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मोसुल में भारतीयों की हत्या से उठे सवाल

बलबीर पुंज
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हाल में देश के वह 38 सपूत अपने पैतृक मिट्टी में पंचतत्व में विलीन हो गए, जो पिछले दिनों भारत सरकार के अथक प्रयासों के बाद अवशेषों के रूप में इराक से भारत लाए गए थे। इन सभी को कुख्यात आतंकी संगठन आई.एस के दरिंदों ने मोसुल में निर्ममता के साथ मौत के घाट उतार दिया था। मृतकों में सर्वाधिक संख्या पंजाबवासियों की है। प्रश्न है कि आखिर क्यों आई.एस के चंगुल में फंसे इन भारतीयों का इतना वीभत्स अंत हुआ? 

वर्ष 2014 में इराक की जिस कंपनी में 40 भारतीय कार्यरत थे, उसमें बांग्लादेशी सहित विभिन्न-विभिन्न राष्ट्रीयता के लोग भी काम करते थे। जब आई.एस ने मोसुल पर कब्जा करना शुरू किया और उनकी नजर कंपनी के इन मजदूरों पर गई, तब उन्होंने आवश्यक जानकारी जुटाने के बाद भारतीयों और बांग्लादेशियों को अलग-अलग कर दिया, जहां से बाद में बांग्लादेशियों के दल को इरबिल भेज दिया गया। इसी में हरजीत मसीह नाम का भारतीय भी शामिल था, जिसे भोजन प्रबंधक ने मुस्लिम पहचान देकर बांग्लादेशियों के साथ इरबिल छोड़ा था। 2017 में मोसुल के आई.एस के कब्जे से मुक्त होने के बाद 39 भारतीयों के शव बदुश स्थित सामूहिक कब्रगाह से प्राप्त हुए, जिनकी पहचान सघन जांच और डीएनए मिलान के बाद संभव हुई। 

आखिर किसने इन आतंकियों को इराक में कर्मचारियों की भीड़ में से भारतीयों को चिन्हित कर उन्हे मौत के घाट उतारने के लिए प्रेरित किया? क्या यह सत्य नहीं कि वह भारतीय केवल इसलिए मार दिए गए, क्योंकि वे "काफिर-कुफ्र" थे और "गैर-मुस्लिम" होने के कारण बांग्लादेशियों से अलग कर दिए गए? क्या कट्टर इस्लामी शासन व्यवस्था में "काफिर-कुफ्र" का यही हश्र होता है? 

मुस्लिम समाज के एक वर्ग द्वारा स्थापित इस्लामी ब्रैंड में स्वयं को एकमात्र सच्चा और अपनी मान्यताओं को सर्वोच्च मानने का दर्शन निहित है। इस्लाम के जिस संस्करण को आधार बनाकर आई.एस आतंकियों ने मोसुल भारतीयों की हत्या की, उसमें "काफिर-कुफ्र" को केवल दो विकल्प दिए जाते है- या तो वह उनके द्वारा परिभाषित इस्लाम को स्वीकार करें या फिर मरने के लिए तैयार हो जाएं। 

इसी जहरीली मानसिकता ने सातवीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम को भारत (सिंध) पर आक्रमण के लिए प्रेरित किया, मध्यकाल में भारतीय उपमहाद्वीप में हिंदुओं का तलवार के बल पर मतांतरण अभियान चलाया, उन्हे मौत के घाट उतारा, 19वीं शताब्दी के अंत में मुस्लिम अलगाववाद की नींव तैयार की, 1920 में मुस्लिमों को "हिजरत" के लिए उत्तेजित किया, उग्र खिलाफत आंदोलन के लिए उकसाया, मोपला नरसंहार की पटकथा लिखी, 1946 में बंगाल में सीधी कार्यवाही का आह्वान किया, भारत को दो टुकड़ों में बांटा, 1980-90 के दशक में कश्मीर को हिंदुओं से मुक्त करवाया, 2001 में ओसामा बिन लादेन ने न्यूयॉर्क पर 9/11 हमला किया, 2002 में गोधरा में निरपराध कारसेवकों को जिंदा जलाया और 2008 में हाफिज सईद ने मुंबई पर 26/11 हमला करवाया। आज यही दर्शन- विश्व में मानवता का सबसे बड़ा शत्रु बन गया है, जो वैश्विक प्रबुद्ध समाज की शुतुरमुर्ग प्रवृति के कारण विकराल रूप ले चुका है। 

इस भयावह घटनाक्रम से एक मूल प्रश्न यह भी खड़ा होता है- भारत सहित विश्व में जो स्वघोषित उदारवादी, प्रगतिवादी और पंथनिरपेक्ष यह दावा करते थकते नहीं कि आतंकवाद का किसी भी मजहब से संबंध नहीं होता, क्या मोसुल में भारतीयों की नृशंस हत्या और घटना की परिस्थिति के बाद उनकी मानसिकता में कोई परिवर्तन आया होगा? मुझे इसकी संभावना कम ही लगती है। 

