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भारत की चीन नीति में बदलाव!

श्रुति व्यास
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चीन के प्रति भारत की नीति बदल रही है। कुछ समय पहले जहां टकराव की तैयारी दिख रही थी, कम से कम सेना प्रमुख के बयानों में, वहीं अब सुलह के प्रयास होते दिख रहे हैं। पिछले दस दिन की तीन घटनाएं इस लिहाज से अहम हैं। सबसे पहले विदेश सचिव का पद संभालते ही विजय गोखले का बीजिंग जाना। वैसे भी गोखले को चीन मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। 

इसके बाद खबर आई कि गोखले ने कैबिनेट सचिव को एक नोट भेजा है, जिसमें उन्होंने कहा कि सरकार के मंत्रियों को दलाई लामा या तिब्बत की निर्वासित सरकार के कार्यक्रमों में जाने से बचना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा कि भारत और चीन के संबंध बहुत संवेदनशील मुकाम पर हैं। 

इसके तीन दिन के बाद ही खबर आई कि तिब्बत की निर्वासित सरकार ने भारत का धन्यवाद करने के लिए दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में जो कार्यक्रम रखा था, उसे अब धर्मशाला में आयोजित किया जाएगा। इससे पहले राजघाट पर एक सर्व धर्म प्रार्थना होने वाली थी उसे भी रद्द कर दिया गया है। यह चीन के प्रति भारत की नीति में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है। 

पिछले साल गर्मियों में चीन के साथ ढाई महीने तक टकराव चला था। सिक्किम के डोकलाम सेक्टर में चीन की फौज ने सड़क बनाने का प्रयास किया था, जिसका भारत ने विरोध किया। इसके बाद ढाई महीने तक दोनों देशों की सेना आमने सामने डटी रही। उस समय विजय गोखले बीजिंग में भारत के राजदूत थे। 

अब गोखले भारत के विदेश सचिव हैं और चीन के साथ संबंध सुधार के प्रयासों में लगे दिख रहे हैं। उन्होंने कैबिनेट सचिव पीके सिन्हा के जरिए भारत सरकार के मंत्रियों और दूसरे अधिकारियों को यह निर्देश भिजवाया है कि वे दलाई लामा और तिब्बत की निर्वासित सरकार के कार्यक्रमों से दूरी रखें। 

अब तक भारत में कभी ऐसा नहीं हुआ। भारत हमेशा दलाई लामा को अपना मेहमान मानता है और उनके कार्यक्रमों में मंत्री यहां तक की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक शामिल होते रहे हैं। अब तो खुद दलाई लामा ने चीन के प्रति पुराना खिलाफत वाला नजरिया छोड़ दिया है और सुलह सफाई के प्रयास में लगे हैं। 

ऐसे समय में भारत ने चीन की संवेदनशीलता का इतना ख्याल रखा कि दलाई लामा से दूरी बनानी शुरू कर दी है। यह बड़े बदलाव का संकेत है। 

ऐसा लग रहा है कि भारत चीन के प्रति दो अलग अलग रणनीति के तहत काम कर रहा है। इसमें एक पहलू तो यह है कि भारत अपनी क्षेत्रीय अखंडता और एकता के साथ कोई समझौता नहीं करेगा और अपनी सीमाओं व संप्रभुता में चीन का दखल बरदाश्त नहीं करेगा। 

इस रणनीति के तहत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अरुणाचल प्रदेश के दौरे पर गए। त्रिपुरा में चुनाव प्रचार के क्रम में वे अरुणाचल गए और वहां के लोगों को संबोधित किया। इस तरह भारत ने चीन को दो टूक संकेत दिया कि वह अपनी भौगोलिक सीमाओं को लेकर संवेदनशील है। दूसरी रणनीति अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चीन के साथ टकराव टालना है। 

इसके तहत भारत दलाई लामा के मुद्दे पर चीन को नाराज नहीं करना चाहता। एक तरह से यह मैसेज दिया जा रहा है कि दोनों देश एक दूसरे की संवेदनशीलता का ध्यान रखे। यह रणनीति कितनी दूर तक जाएगी, यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि दोनों देशों के बीच टकराव के कई बिंदु हैं। भारत के मंत्री दलाई लामा के कार्यक्रमों में नहीं जाएंगे तो चीन भारत के पूर्वोत्तर में भौगोलिक सीमाओं का विवाद भूल जाएगा और भारत का दावा स्वीकार कर लेगा, ऐसा सोचना भी सही नहीं होगा। चीन पूरे एशिया का चौधरी बनने का अपना प्रयास जारी रखेगा। 

चीन समूचे एशिया में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है। पहले उसने सिर्फ पूर्वी एशियाई देशों पर नियंत्रण किया था पर अब दक्षिण एशिया में भी उसने अपना विस्तार कर लिया है। भारत के लगभग सभी पड़ोसी देश उसके असर में हैं और भारत को आंखें दिखा रहे हैं।

 इसके बाद चीन का निशाना अमेरिका के दो सबसे करीबी सहयोगी जापान और दक्षिण कोरिया होंगे। ऐसे में भारत या तो बिल्कुल अकेला पड़ेगा या उसे भी अंत में चीन के साथ जाना होगा। भारत कूटनीति, आर्थिकी या सामरिक तैयारियों और क्षमताओं में चीन से मुकाबला नहीं कर सकता है। 

चीन का रक्षा बजट भारत से चार गुना है, प्रति व्यक्ति जीडीपी छह गुना है और विदेशी मुद्रा भंडार भारत से 20 गुना है। भारत की एकमात्र ताकत सवा सौ करोड़ लोगों का बाजार है। भारत अपनी इस ताकत का कैसे इस्तेमाल करता है, उससे सारी चीजें तय होंगी। बाकी दलाई लामा और तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रति 60 साल से चली आ रही नीति में बदलाव करके कुछ हासिल नहीं होने वाला है। उलटे यह मैसेज जाएगा कि भारत ने चीन के आगे घुटने टेक दिए। 

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