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आजाद भारत में गड़बड़ी कहां हुई?

भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने 26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकार करने के अवसर पर दो पछतावे व्यक्त किए थे। कि सभा को दो कार्य करने चाहिए थे जो नहीं हो सके। एक यह कि देश की सर्वोच्च संस्था, संसद, का सदस्य होने के लिए योग्यता का कोई मानदंड नहीं बनाया गया। दूसरे, देश का संविधान अपनी भाषा में नहीं बना। 

कहना चाहिए कि इन दो गलतियों के अपरिमित दुष्परिणाम हुए। चाहे हम उसे देख सकें या नहीं। हमारी संसद और विधान सभाओं में कैसे लोग आते रहे हैं, इस पर विविध आंकड़े छपते रहे हैं। मगर एक बात नहीं आई। कि उन में कितने लोग हैं जो चार पन्ने का गंभीर दस्तावेज पढ़-समझ सकते हैं या एक पन्ने का लिख सकते हैं? यद्यपि वहाँ मुख्य काम ही यही है! आखिर वे कानून-निर्माता हैं। पर व्यवहार में अधिकांश कठपुतलों में बदल गए हैं, जिन्हें स्वयं पढ़ने-जानने की खास जरूरत नहीं। जबकि राजेंद्र बाबू ने उन्हें ‘बौद्धिक क्षमता’ के साथ-साथ ‘संतुलित विवेक’, ‘स्वतंत्र बुद्धि’ और ‘चरित्रवान’ होना जरूरी माना था।

पर शुरू से ही यहाँ सांसदों, विधायकों में ठीक विवेक और स्वतंत्र चेतना को ही हतोत्साहित किया गया। इस से किसी सत्ताधारी को जो लाभ हुए हों, देश की घोर हानि हुई। यदि देश की सर्वोच्च विचार-संस्था में लोग विचार-बाधित कर दिए जाएं, तो और क्या होगा? हर सत्ताधारी अपने सांसदों से केवल एक माँग करता है, कि वे ‘जनता तक सरकार की उपलब्धियाँ पहुँचाएं’। जैसे रेडियो, दूरदर्शन, अखबारों में पन्ने-पन्ने के नियमित विज्ञापन काफी नहीं। सो सांसदों को सेल्स-मैन की तरह फेरी लगाकर सरकार रूपी माल बेचना चाहिए! 

इसीलिए आज कोई अच्छा कानून बनाने अथवा किसी समस्या का उपाय खोजने में योग्य तो दूर, रुचि भी रखने वाले सासंद खोजने पर नहीं मिलेंगे। संसद में निरर्थक बोलते घंटों सब का समय और देश का संसाधन नष्ट करना सामान्य दृश्य है। 

जब विधायिका का हाल यह हो, तब कार्यपालिका, न्यायपालिका कितनी दूर रहती। सत्ताइस वर्ष पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश ने कहा था कि नीचे न्यायालयों में बहुत भ्रष्टाचार है। अब उँचे का हाल भी दिख रहा है। नौकरशाही वैसे ही मनमानी, लापरवाही और उत्कोच से जुडी बदनाम है। अब शिक्षा संस्थाओं, एजेंसियों के प्रमुख तक रिश्वत में पकड़े जाते हैं। निकृष्ट शिक्षक नियमित खबर बनते हैं। अस्पतालों, डॉक्टरों में लूट की प्रवृति जगजाहिर बढ़ रही है। आदि, आदि। 

इन सब को भष्टाचार कहना समस्या को गलत नाम देना है। रोग अधिक गंभीर है। यह सार्वजनिक कामों के पूर्णतः विकृत होने और प्रायः काम का झूठा नाटक जैसी बात है। यह रोग यहाँ ब्रिटिश शासन तक नहीं था। तब स्वतंत्रता के बाद भारत में ऐसा कैसे होता चला गया? 

राजकीय तंत्र के कर्णधार समझते हैं कि इतने मंत्री, अफसर, न्यायाधीश, सिपाही, आदि हैं। अतः देश का काम तो चल ही रहा है। इस बीच तनिक मैं अपना स्वार्थ साध लूँ। किसी धूर्त को सांसद, किसी लगुए को सचिव, किसी लफ्फाज को ज्ञानाध्यक्ष बना दूँ - तो क्या फर्क पड़ेगा! विश्वविद्यालय में पीएच.डी. प्रवेश परीक्षा में शून्य अंक लाने वाले को दाखिला देना भी उसी भावना में है। मानो, और विद्वान तो हैं ही, एक ऐसा ही बनेगा तो क्या बिगड़ जाएगा...

