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कौन अपनी इच्छा से मरना चाहता है?

अजित द्विवेदी
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महाभारत में यक्ष और युधिष्ठिर संवाद का प्रसंग है, जिसमें यक्ष पूछते हैं – किम आश्चर्यम्ा्? यानी आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर ने कहा कि धरती पर जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है फिर भी कोई मरना नहीं चाहता है, यह सबसे बड़ा आश्चर्य है! असल में मृत्यु की अनिवार्यता और उसे टालते रहने की जिजीविषा का ही नाम जीवन है। अमर होना यानी हमेशा जीवित रहने की चाहना देवताओं की भी सबसे बड़ी इच्छा रही है। तभी समुद्र मंथन से निकले अमृत को लेकर देवों और राक्षसों में भयानक लड़ाई हुई। अमरत्व के लिए हुए यज्ञ और तपस्या की अनगिनत मिसालें हिंदू धर्म ग्रंथों में मिलती हैं। 

जीवन ईश्वर की दी हुई चीज है और ईश्वर ही इसे छीन सकता है, यह सिद्धांत न सिर्फ धार्मिक तौर पर, बल्कि कानूनी रूप से भी स्वीकार किया जाता रहा है। इसी आधार पर फांसी देने का विरोध होता रहा है और दुनिया के कई देशों ने फांसी की सजा इसी आधार पर खत्म कर दी कि जब जीवन उन्होंने नहीं दिया तो उसे छीनने का अधिकार उनके पास नहीं है। तभी जब सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी तो देश में इस पर बहस छिड़ गई। 

नैतिक रूप से इस पर सवाल उठे हैं तो इस बात को लेकर भी बहस हुई है कि इसे कैसे लागू किया जाएगा? इस बात की गारंटी कौन करेगा कि फैसले का दुरुपयोग नहीं होगा और इच्छामृत्यु सिर्फ उन्हीं को मिलेगी, जो इच्छा करेंगे? इसकी भी गारंटी कौन करेगा कि किसी को इसके लिए मजबूर नहीं किया जाएगा? भारत के डॉक्टरों और अस्पतालों की गारंटी कौन लेगा कि वे चंद रुपए के लिए इस कानून का दुरुपयोग नहीं करेंगे?

सबसे पहले इन सवालों पर विचार किया जाना चाहिए, खासतौर से भारत के संदर्भ में! इस पर विचार से पहले एक ताजा आंकड़े पर नजर डालने की जरूरत है। इंडियन एक्सप्रेस में छपे सिक न्यूबॉर्न केयर यूनिट्स, एसएनसीयू के एक आंकड़े के मुताबिक भारत में जन्म लेने वाले नवजात शिशुओं को अगर जन्म के समय अगर कोई बीमारी होती है तो ज्यादातर लोग लड़कियों को इंटेसिव केयर यूनिट में नहीं दाखिल कराते हैं। लड़कियों के मुकाबले लड़कों को यहां भी प्राथमिकता मिलती है। इसके पीछ यह मानसिकता काम करती है कि लड़की है, नहीं भी बचेगी तो क्या हो जाएगा! 

यह उसी सोच का विस्तार है, जिसके तहत हर साल लाखों बच्चियां गर्भ में मार दी जाती हैं। सवाल है कि जिस देश में लोग थोड़े से फायदे या सुविधा के लिए लाखों अजन्मी बच्चियों को मार देते हैं, जहां मामूली दहेज के लिए बहुओं को जला कर मार डाला जाता है, जहां इज्जत के नाम पर महिलाओं को मारा जाता है, जहां बुजुर्ग बोझ माने जाते हैं और उन बुजुर्गों के श्रवण कुमार अपने बेपढ़े लिखे बुजुर्गों को कुंभ के मेले में भटक जाने के लिए छोड़ आते हैं, वहां किसी बीमार व्यक्ति का जीवन खत्म करने की अनुमति देना एक बहुत बड़े सामाजिक और मानवीय संकट को बुलावा देना होगा!

इसमें संदेह नहीं है कि इस फैसले के पीछे अदालत की मंशा बुजुर्ग या बीमार को कष्टों से मुक्ति दिलाने की है। अगर किसी को असहनीय तकलीफ हो, लाइलाज बीमारी हो, कोई पूरी तरह से निष्क्रिय हो तो अपनी इच्छा से मृत्यु चुनने का अधिकार दिया गया है। इस मंशा पर सवाल नहीं उठाया जाए तब भी यह सवाल तो उठेगा कि इसे सही तरीके से लागू करने की गारंटी किसकी होगी? इस देश में पीएनडीटी एक्ट 1994 से लागू है, जिसके तहत गर्भ में लिंग परीक्षण को अपराध बनाया गया है। 

24 साल पुराने इस कानून में अभी तक सजा पाने वालों की संख्या हजार में नहीं है, पर गर्भ में मार डाली गई बच्चियों की संख्या करोड़ में है। अस्पतालों और डॉक्टरों की मिलीभगत से गली गली में यह अपराध हो रहा है। फिर क्या गारंटी है कि गंभीर और खर्चीली बीमारियों से जूझ रहे बुजुर्गों या नौजवानों की भी इच्छामृत्यु का आंकड़ा आसमान नहीं छूने लगेगा! अब तो यह भी खबर आई है कि इस फैसले से इच्छामृत्यु को खुदकुशी नहीं माना जाएगा और मरने वाले की बीमा राशि उसके आश्रितों को मिलेगी। ये सारे संकेत दुरुपयोग की संभावना की ओर इशारा करते हैं।  

फिर यह सवाल भी है कि आधुनिक चिकित्सा के इस दौर में कौन सी बीमारी लाइलाज रह गई है? एक तरफ हर बीमारी के ठीक होने का दावा किया जा रहा है, सकारात्मक सोच के साथ उससे लड़ने की बात कही जा रही है, लाइलाज बीमारियों से लड़ कर सफल रहे लोगों की मिसालें दी जा रही हैं और दूसरी ओर जीवन के ऊपर मृत्यु को तरजीह देने की भी बात हो रही है, इस विरोधाभास को क्या कहा जाए! तकलीफ मिटाने के लिए जीवन खत्म करने की बजाय हर व्यक्ति को सस्ती और सुलभ चिकित्सा की व्यवस्था करनी चाहिए! जीवन को बेहतर बनाने के उपाय होने चाहिए और इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होना चाहिए। 

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सम्मान से जीने के अधिकार में ही सम्मान से मरने का अधिकार भी शामिल है। सवाल है कि क्या इस देश के हर नागरिक का जीवन सम्मानजनक है? लोग भूख से, ठंड से, लू से, इलाज की कमी से मरते रहते हैं, कर्ज में डूबे किसान और आर्थिक विपन्नता झेल रहे आम लोग आत्महत्या कर रहे हैं! जहां लोगों को सम्मान से जीने की स्थितियां नहीं हासिल हैं वहां सम्मान से मरने की बात एक बड़ी विडंबना है।

इस देश में अदालत को यह आदेश देना होता है कि बच्चे अपने बुजुर्ग माता पिता की देखभाल करें नहीं तो उन पर कार्रवाई होगी, फिर वहीं अदालत इच्छामृत्यु की भी मंजूरी देती है! यह क्या कम आश्चर्य की बात हैं।

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