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चुनावी रामबाण है प्रचार और रणनीति

अजित द्विवेदी
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कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की जीत बहुत बड़ी और बेहद अहम है। कई कारणों से इस जीत का खास महत्व है। इससे दक्षिण भारत में भाजपा के प्रवेश करने और पैर जमाने का रास्ता बनता है। अब वह इतने ही आक्रामक अंदाज में पड़ोसी राज्यों खास कर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में चुनाव लड़ेगी। भाजपा को चुनाव जीतने का रामबाण फार्मूला मिल गया है। वह फार्मूला प्रचार और रणनीति का है। 

प्रचार में कोई भी पार्टी भाजपा को नहीं हरा सकती है और रणनीति में कोई उससे आगे नहीं जा सकती है। यह भाजपा की रणनीति है कि उसने भ्रष्टाचार से लड़ाई का राग गाते गाते बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं और उनके आधा दर्जन करीबियों को चुनाव में उतार दिया और अपने प्रचार की ताकत से इसका मुद्दा नहीं बनने दिया। भाजपा की प्रचार और रणनीति दोनों का अंदाजा रेड्डी बंधुओं वाले मामले से लगाया जा सकता है। 

भाजपा की हर राज्य में रणनीति यह रही है कि जीतने वाला उम्मीदवार उतारना है चाहे वह कैसा भी हो। तभी भाजपा ने पिछले चुनाव से सबक लेकर बीएस येदियुरप्पा की पार्टी का भाजपा में विलय कराया और बेल्लारी के रेड्डी बंधुओं को पार्टी में लाकर उनको चुनाव लड़ाया। उनके करीबी बी श्रीरामुलू को उप मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाया। उसकी यह रणनीति कारगर साबित हुई। 

कर्नाटक में कांग्रेस की निर्णायक हार हुई है। उसने आधी से ज्यादा सीटें गंवा दी हैं। लोकसभा चुनाव में भी उसने जैसा प्रदर्शन किया था उससे भी खराब प्रदर्शन इस चुनाव में हुआ है। अगर यह चुनाव भाजपा के प्रचार और रणनीति की जीत है तो कांग्रेस की रणनीति की बुरी हार है। कांग्रेस ने रणनीति के तहत राज्य का मुकाबले नरेंद्र मोदी बनाम सिद्धरमैया होने दिया था। हालांकि बाद में सिद्धरमैया ने सफाई दी थी कि उनका मुकाबले नरेंद्र मोदी से नहीं, बल्कि येदियुरप्पा से है। लेकिन पूरे चुनाव प्रचार में कांग्रेस ने सिद्धरमैया को इतनी ज्यादा तरजीह दी कि मुकाबला अपने आप मोदी बनाम सिद्धरमैया हुआ।

कांग्रेस को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा क्योंकि आम लोगों में अब भी नरेंद्र मोदी का जादू कायम है। चुनाव नतीजों को देख कर ऐसा लग रहा है कि राज्य के लोगों ने नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री चुनने के लिए वोट किया है। प्रचार के मामले में भी कांग्रेस सरकार में होने के बावजूद फिसड्डी रही। वह न तो भ्रष्टाचार का मुद्दा बना सकी और न राज्य सरकार पर लगे आरोपों का जवाब दे सकी और न पांच साल के कामकाज का आक्रामक प्रचार कर सकी। 

कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने चुनाव को बहुत ज्यादा स्थानीय रूप दे दिया था। उन्होंने इसे पूरी तरह से कन्नड़ अस्मिता के साथ जोड़ा था। पहले ऐसा लग रहा था कि उनका यह दांव कांग्रेस को फायदा पहुंचाएगा। इसी तरह हिंदी विरोध का उनका दांव भी पहले कांग्रेस के पक्ष में दिख रहा था। पर ये दोनों दांव उलटे पड़े हैं। इस खेल में सिद्धरमैया के गुरू एचडी देवगौड़ा ज्यादा सफल साबित हुए। 

कर्नाटक के मतदाताओं ने सोचा कि अगर स्थानीय अस्मिता के मुद्दे पर वोट डालना है तो क्यों न धरती पुत्र को वोट दें। तभी तमाम निगेटिव प्रचार के बावजूद देवगौड़ा की पार्टी अपना आधार बचाने में कामयाब रही। इसी तरह सिद्धरमैया ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने का एक दांव चला था। इस दांव से भाजपा परेशानी में दिखी थी। पर यह दांव भी उलटा पड़ा। इसकी दोहरी मार पड़ी कांग्रेस पर। लिंगायत को बांटने के दांव को लिंगायत समुदाय ने ही कबूल नहीं किया और उसने भाजपा को वोट किया। इसके अलावा व्यापक हिंदू समाज में भी यह मैसेज गया कि कांग्रेस हिंदू समाज को बांटने का प्रयास कर रही है। सो, वहां भी कांग्रेस को नुकसान हो गया। 

कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी की शानदार जीत से देश की राजनीति की दशा दिशा तय होगी। एक तरफ एंटी इन्कंबैंसी का फैक्टर आगे भाजपा के लिए चिंता की बात हो सकती है तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों की गोलबंदी की संभावना भी अब पहले से ज्यादा हो गई है। 

कांग्रेस और जेडीएस का साझा वोट भाजपा से बहुत ज्यादा है। यानी अगर कांग्रेस और जेडीएस कर लड़ते तो भाजपा को रोका जा सकता था। यह मैसेज कर्नाटक से पूरे देश में जाएगा। अब क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा से लड़ने की रणनीति पर नए सिरे से विचार करेंगी। कांग्रेस की ओर उनका रूझान बढ़ सकता है पर राहुल गांधी का नेतृत्व कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों के लिए चिंता का कारण रहेगा। 

धर्म और अस्मिता की राजनीति पर भी नए सिरे से विचार होगा। चुनाव के एजेंडे भी नई तरह से परिभाषित होंगे। कर्नाटक ने साबित किया है कि पारंपरिक रूप से चुनाव में जो मुद्दे होते थे वे अब प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। महंगाई का मुद्दा लोगों के लिए उतना बड़ा नहीं है और न रोजगार का मुद्दा लोगों के लिए बहुत अहम रह गया है। इस लिहाज से कर्नाटक का चुनाव कई चीजों को परिभाषित करने वाला रहा है। कर्नाटक से जो संदेश निकले हैं उनकी परीक्षा अब छह महीने बाद तीन राज्यों के चुनाव में होगी। 

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