Loading... Please wait...

चीनी जैसे रवैए से कश्मीर संकट का हल?

बलबीर पुंज
ALSO READ

कश्मीर की तुलना में चीन में अलगाववादियों की स्थिति कैसी है?- वह चीन द्वारा पारित एक कानून से स्पष्ट हो जाता है। इसके अतंर्गत, चीन कट्टरवाद और अलगाववादी गतिविधियों से निपटने की पृष्ठभूमि में अगले पांच वर्षों तक इस्लाम का चीनीकरण करेगा और उसे चीनी समाजवाद का रूप देगा। अर्थात् चीन में मुस्लिम समुदाय इस्लाम का पालन कैसे करें, उसके लिए चीनी मूल्यों वाले नियम कानून बनाएं जाएंगे। 

चीन के सरकारी समाचारपत्र "ग्लोबल टाइम्स" के अनुसार, 5 जनवरी को आठ इस्लामी संघों (वामपंथी समर्थित) के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक के बाद सरकारी चीनी अधिकारियों ने इस्लाम को समाजवाद के अनुकूल ढालने और उसके मजहबी क्रिया-कलापों को चीनी हिसाब से करने के कदम को लागू करने के लिए सहमति व्यक्त की है। चीनी वित्तपोषण पर आश्रित और इस्लाम के नाम पर जन्मे पाकिस्तान द्वारा बीते दिनों चीन में "सरकार प्रायोजित मुस्लिम उत्पीड़न" का बचाव करने के बाद यह कानून आया है। 

राष्ट्रपति शी जिनपिंग के शासनकाल में चीन में इस्लाम को लेकर आक्रामक अभियान चल रहा है। चीनी मुस्लिमों को यहां नमाज पढ़ने, रोजा रखने, दाढ़ी बढ़ाने या महिला को हिजाब पहने पाए जाने पर गिरफ्तारी का सामना करना पड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, चीन में 10 लाख से अधिक उइगर मुसलमानों को गुप्त शिविरों में रखे जाने का अनुमान है, जहां वह अपने मजहब की निंदा करने और आधिकारिक रूप से नास्तिक सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति निष्ठा रखने के लिए बाध्य हैं। अमेरिकी सरकार का आकलन है कि अप्रैल 2017 से चीनी अधिकारियों ने उइगर, जातीय कजाक और अन्य मुस्लिम अल्पसंख्यक समुदायों के कम से कम आठ लाख से बीस लाख सदस्यों को नजरबंदी शिविरों में अनिश्चितकाल के लिए बंद कर रखा है। 

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन "ह्यूमन राइट्स वॉच" ने गुप्त शिविरों में रह चुके 58 पीड़ितों का साक्षात्कार लिया था, जिससे शिनजियांग में उइगर मुसलमानों को दी जाने वाली यातनाओं का खुलासा हुआ था। निर्देश नहीं मानने पर उन्हेंा घंटों भूखा रखा जाता है और एकांत कोठरियों में दिन-रात खड़े रहने की सजा देकर उन्हे मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। आवश्यकता पड़ने पर बिना किसी पूर्व सूचना या प्रक्रिया के किसी को भी हिरासत में ले लिया जाता है। रिपोर्ट के अनुसार, शिनजियांग में इस्ला मी अलगाववादियों और आतंकवाद से निपटने के नाम पर चीन ने क्षेत्र में रहने वाले अल्पसंख्यक उइगर मुसलमानों पर कठोर प्रतिबंध लगाए हैं और हाल के वर्षों में इन्हें  और अधिक कड़ा भी किया है- जिसके अंर्तगत, यहां इस्लामी रीतियों के अनुपालन पर लगातार नजर रखी जाती है और अक्स र लोगों से उनकी प्रार्थना पद्धति को लेकर सवाल किए जाते हैं। यही नहीं, ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी अधिकारियों का नियमित दौरा होता रहता है, जिससे क्षेत्र में इस्लाजम का अनुपालन लगभग वर्जित हो गया है। 

