नेताओं के आपराधिक मामलों का क्या?

पिछले लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे सत्ता में आए तो ऊपर से सफाई शुरू करेंगे। उन्होंने कहा था कि देश की संसद और राज्यों की विधानसभाओं की साफ सफाई होगी। उनके कहने का मतलब था कि आपराधिक छवि के नेताओं के ऊपर चल रहे मामलों की फटाफट सुनवाई होगी और उनका निपटारा किया जाएगा। 

पहले साढ़े तीन साल तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई। उलटे उस दौरान हुए चुनावों में भाजपा ने भी बड़ी संख्या में ऐसे लोगों को टिकट दिए, जिनका रिकार्ड आपराधिक था। पिछले साल एक मामले में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिशा निर्देश दिए, जिसके बाद कई राज्यों में विशेष अदालतें बनाई गईं, जिनमें सांसदों और विधायकों से जुड़े मामलों की सुनवाई शुरू हुई। पर यह इन अदालतों में भी मामला जहां का तहां अटका है। तभी सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्ती दिखाई है। 

अदालत ने पूछा है कि राज्य सरकारें इस बारे में जानकारी क्यों नहीं दे रही हैं। गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अपने यहां सांसदों और विधायकों के आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा नहीं दिया है। इस बीच सर्वोच्च अदालत में आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं को चुनाव लड़ने से रोकने के मामले में भी सुनवाई चल रही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए राज्यों पर सवाल उठाए। देश के सिर्फ 11 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने अदालत के सामने नेताओं के आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा पेश किया है। 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश पिछले दस महीने से ज्यादा समय से मामले को टाल रहे हैं। अदालत ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि पिछले साल नवंबर से इस साल अगस्त तक इन राज्यों ने कोई जानकार नहीं दी। 

अब तक पूरे देश में सिर्फ 12 विशेष अदालतें बनी हैं, जिनमें से कुछ सत्र अदालत हैं और कुछ मजिस्ट्रेट अदालत। इन अदालतों में भी नेताओं के ऊपर चल रहे गंभीर अपराधों के मामले की सुनवाई नहीं चल रही है क्योंकि गंभीर अपराध के मामलों में कई पहलू होते हैं और उनके सबूत, गवाही आदि सब अलग तरह से होते हैं। 

इन अदालतों में ज्यादातर मामले चुनाव से जुड़े मुकदमों वाले हैं और कुछ छोटे मोटे अपराध वाले हैँ। तभी यह जरूरी है कि सांसदों व विधायकों पर दर्ज मुकदमों की सूची राज्यों की ओर से केंद्र की दी जाए। 

सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई से यह बड़ा सवाल उठ रहा है कि आखिर राज्य सरकारें सर्वोच्च अदालत के निर्देशों की ऐसी अनदेखी क्यों कर रही हैं? यह दूसरा मामला है, जिसमें ऐसी अनदेखी हुई है। पिछले दिनों अदालत ने भीड़ द्वारा पीट पीटकर हत्या किए जाने के मामले में भी राज्यों को फटकार लगाई थी और कहा था कि राज्यों ने अदालत के दिए दिशा निर्देशों को लागू किया या नहीं, इसकी जानकारी वे अदालत को नहीं दे रहे हैं। 

दूसरा मामला नेताओं पर दर्ज आपराधिक मुकदमों का है, जिसके बारे में राज्य अदालत को जानकारी नहीं दे रहे हैं। दूसरा बड़ा सवाल यह है कि जब नरेंद्र मोदी ने ऊपर से राजनीतिक सफाई की बात कही थी तब उन्होंने इसकी पहल क्यों नहीं की? सरकार चाहे तो कानून बन कर इस स्थिति में सुधार कर सकती है। राजनीतिक पार्टियां भी पहल करके राजनीति के अपराधीकरण को रोक सकती हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि इन दिनों हर काम करने की जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट पर छोड़ दी गई है। 

देश के मतदाता कई बार अपनी तरफ से राजनीति की सफाई करते रहे हैं। उत्तर प्रदेश के पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लोगों ने आपराधिक छवि वाले लगभग सारे नेताओं को हरा दिया था। बिहार में और दूसरे कई राज्यों में लोगों ने राजनीति की सफाई की। पर राजनीतिक दल लोगों की इस भावना को नहीं समझते हैं। वे जातीय समीकरण साधने के लिए और धन बल व बाहुबल के नाम पर चुनाव जीतने के लिए आपराधिक रिकार्ड वाले नेताओं को टिकट देती रहती हैं। 

कानून के जरिए ही इस मामलों में अदालतों के हाथ भी बंधे हैं। तभी सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों कहा कि चुनाव आयोग इस मामले में कुछ करे और वह जांच करके ऐसे नेताओं को नामांकन रद्द कर दे, जिनके आपराधिक मामले चल रहे हैं। 

हालांकि इसमें कुछ खतरे भी हैं क्योंकि कई मामले ऐसे होते हैं, जो राजनीतिक होते हैं या कई मामले झूठे होते हैं। इसलिए फैसला होने तक इस मामले में कुछ भी करना मुश्किल लगता है। पर राजनीति की सफाई के लिए कोई न कोई रास्ता निकालना होगा। और वह रास्ता अदालत या चुनाव आयोग से ही निकलेगा, पार्टियां कोई पहल नहीं करने वाली हैं। उनकी प्राथमिकता चुनाव जीतने की है। 

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