कुछ समय पहले भारत में जिस स्वयंभू सेकुलरिस्ट जमात ने मोहम्मद अखलाक, पहलु खां और जुनैद की दुर्भाग्यपूर्ण मौतों के लिए "कट्टर हिंदुत्व" को जिम्मेदार ठहराकर भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर दोषारोपण किया था, देश को विश्व में "असहिष्णुता" के नाम पर कलंकित करने का प्रयास करते हुए सड़क से लेकर संसद तक स्यापा किया और हिंसा के शिकार पीड़ितों के परिजनों की वित्तीय सहायता को लेकर अभियान छेड़ा- क्या उस जमात ने मोसुल में 39 "काफिर" भारतीयों की निर्मम हत्या के पीछे की विषाक्त चिंतन की भर्त्सना की? देश के विभिन्न शहरों में पीड़ित परिजनों को न्याय दिलाने हेतु कोई कैंडल मार्च निकाला? मृतकों के परिजनों की आर्थिक सहायता हेतु कोई मुहिम छेड़ी?  जब 20 मार्च को विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संसद को मोसुल में भारतीयों के जीवित नहीं होने की सूचना दी, तब कांग्रेस सहित देश के अधिकतर स्वयंभू सेकुलरिस्टों ने सरकार पर देश और पीड़ित परिवारों को गुमराह करने का आरोप लगाया। वास्तव में, यह उसी शुतुरमुर्ग प्रवृति का एक और प्रत्यक्ष उदाहरण है, जिसमें तथ्यों को तोड़-मरोड़कर सार्वजनिक विमर्श में इन हत्या के मूल कारणों पर चर्चा को भटकाया गया। इसी विकृति ने हाल महीनों में कासगंज में चंदन की हत्या, दिल्ली में अंकित को सरेआम मौत के घाट उतारना और बंगाल में रामनवमी पर जय श्रीराम के नारों से शोभायात्रा पर पथराव आदि घटनाओं पर भी निष्पक्ष चर्चा को रोकने का प्रयास किया था। 

मोसुल की हृदय-विदारक घटना का देश की सामाजिक और आर्थिकी से भी गहरा सरोकार है- जिसके केंद्र-बिंदु में सीमित विकास में लोगों के भीतर निरंतर बढ़ती हुई अपेक्षा है। भारत सरकार के अनुसार, विदेशों में बसे प्रवासी भारतीयों (भारतीय मूल के नागरिक सहित) की संख्या तीन करोड़ से अधिक है। इन्ही लोगों में से लगभग 60 लाख भारतीय अरब देशों सहित मध्य-पूर्व एशिया में बसे है, जो अधिकांश श्रमिक और घरेलू कर्मचारी के रूप में कार्यरत है। एक आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2017 में विदेशों में बसे इन्हीं भारतीयों ने देश में लगभग 65 बिलियन अमेरिकी डॉलर भेजे थे, जोकि विश्व में सर्वाधिक है और चीन इस मामले में दूसरे स्थान पर है। 

क्या इराक में मजहबी आतंक का शिकार हुए अधिकांश भारतीय और अक्सर रोजगार की तलाश में विदेश (मध्य-पूर्व एशिया सहित) का रुख करने वाले अधिकतर नागरिक ग्रामीण और पिछड़े समाज से संबंधित नहीं होते? देश के इन क्षेत्रों से लोगों के पलायन (देश-विदेश सहित) का प्रमुख कारण मूलभूत सुविधाओं (परिवहन, सड़क, संचार, इंटरनेट, विद्युत आपूर्ति, पेयजल और चिकित्सालय) की कमी, लचर शिक्षा व्यवस्था और बढ़ती आकांक्षाएं है। जो युवक यहां स्नातक-स्नातकोत्तर भी है, उनमें से एक बड़ा वर्ग प्रतिस्पर्धी युग में प्रतिभाहीन होने के कारण मीलों पीछे छूट जाते है। 

फिर भी अपनी निरंतर बढ़ती अपेक्षाओं को पूरा करने और अधिक धन अर्जित की लालसा में विदेश का रूख करने लगते है, जिसमें कई बदकिस्मत कबूतरबाजों के जाल फंसकर गैर-कानूनी मार्ग का उपयोग करते है। यदि इस प्रकार के पलायन को रोकना है, तो देश के उपेक्षित क्षेत्रों को चिन्हित कर वहां विकास को पहुंचाना होगा, गुणवत्तायुक्त शिक्षण व्यवस्था की स्थापना करनी होगी- जिससे देश का संपूर्ण मानव संसाधन अपनी कर्मभूमि की विकास यात्रा में शामिल हो सके। 

मोसुल में जिन 39 परिवारों ने इस्लामी आतंकवाद में अपनों को खोया है, उनकी सहायता के लिए सरकार ने वित्तीय सहायता आदि की घोषणा की है। इसके अतिरिक्त, उन संगठनों को भी आगे की आवश्कयता है, जो आतंकवाद के दंश की टीस को समझते है। इसी अग्रिम पंक्ति में एक नामी दैनिक समाचारपत्र समूह द्वारा 1983 में गठित ‘शहीद परिवार फंड’ भी शामिल है, जिसने 35 वर्षों में सैकड़ों आतंकवाद पीड़ित परिवारों के साथ शहीदों के परिजनों को 13 करोड़ रुपये से अधिक की राशि और अन्य आवश्यक वस्तुओं का वितरण किया है।

इराक में आई.एस द्वारा भारतीयों की हत्या में विश्व के लोकतांत्रिक, पंथनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक देशों के लिए संदेश छिपा है कि कैंसर का फोड़ा बन चुके इस विषाक्त चिंतन का समय रहते उपचार किया जाएं- उसके लिए आवश्यक है कि सबसे पहले मजहब से प्रेरणा लेने वाले इन दरिंदों के आकाओं, प्रेरकों और संबंधित साहित्यों का विस्तृत अध्ययन कर उसपर ईमानदारी से निष्पक्ष विवेचना हो।

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