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मालदीव में भारत क्या करे?

शशांक राय
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मालदीव को लेकर भारत मुश्किल में फंस गया है। भारत के दोस्त माने जाने वाले पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद निर्वासन में हैं और श्रीलंका में समय काट रहे हैं तो दूसरी ओर मौजूदा राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामिन ने देश में इमरजेंसी लगा रखी है। मोहम्मद नशीद भारत की मदद मांग रहे हैं तो चीन ने दो टूक शब्दों में कहा है कि किसी तीसरी ताकत के दखल देने से हालात बिगड़ेंगे। 

इस दुविधा की स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संकट पर बात की है। व्हाइट हाउस की ओर से बताया गया है गुरुवार को दोनों नेताओं ने मालदीव के संकट पर बात की और लोकतांत्रिक संस्थाओं व कानून के शासन की जरूरत पर जोर दिया। इस बीच मालदीव के राष्ट्रपति ने कई देशों में अपने प्रतिनिधि भेजे हैं। 

भारत की रणनीतिक जरूरत को देखते हुए मालदीव ने नई दिल्ली भी अपना दूत भेजने का प्रस्ताव किया पर भारत ने इससे इनकार कर दिया है। इसका कारण यह बताया गया कि प्रधानंमत्री मोदी शुक्रवार को चार देशों के दौरे पर जा रहे हैं और सुषमा स्वराज भी विदेश दौरे से गुरुवार को देर रात लौटने वाली थीं। पर क्या इससे भारत की जिम्मेदारी खत्म हो गई? क्या वह हिंद महासागर में स्थित रणनीतिक रूप से इतने अहम मालदीव को उसके हाल पर या चीन के हाल पर छोड़ सकता है?

असल में मालदीव में पिछले कई सालों से संकट चल रहा है। मोहम्मद नशीद को राष्ट्रपति पद से हटाने और उनको जेल में डालने से लेकर उनके निर्वासन तक के घटनाक्रम में भारत कहीं न कहीं सक्रिय रहा था। जब नशीद के खिलाफ मुहिम छिड़ी और सत्ता पर कब्जे की लड़ाई चली तो वे भारतीय दूतावास में मीटिंग के बहाने पहुंच गए थे और कोई 28 दिन तक वे दूतावास में रहे थे। 

तब भारत ने बीच बचाव करके उनकी गिरफ्तारी टलवाई थी। असल में मालदीव भारत के लिए रणनीतिक और सामरिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए भारत उसकी अनदेखी नहीं कर सकता है। तभी 30 साल पहले 1988 में कुछ छापामारों ने अब्दुल गयूम की सत्ता पलट कर मालदीव पर कब्जा करना चाहा था तब उस समय के प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सेना भेजी थी। 

ऑपरेशन कैक्टस के नाम से चले अभियान में अब्दुल गयूम के तख्त पलट की कोशिश को रोका गया था। उसी तरह इस बार मोहम्मद नशीद चाहते थे कि भारत अपने एक राजनयिक के नेतृत्व में सेना भेजे और सुप्रीम कोर्ट के जजों को छुड़ाए और देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को बहाल कराए। 

दूसरी ओर राष्ट्रपति यामिन ने सबसे पहले भारत में अपना दूत भेजने का प्रस्ताव किया, जिसे भारत ने ठुकरा दिया। इससे यामिन प्रशासन की ओर से निराशा और दुख जाहिर किया गया है। 

मालदीव में अब्दुल्ला यामिन के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही विपक्षी पार्टियों के नेताओं को या तो जेल में डाल दिया गया है या उन्हें देश निकाला दिया गया है। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने इसी से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए जेल में बंद विपक्षी नेताओं की रिहाई के आदेश दिए थे, जिसके बाद मौजूदा संकट शुरू हुआ। यामिन ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की बजाय फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को ही गिरफ्तार कर लिया। 

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद के बाहर तक चारों तरफ सेना तैनात कर दी। हालात तब और बिगड़े जब उन्होंने 15 दिन के लिए इमरजेंसी लगा दी। मालदीव से निर्वासित पूर्व राष्ट्रपति नशीद चाहते हैं कि भारत अपनी सेना भेज कर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन कराए यानी जेल में बंद राजनीतिक कैदियों को रिहा कराए। 

वे यह भी चाहते हैं कि देश में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव हो। ध्यान रहे यामिन के ऊपर चुनाव में धांधली करने का आरोप भी लग चुका है। अब हालात ऐसे उलझे हैं कि यामिन प्रशासन चीन, पाकिस्तान, सउदी अरब आदि देशों में अपने प्रतिनिधि भेज कर अपने लिए समर्थन जुटा रहा है। ऐसे में उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में माहौल बनाने का काम कौन करेगा?

कूटनीतिक लिहाज से भारत के लिए जरूरी है कि वह इस संकट में दखल दे। बेशक वह सेना न भेजे, लेकिन कूटनीतिक स्तर पर प्रयास करके देश में इमरजेंसी खत्म कराने, जेल में बंद नेताओं के साथ साथ सुप्रीम कोर्ट के जज को रिहा कराने और स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए भारत को दखल देना चाहिए। 

भारत मालदीव से जितनी दूरी बनाएगा, चीन उतना करीब पहुंचेगा। भारत को दूर रख कर चीन काफी हद तक मालदीव में अपना दखल बना चुका है। हिंद महासागर में चीन की मौजूदगी बढ़ी तो सामरिक रूप से भारत के लिए चिंता बढ़ेगी। कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी के लिए दुनिया की महाशक्तियों के साथ अपनी कथित दोस्ती का फायदा उठाने का यह सही समय है। 

अगर किसी तरह से भारत मालदीव में अपना दखल बनाता है तो अच्छा है और नहीं तो उसे चीन को भी दूर रखने का प्रयास करना चाहिए। मालदीव के अपना दूत भेजने के प्रस्ताव को ठुकरा कर भारत ने एक छोटा मौका गंवाया है उसे चाहिए कि वह जल्दी ही नए अवसर बनाए और अपनी भूमिका बढ़ाए।  

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