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सत्ता विरोध का माहौल तो है!

अजित द्विवेदी
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सत्ता हमेशा विरोध बढ़ाती है। इस विरोध की तीव्रता कहीं कम, कहीं ज्यादा होती है। जरूरी नहीं है कि सरकार के कामकाज से विरोध या समर्थन का माहौल बने। इसके कई दूसरे कारण भी हो सकते हैं। पिछले दो दशक में भारत की राजनीति दोनों तरह की स्थितियों की गवाह रही है। लोगों ने सरकारों को बार बार रिपीट किया है तो दूसरी ओर हर पांच साल पर सत्ता बदल भी दी है। कोई भी पार्टी या सरकार यह दावा नहीं कर सकती है कि उसने बहुत अच्छा काम किया इसलिए उसे लोगों ने दूसरी या तीसरी बार चुना और न यह दावा किया जा सकता है कि जिस सरकार की वापसी नहीं हुई उसका कामकाज बहुत खराब रहा। अच्छे काम करने वाली सरकारें भी हारी हैं और बिना काम किए भी कई सरकारों की बार बार वापसी होती रही है।

भारतीय जनता पार्टी गुजरात, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार चुनाव जीत रही है पर दूसरे राज्यों में उसका यह जादू नहीं चल पाता है। अभी तो ज्यादातर राज्यों में भाजपा की सरकार है पर इन तीन राज्यों को छोड़ कर बाकी राज्यों में वह कांग्रेस या दूसरी पार्टियों को हरा कर सत्ता में आई है। कांग्रेस एक दर्जन राज्यों में अपनी सरकार बचाने में नाकाम रही। 

भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों ने कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को हरा कर सत्ता हासिल की। पर भाजपा को अपने शासन वाले राज्यों में सरकार बचाने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद सिर्फ दो ऐसे राज्यों में चुनाव हुए, जहां भाजपा का शासन था। इनमें से एक गोवा था, जहां भाजपा बुरी तरह हारी। यह अलग बात है कि उसने जोड़ तोड करके सरकार बना ली। दूसरा चुनाव गुजरात का था, जहां बड़ी मुश्किल से भाजपा बहुमत का आंकड़ा पार कर पाई। 

तभी जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं कि भाजपा के खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी नहीं है तो उस पर यकीन नहीं किया जा सकता है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव और उसके बाद 11 राज्यों के उपचुनावों के नतीजों के बाद अमित शाह की भागदौड़ को देख कर लगता है कि खुद उनको भी इस बात पर यकीन नहीं है। हर जगह सत्तारूढ़ पार्टी को हराने की मतदाताओं की सोच ने भाजपा नेतृत्व को भी चिंता में डाला है। तभी उनकी ओर से एंटी इन्कंबैंसी को कम करने के सारे प्रयास किए जा रहे हैं। 

सरकार की उपलब्धियों का प्रचार हो रहा है, गठबंधन मजबूत किया जा रहा है और बड़ी संख्या में टिकट काटने की तैयारी भी हो रही है। अपने समर्थकों और विरोधियों तक पहुंचने के लिए समर्थन के लिए संपर्क अभियान चलाया गया है। कुछ पुराने सहयोगियों की जगह नए सहयोगी लाने का काम भी हो रहा है। आगे होने वाले चुनावों में सत्ता विरोध की राजनीति को लेकर भाजपा नेतृत्व में यह सोच दिख रही है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ एंटी इन्कंबैंसी नहीं है। भाजपा को भरोसा है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के प्रति लोगों का समर्थन पहले से ज्यादा है तभी पार्टी के नेता पहले से ज्यादा सीटें जीतने का दावा कर रहे हैं। तभी भाजपा नरेंद्र मोदी के कंधे पर बैठा कर राज्यों के मुख्यमंत्रियों की नाव भी पार लगाने की रणनीति पर काम कर रही है। भाजपा के नेता मान रहे हैं कि अगर लोकसभा के साथ ही राज्यों में विधानसभा के चुनाव हों तो लोग राज्य सरकारों के कामकाज पर ध्यान नहीं देंगे और मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दे देंगे। 

पर सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी के प्रति समर्थन की लहर इतनी मजबूत है कि उसके सहारे राज्यों की नाव भी पार लग जाए? कई राज्यों में भाजपा की सरकारों के खिलाफ बहुत मजबूत सत्ता विरोधी लहर है। दूसरे, राष्ट्रीय स्तर पर लोगों को मोदी का मजबूत विकल्प भले नहीं दिख रहा है पर राज्यों में मजबूत विकल्प भी उपलब्ध हैं। 

तीसरे, राज्यों में प्रादेशिक क्षत्रपों और कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले बेहतर गठबंधन भी बन रहा है या बन जाएगा। उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों में उपचुनावों में विपक्षी पार्टियों को मिली सफलता इस बात का संकेत है कि राज्यों में सत्ता विरोधी लहर है, विपक्ष के पास विकल्प भी है और उसका गठबंधन मजबूत है। 

सो, क्या ऐसी स्थिति में राज्यों की सत्ता बचाने के लिए नरेंद्र मोदी अपनी सत्ता दांव पर लगाएंगे? क्या वे लोकसभा के साथ साथ भाजपा शासित आधा दर्जन राज्यों में चुनाव कराएंगे? ध्यान रहे इस साल के अंत में भाजपा शासित तीन राज्यों – राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव है। अगले साल लोकसभा के साथ विपक्षी शासन वाले तीन राज्यों – आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओड़िशा में चुनाव है। और लोकसभा के तुरंत बाद भाजपा शासित तीन राज्यों – महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में चुनाव है। अगर थोड़ा बहुत एडजस्टमेंट हो तो लोकसभा के साथ इन नौ राज्यों के चुनाव हो सकते हैं, जिनमें से छह में भाजपा की सरकार है। 

केंद्र में मोदी सरकार के प्रति लोगों का समर्थन होने का दावा भी अतिरंजित लगता है क्योंकि हाल के उपचुनावों में प्रधानमंत्री मोदी का नाम भी दांव पर लगा था। कैराना लोकसभा के बगल में उन्होंने मतदान से एक दिन पहले रैली की थी और झारखंड में भी गोमिया विधानसभा के पड़ोस में तीन दिन पहले उनकी रैली हुई थी। यह भी हकीकत है कि उन्होंने किसी दूसरे नेता के मुकाबले देश के लोगों के मन में ज्यादा उम्मीदें जगाई थीं और इसलिए लोगों के मन में निराशा का स्तर भी उतना ही बड़ा हो सकता है। सो, भाजपा भले सोच रही हो मोदी के नाम पर राज्यों की नैया भी पार लग जाएगी पर कहीं ऐसा न हो कि राज्यों में भाजपा सरकारों की अलोकप्रियता मोदी की नाव भी डूबो दे!

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