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चीनी मार्क्सवाद के खतरे कई

बलबीर पुंज
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विश्व में आज लोकतंत्र और बहुलतावादी समाज में विश्वास रखने वाले अपने समक्ष तेजी से उभरते दो खतरों से चिंतित है। पहला- इस्लाम के नाम पर लगातार होने वाले आतंकी हमले और हिंसा। और दूसरा- साम्यवादी चीन की निरंतर बढ़ती शक्ति और उसका विस्तारवादी मानस। 

चीन के संबंध में कई अन्य चिंताजनक पक्ष भी है, जो वहां के कुछ हालिया घटनाक्रमों से स्पष्ट है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने संविधान में राष्ट्रपति और उप-राष्ट्रपति के लिए पांच वर्ष के दो कार्यकाल की बाध्यता को समाप्त करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया है- अर्थात् शी जिनपिंग जब तक चाहेंगे, तब तक चीन के राष्ट्रपति बने रहेंगे। 

सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद वह चीनी इतिहास में माओ त्से तुंग के बाद अपने देश के सबसे शक्तिशाली नेता के रुप में उभरेंगे। यह कदम तीन-चार दशकों की उस नीति को खत्म कर देगा, जो डेंग जियाओपिंग अपने शासनकाल में लेकर आए थे, जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के कार्यकाल को सीमित करने का फैसला किया था। 

स्वयं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कम्युनिस्ट पार्टी शासन के अंतर्गत एक दलीय प्रणाली पर बल दिया है। उनके अनुसार, "बहुदलीय लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच खतरनाक प्रतिस्पर्धा होती है। नई नीति के समर्थन में शी कहते है, ‘चीन की प्रणाली नई है, क्योंकि इसमें मा‌र्क्सवादी राजनीतिक पार्टी सिद्धांतों के साथ चीन की वास्तविकता व्यापक रूप से शामिल है। सीपीसी नेतृत्व बहाल रखने का मतलब लोकतंत्र से दूर होना नहीं है, बल्कि इससे एक ऐसे लोकतंत्र का निर्माण होगा, जो व्यापक और अधिक प्रभावी होगा।’ 

इसी घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में अपनी विस्तारवादी नीति के अंतर्गत चीन ने इस वर्ष अपने रक्षा खर्च में 8.1 प्रतिशत की वृद्धि कर इसे 175 अरब डॉलर किए जाने की घोषणा की है, जो भारत के हालिया रक्षा बजट (52.5 अरब डॉलर) से लगभग तीन गुना अधिक है। यही नहीं, साम्राज्यवादी चीन ने वर्ष 2017 में भारत के साथ गतिरोध का कारण बने डोकलाम के निकट न केवल अपने सैनिकों की तैनाती की है, साथ ही संतरी चौकियों, खंदकों और हैलीपैड समेत कुछ आधारभूत ढांचों का भी निर्माण कर दिया है। 

हाल के दिनों में जो कुछ चीन में हो रहा है- उसकी जड़े क्रूर, हिंसक और काले इतिहास से जुड़ी है। प्रख्यात लेखक जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी पुस्तकों "एनिमल फार्म" और "1984" में एक ऐसे समाज को चित्रित किया है, जिसमें व्यक्ति आधारित तानाशाही में विरोधी विचारों पर पूर्ण रोक के साथ मीडिया पर व्यापक नियंत्रण रहेगा। जो तानाशाह चाहता है या कहता है, उसका पालन सभी लोग करेंगे। उसके जो भी विचार होंगे, उसे ही एकमात्र सत्य माना जाएगा। लोगों पर निगरानी रहेगी। यहां तक उसकी तस्वीर जब भी सामने आएगी तो लोग उसके आगे नतमस्तक होने के लिए बाध्य हो जाएंगे। क्या चीन की वर्तमान स्थिति ऑरवेल की कल्पना का मूर्त रुप नहीं है? 

वास्तव में, चीन में शी जिनपिंग को मिले वरदान का खाका गत वर्ष तब ही खींच दिया गया था, जब सत्तारुढ़ सीपीसी ने जिनपिंग के नाम और उनकी विचारधारा को अपने संविधान में अंगीकार किया था और स्वयं शी ने वर्ष 2050 तक चीनी सेना को सबसे ताकतवर बनाने का संकल्प लिया था। चीन में इन राजनीतिक परिवर्तनों का मुखर विरोध हो रहा है- जिसमें सोशल मीडिया की भूमिका अग्रणी है। 

चीन के सरकारी समाचार पत्र यूथ डेली के पूर्व संपादक ली दतांग ने एक पत्र सोशल मीडिया पर प्रेषित कर कहा था कि चीन पुन: माओ त्से तुंग के दौर में जाने वाला है। कुछ लोग तो चीनी शासन की तुलना उत्तर कोरिया से कर रहे है। अपने मूल अवधारणा के अनुरुप चीन के सत्ताधारी दल ने शी शासन को अनिश्चितकाल किए जाने की ऑनलाइन आलोचना को हटाना प्रारंभ भी कर दिया। 

विरोधी विचारों और असहमति के प्रति चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का असहिष्णु होना कोई नई बात नहीं है। जिस शासन व्यवस्था के अंतर्गत चीन 1949 से आगे बढ़ रहा है, वहां की राजनीति में अनीश्वरवादी, हिंसाग्रस्त और अधिनायकवादी मार्क्सवाद का आधिपत्य है, तो उसकी पूरी आर्थिकी 1980 के दशक से शोषणयुक्त पूंजीवाद पर केंद्रित है। इस अस्वाभाविक गठजोड़ के बल पर चीन ने अपनी आर्थिक समृद्धि, महानगरों में गगनचुंबी इमारतों और आधुनिक अस्त्र-शस्त्र से लैस विशाल सेना आदि का ताना-बाना बुना है। 

जब से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के आक्रामक रवैये और उसकी साम्राज्यवादी नीतियों पर अंकुश लगाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत- ऑस्ट्रेलिया, जापान और अमेरिका वाले चतुष्कोणीय संगठन में सक्रिय हुआ है- उस पृष्ठभूमि में चीन में होने वाली हलचल महत्वपूर्ण है। 

चीन के साम्यवादी मुखौटे के पीछे एक कुटिल साम्राज्यवादी इरादें भी छिपे हुए है। विश्व में सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश चीन से भारत सहित 14 देशों की सीमाएं मिलती हैं और एशियाई महाद्पीव में लगभग उसकी सभी पड़ोसी सहित 23 देशों के साथ विवाद चल रहा है। वहीं समुद्री सीमा (पूर्वी और दक्षिण चीन सागर) को लेकर जापान, वियतनाम, फिलीपींस, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया और दक्षिण कोरिया से टकराव की स्थिति में है। 

सोवियत संघ सहित जिन-जिन देशों में साम्यवादी शासन रहा- वह न केवल विश्व को प्रभावित करने वाली विकृत शक्ति के रुप में उभरे, साथ ही उस शासन में जनता भूखमरी, गरीबी, हिंसा, मानवाधिकार हनन और श्रम-उत्पीड़न के बलात् शिकार भी हुए- लेनिन, स्टालिन, माओ, पोल पोट और किम जोंग-उन आदि का क्रूर शासनकाल इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। मानवता विरोधी इस विचार का परिणाम यह रहा है कि 1990 का दशक आते-आते विश्व में साम्यवादी समाजशास्त्र पूरी तरह बेनकाब हो गया। विघटन से पूर्व सोवियत संघ में वामपंथी ढांचे के अधीन दरिद्रता को दुनिया ने देखा। वर्ष 1991 के आर्थिक सुधार से पूर्व भारत भी इसी दर्शन से चार दशकों तक जूझता रहा। 

कई मार्क्सवादी आज भी राजनीतिक अधिनायकवाद के अधीन आर्थिक उदारवाद को समाज हित में उत्कृष्ट व्यवस्था मानते है और चीन की मिसाल देते है। किंतु गत कई वर्षों से चीन में सत्ता-अधिष्ठानों द्वारा तिब्बत में बौद्ध अनुयायियों सहित शिनजियांग, गांसू आदि कई क्षेत्रों में मुस्लिम नागरिकों का शोषण, उनपर मजहबी प्रतिबंध के अतिरिक्त मीडिया पर नियंत्रण और मानवाधिकारों का दमन- इन दावों की हवा निकालने के लिए काफी है। 

चीन संबंधी हालिया घटनाक्रमों पर देश में वामपंथियों की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रुप से समान वैचारिक दर्शन के कारण स्वागत वाली ही होगी- क्योंकि दोनों के संयुक्त प्रेरणास्रोत कार्ल मार्क्स का राजनीतिक सिद्धांत "राज्य का विघटन प्रारंभ" होने तक अधिनायकवादी शासन का समर्थन करता है। वर्ष 1975 में आपातकाल का आरंभिक समर्थन, प.बंगाल में 34 वर्षों (1977-2011) का शासनकाल और वर्तमान समय में केरल में राजनीतिक-वैचारिक विरोधियों की निर्मम हत्या- मार्क्सवादियों के लोकतांत्रिक-संवैधानिक विरोधी मानस को ही उजागर करता है। 

जो वामपंथी कुछ दशक पूर्व तक भारत के बड़े हिस्से पर अपना वैचारिक क्षेत्रफल होने का दावा करते थे, आज वह केरल में गठबंधन वाली एलडीएफ सरकार के रुप में सीमित हो गए है। अपने प्रभाव वाले पश्चिम बंगाल में तीसरे स्थान पर खिसक गए है, तो गत दिनों ही संपन्न हुए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में जनता ने अपने मत-शक्ति से ढाई दशक पुराने मार्क्स-लेनिनवादी शासन को जमींदोज कर दिया। 

यह निश्चित है कि वामपंथी विचारधारा अपने अंतर्विरोधों के कारण विश्व में अप्रासंगिक हो गई है। परंतु आज चीन विश्व शांति के लिए और बहुलतावादी समाज के लिए एक गंभीर खतरे के रुप में उभर रहा है। पड़ोसी देश होने के नाते भारत को इस संकट की तपिश अधिक महसूस हो रही है। नाजी हिटलर के खतरे को पहचानने में विश्व की लोकतांत्रिक शक्तियों ने जो विलंब किया था, उसकी कीमत दुनिया को दूसरे विश्वयुद्ध के रुप में चुकानी पड़ी थी- जिसमें लाखों निरपराधों की जान चली गई थी और हजारों करोड़ों रुपयों की संपत्ति स्वाह हो गई थी। 

क्या विश्व समय रहते चीन से लोकतंत्र को मिलने वाली चुनौती को समझकर, उसके विरुद्ध कोई ठोस और निर्णायक कदम उठाएगा? इस प्रश्न के उत्तर में आज विश्व का भविष्य निहित है।

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