते ही पिता ने उन्हें कांग्रेस में सीधे उच्च स्तर पर उतारा। फिर गाँधीजी के प्रेम-मोह ने बाकी प्रबंध कर दिया। इसीलिए नेताओं में नापसंद होने पर भी जवाहरलाल ही प्रधान मंत्री बनाये गए। 

इंदिरा जी भी नेहरू प्रधानमंत्रित्व काल में ही सक्रिय हो गई थीं। यद्यपि तब पहले से निश्चित न था कि वह प्रधान मंत्री भी बनेंगी। शास्त्री के बाद वरिष्ठ कांग्रेसियों ने उन्हें यह सोच प्रधान मंत्री बना दिया कि ‘गूँगी गुड़िया’ नियंत्रण में रहेगी। पर इंदिरा स्वतंत्र शक्ति बन गईं। उन की छाया में संजय ने आरंभ किया। संजय की आकस्मिक मृत्यु के बाद इंदिरा ने अनिच्छुक राजीव को राजनीति में उतारा।  पहले कई वर्ष राजीव की स्थिति राहुल से अधिक भिन्न न थी। विपक्षी उन का मजाक उड़ाया करते थे कि ‘यह ऐसा घोड़ा है, जो उठता ही नहीं’। किन्तु इंदिरा के बाद राजीव ही प्रधान मंत्री बने। श्रीलंका में सेना भेजना तथा बोफोर्स दलाली पर हल्ला छोड़ उन का काल सामान्य ही था। बल्कि सैम पित्रोदा, आदि को लाकर उन्होंने तकनीक को गति दी। अयोध्या में राम मंदिर का ताला उन्होंने ही खुलवाया। उसी तरह, सोनिया को भी पहले वर्षों तक विफल माना जाता रहा। वाजपेई सरकार के समय तो भाजपा खुश थी कि सोनिया ही कांग्रेस नेता रहें। लेकिन उसी सोनिया ने विपरीत हवा में भी 2004 का लोक सभा चुनाव अभियान जीता। फिर 2009 में दुहराया। 

इसलिए राहुल की हँसी उड़ाने वाले भूल कर रहे हैं। जरूर राजनीति में उन्नीस साल के बाद भी राहुल बोलने में गड़बड़ाते हैं। किन्तु यहाँ वैयक्तिक योग्यता को पूछता ही कौन है? असंख्य मंत्रियों, सांसदों, विधायकों, सचिवों, आदि की परख कर देख लीजिए। वे क्या काम करते हैं, यह अल्लाह जानता है! सर्वोच्च नेता कुछ अच्छे सलाहकार रख ले, तो सरकार चलती रहती है। अतः जैसा नेहरू से लेकर सोनिया (मनमोहन सिंह) तक हुआ, एक बार सत्ता ले कर राहुल भी जम जा सकते हैं। 

वैसे भी, नेता की कुशलता का पता उस की भाषण-कला नहीं होती। वह तो नेहरू जी में बड़ी अच्छी थी। किन्तु स्वतंत्र भारत की आंतरिक व वैदेशिक नीति का भारी कबाड़ा उन्हीं ने किया, जिस के मारे देश आज तक सीधा नहीं हो सका है। असली मूल्य कथनी नहीं, करनी दिखाती है। 

फिर, राहुल कैसे भी हों, प्रमुख विपक्षी वही हैं। खुद भाजपा उन्हीं को निशाना बना रही है, जिस से राहुल का कद बढ़ा ही है। इसलिए यदि चालू राज से मोहभंग हो, तो विविध तत्व अपने-आप विपक्षी के निकट जुटने लगते हैं। फिर ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं रहती। कई बार विपक्ष केवल इसलिए जीता क्योंकि सत्ताधारी की छवि गिर गई। यानी, निठल्ली पार्टी भी सत्ता में आ सकती है, बशर्ते वह मैदान में हो और सत्ता पार्टी ने बहुत गलतियाँ कर दी हों। इस अर्थ में कांग्रेस को कम आँकना भूल है। 

अभी कहीं भाजपा की उलटी गिनती नहीं शुरू हो गई है। लेकिन जिन कारण कांग्रेस बदनाम हुई तथा उस की छवि हिन्दू-विरोधी सी बनी, यदि उस में ठोस सुधार दिखे तो भाजपा को मुश्किल हो सकती है। समर्थक कार्यकर्ता भी दबे स्वर कहने लगे हैं कि बिना किसी उपलब्धि के अहंकार, लफ्फाजी और तानाशाही को सबक सिखाना ही चाहिए। राष्ट्रवादी विकल्प तो फिर बन जाएगा। 

इस बीच, हिन्दू-विरोधी राजनीतिक समूह और एक्टिविस्ट प्रतीक्षा कर रहे हैं। पिछले कांग्रेस राज में उन की खूब चली थी। बल्कि उन्हीं के कारण कांग्रेस की हिन्दू-विरोधी छवि बनी। प्रतिक्रिया में भाजपा पर स्वतः वोट बरसे। उस ने स्वयं कोई खास एजेंडा पेश नहीं किया था। ‘अच्छे दिन’ जैसे वादे गोल-मोल ही थे, जिस का कुछ भी अर्थ संभव है।

एक अर्थ में भाजपा का कहना ठीक है कि उन्हें विकास के लिए वोट मिला था, हिन्दू चिन्ताओं के लिए नहीं। लेकिन इस में कपट यह है कि हिन्दुओं ने जो आस लगाई थी, उसे भुनाया तो गया; पर स्वीकारा नहीं गया। सत्ता में आ कर उस से अनजान बना गया। यह भाजपा ने बार-बार किया है। जिन मुद्दों पर नाराजगी से उसे सत्ता मिलती है, उन पर भी कुछ करने के बदले वह केवल सड़क, सफाई, टैक्स, गले लगने-लगाने, आदि में लग जाती है। यानी जिस में राजनीतिक विरोध है ही नहीं। यह सुविधापसंदगी और भगोड़ापन है, जिसे पहचानने में राष्ट्र-विरोधी, हिन्दू-विरोधी ताकतें भूल नहीं कर सकतीं। क्योंकि यह उन के कार्य-क्षेत्र का मामला है। वे हानिकर नीतियाँ बनाते और लागू करते हैं। 

लेकिन उन नीतियों को पलटना तो दूर, सत्ता में आकर भाजपा उसे छूती तक नहीं। इसीलिए कहीं भी भाजपा सत्ता में अकादमी, मीडिया तथा नीति विमर्श में मूलतः कुछ नहीं बदलता। क्योंकि भाजपा में उस पर नीतिगत चेतना नहीं है। वह व्यवहारतः सब कुछ चुनावी/पार्टी नजरिए से देखती है, इसीलिए कई चीजें देखती ही नहीं। सो विखंडनकारी राजनीतिक, शैक्षिक मुद्दों पर नीतिगत परिवर्तन के बजाए किसी लेखक, संपादक को फुसलाना, बदलवाना, आदि चलता है। यह सुई का काम तलवार से लेने जैसा है। 

भाजपा की यह बुनियादी कमजोरी आज भी दूर नहीं हुई। इसीलिए वह राहुल पर हँस कर और अपनी सफेद कमीज दिखाकर बेहतर दिखना चाहती है। यह बच्चों-सी भंगिमा है। राजनीति में सफेद कमीज मुख्य बात नहीं। स्पिलबर्ग की फिल्म ‘शिंडलर्स लिस्ट’ का नायक याद करें। या, हाल में कश्मीर में गाय जैसे सज्जन पंडितों के विनाश पर सोचें। वह सफेद कमीज वाले वी. पी. सिंह के राज में हुआ। राजनीति अपनी सफेद कमीज पर इतराने और दूसरों को जमानत पर देखकर हँसने का काम नहीं है।

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