शिनजियांग की तुलना में कश्मीर की स्थिति क्या है? चीन में मुस्लिम आबादी 2.1 करोड़ है, जिसमें अकेले शिनजियांग में 85 लाख तुर्क मूल के उइगर मुसलमान बसते है, जो इस प्रांत की कुल आबादी का बड़ा हिस्सा है। जम्मू-कश्मीर की कुल जनसंख्या में मुस्लिम 68.31 प्रतिशत और अकेले कश्मीर क्षेत्र में 96.4 प्रतिशत है। 

बीते 20 वर्षों से भी अधिक समय में इस कॉलम में कश्मीर को लेकर अनेकों बार चर्चा हो चुकी है। क्या कारण है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु की शेख अब्दुल्ला से गहरी मित्रता, श्रीमती इंदिरा गांधी की कूटनीति, वाजपेयीजी की इंसानियत के दायरे में वार्ता की पहल, डॉ. मनमोहन सिंह के अथक प्रयासों से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हरसंभव कोशिशों के बाद भी घाटी की स्थिति जस की तस बनी हुई है? 

स्वतंत्र भारत में घाटी के निवासियों को शेष देश के साथ जोड़ने के लिए केंद्र सरकार ने तरह-तरह के प्रयास किए। कश्मीरियों को देश के अन्य नागरिकों की तुलना अधिक सुविधाएं और संसाधन भी उपलब्ध करवाएं गए- फिर भी कश्मीर की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ। अक्टूबर 1947 में कश्मीर पर पाकिस्तान के हमले व जम्मू-कश्मीर के भारत में औपचारिक विलय के पश्चात शेख अब्दुल्ला को प्रदेश को सौंपना, बढ़ती सेना को पूरे कश्मीर को मुक्त कराएं बिना युद्धविराम की घोषणा करना, तत्कालीन देशभक्त महाराजा हरि सिंह को बॉम्बे (मुंबई) में बसने के लिए विवश करना, मामले को संयुक्त राष्ट्र ले जाना, जनमत संग्रह का वादा और अनुच्छेद 370 को लागू करना- जो संभवत: इस उद्देश्य से उठाए गए कदम थे कि इससे कश्मीरी मुस्लिमों को शेष भारत के साथ जोड़ने में सहायता मिलेगी। किंतु यह सभी प्रयास ऐसी विनाशकारी नीतियां सिद्ध हुई, जिसने समस्या को और अधिक विकराल और जटिल बना दिया। 

घाटी में भारत की मौत की दुआ मांगी जाती है, आए दिन होते आतंकी हमले, सुरक्षाबलों पर स्थानीय नागरिकों द्वारा पथराव, तिरंगे का अपमान और मस्जिदों में आईएस-पाकिस्तान का झंडा लहराते हुए कश्मीर सहित देश में निजाम-ए-मुस्तफा स्थापित करने का नारा बुलंद किया जाता है। फिर भी गत 70 वर्षों से देश के किंकर्तव्यविमूढ़ तथाकथित सेकुलरिस्ट घाटी की समस्या का राजनीतिक समाधान निकालने बल दे रहे है और यह दुखद नाटक वर्तमान समय में भी जारी है। 

चीनी दृष्टिकोण से शिनजियांग की स्थिति कश्मीर की तुलना में काफी अच्छी है। इसका कारण भी है- क्योंकि चीन ने अपनी संप्रभुता, एकता और अखंडता को सर्वोपरि मानते हुए आजतक अलगाववादी, आतंकवादी और जिहादियों से बातचीत या फिर किसी प्रकार के समझौते का प्रस्ताव नहीं रखा है। प्रतिकूल इसके, भारत में 70 वर्षों से अधिकतर केंद्र सरकार और स्वघोषित सेकुलरिस्ट कश्मीर में तथाकथित 'आज़ादी' मांगने वालों से नरम व्यवहार और वार्ता की वकालत करते रहे है। 