पर ठीक इसी प्रवृत्ति ने हमारे देश को हास्यास्पद बना दिया है। पार्टी या निजी वफादारी, मतवाद, वोट की सनक, भतीजावाद, आदि ने जिम्मेदार पदों की ऐसी दुर्गति कर दी कि यह दुर्गति नहीं लगती। मानो ऐसे ही मंत्रियों, सांसदों, सचिवों, राजदूतों, अध्यक्षों, न्यायमूर्तियों, प्रशासकों, शिक्षकों, आदि से देश बढ़ेगा। यह लज्जास्पद आत्मप्रवंचना है। पर हम इसे देखने से भी इंकार करते हैं। 

आखिर क्या कारण कि सालाना यूरोप घूमने वाले हमारे असंख्य कर्णधार इस मामूली तथ्य पर नहीं सोचते कि वहाँ मामूली ट्रैफिक कांस्टेबल भी बड़े से बड़े नेता या स्टार तक को किसी गलती पर सहजता से जुर्माना कर देता है? वह भौतिक या शारीरिक रूप से हमारे पुलिसकर्मी से भिन्न नहीं है। फिर अंतर कहाँ है, इस पर हमारे कर्णधारों ने कभी न सोचा। संसद, मीडिया या विश्वविद्यालय, कहीं इस पर विमर्श तक नहीं हुआ है। 

यह उस अयोग्यता और गैर-जिम्मेदारी का संकेत है, जो हमारे अधिकांश पदधारियों की सामान्य विशेषता हो गई है। वे जरूरी के बदले गैर-जरूरी, सही के बदले गलत, असली के बदले नकली काम करने और बोलने की आदत डाल चुके हैं। यानी सामूहिक मिथ्याचार व पाखंड। 

यह केवल विधायिका के टिकट देने-दिलाने तक सीमित नहीं, जहाँ नीति-निर्माण योग्यता या चरित्र कोई चीज नहीं रह गई। विभागों, आयोगों, संस्थाओं की अधिकांश नियुक्तियों में भी वही दूध के बदले पानी डालने की प्रवृत्ति रही है। जिस कार्य के लिए नियुक्ति होनी है, वह कसौटी नहीं रहती। कागजी खाना-पूर्ति कर निर्णय किसी और आधार पर होते हैं। अयोग्य लोगों को जिम्मेदार पद दे दिए जाते हैं। यह स्वतंत्र भारत में बिलकुल शुरू से शुरू हो गया।

चूँकि ऐसी गड़बड़ी देखने की कोई व्यवस्था नहीं, अथवा उसे देखने वाली समिति की स्थापना भी वैसे ही होती है। अतः कुल मिला कर राजकीय नौकरशाही का केवल आकार बढ़ता गया। साथ ही अकर्मण्यता और उत्तरदायित्वहीनता भी। इसीलिए सांसदों से लेकर कर्मचारियों तक के मूल्यांकन की चिंता नहीं होती। सब कुछ ऊपरी रूटीन-सा है। इसीलिए गड़बड़ियों की वास्तविक जिम्मेदारी तय करने से भी बचा जाता है।  

यह पूरी समस्या पात्रता की उपेक्षा है, जिस पर राजेंद्र बाबू को पछतावा था। आज इस के परिणाम रोज दिखते हैं। स्वच्छता के लिए अलग टैक्स भरने को मजबूर नागरिक भी कूड़े के ढेर से दबकर बेमौत मारे जाते हैं। वह भी राष्ट्रीय राजधानी में! वहीं रोज अपराधों की झड़ी की कोई कर्णधार सुध नहीं लेता। मानो यह कोई विषय नहीं, जिस पर बोलें या फिक्र करें।  

निस्संदेह, यह सब सुधर सकता है। भारत में भी योग्य, कर्मठ लोग अवश्य हैं। समस्या यह है कि राजकीय, प्रशासकीय, शैक्षिक क्षेत्रों के लिए उन्हें ढूँढने या तैयार करने की कोई चिंता नहीं की गई। इसीलिए राजनीति में सरदार पटेल जैसे विचारशील, निःस्वार्थ देशसेवक सा दूसरा नाम हमें अभी तक नहीं मिल सका। प्रशासकों में कभी-कधार कोई टी.एन. शेषन, के.पी.एस. गिल, डी.एन. गौतम या के.जे. राव संयोग से सही स्थान पर आ जाते हैं। जब कि यही नियम होना चाहिए था! पदों को लड्डू नहीं, भार समझना चाहिए था। 

सिंगापुर जैसे सुव्यवस्थित शासन का रहस्य इस में है कि वहाँ जिले स्तर से उपर की तमाम नियुक्तियों में उम्मीदवार की चारित्रिक, मनोवैज्ञानिक क्षमता की भी जाँच होती है। केवल खाना-पूरी योग्यता नहीं। कुछ वही चीज भारत में निजी क्षेत्र में है। हमारे व्यवसायी या उद्योगपति अपने कर्मचारियों की केवल डिग्री, कागज या वरिष्ठता को महत्व नहीं देते। न ज्यादा बहाने सुनते हैं। उन की वास्तविक क्षमता, उपलब्धि ठोक-बजा कर देखते हैं। इसी चीज को राजकीय क्षेत्र में भी लागू होना चाहिए। अन्यथा देश आगे नहीं बढ़ सकता। अपनी पीठ खुद थपथपाना और झूठे प्रचार से लोगों को भरमाना हमें छोड़ देना चाहिए।  

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