समान वैचारिक दर्शन और चिंतन होते हुए भी भारतीय और चीनी वामपंथियों में इस्लामी आतंकवाद और उससे संबंधित अलगाववाद को लेकर गहरा विरोधाभास है। जहां चीनी कम्युनिस्टों के लिए विचारधारा से बढ़कर राष्ट्रहित है, वही इसके ठीक विपरीत भारतीय वामपंथियों के लिए देशहित गौण जबकि विचारधारा सर्वोपरि है। इसी कारण देश के रक्तरंजित बंटवारे के समय भारतीय वामपंथी, इस्लाम के नाम पर अलग राष्ट्र की मांग करने वालों के साथ खड़े थे और रह-रहकर आज भी देश को टुकड़ों में बांटने का नारा बुलंद करते है। 

जब भी कश्मीर में पत्थरबाजों, आतंकियों और उनसे हमदर्दी रखने वाले स्थानीय लोगों पर सुरक्षाबल कार्रवाई करते है या इसकी कोई योजना बनाई जाती है, तब सर्वप्रथम वामपंथी और उनके बौद्धिक किराएदार कांग्रेस सहित अन्य स्वघोषित सेकुलरिस्ट, तथाकथित उदारवादियों और प्रगतिशील कुनबे के साथ संवैधानिक अधिकारों के नाम पर इसके विरुद्ध खड़े हो जाते है। यही नहीं, जब घाटी में कश्मीरी पंडितों को पुन: बसाने या पश्चिमी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को नागरिकता देने की चर्चा होती है, तब भी छद्म-पंथनिरपेक्षकों की यह फौज, अलगाववादियों की भाषा बोलते हुए इसका विरोध करते है। 

शेष भारत की तरह कश्मीर में भी बहुलतावादी जीवन-मूल्यों और इस्लामी अधिनायकवाद के बीच संघर्ष का सदियों पुराना इतिहास है। 13वीं-14वीं शताब्दी में कश्मीर में रुग्ण इस्लामी चिंतन का प्रकोप प्रारंभ हुआ, जिसका अंत वर्ष 1819 में सिख साम्राज्य के संस्थापक महाराजा रणजीत सिंह ने अफगानी दरिंदों को पराजित करके खत्म किया। वर्ष 1839 में महाराजा रणजीत सिंह का देहांत हो गया और अंग्रेजों ने 1846 में गुलाब सिंह को 75 लाख रुपये (नानकशाही) में कश्मीर सौंप दिया। जिहाद को अंग्रेजों के सहयोग और शेख अब्दुल्ला के माध्यम से पुन: हवा मिली और आज वह कश्मीर में धधकती ज्वाला का रुप धारण कर चुका है। इस लंबे कालखंड में नाम, चेहरे और नारे भले ही निरंतर बदलते गए, किंतु कश्मीर आंदोलन और हिंसा का चरित्र सदैव अपरिवर्तित रहा और आज भी ऐसा ही है। 

यदि घाटी में अधिकांश जनसंख्या हिंदुओं की होती, तो क्या कश्मीर आज अशांत होता? आखिर क्या कारण है कि घाटी के अधिकतर मुस्लिमों का दिल पाकिस्तान के लिए धड़कता है और 1980-90 के दशक में घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडितों का झुकाव आज भी भारत की ओर है?  निर्विवाद रूप से भारत सहित कोई भी पंथनिरपेक्ष, बहुलतावादी और संवैधानिक देश आतंकवाद और हिंसक अलगाववाद से निपटने के लिए चीन की नीतियों का अनुसरण नहीं करेगा। किंतु क्या घाटी में इस्लामी कट्टरवाद और जिहाद के सफाए बिना कश्मीर समस्या का अंत संभव है?….

215 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2019 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech