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क्या भाजपा नेता असाधारण रहे हैं?

भाजपा द्वारा सरकारी धन से राजकीय संस्थानों, भवनों, सड़कों, स्टेडियम, योजनाओं, आदि पर अपने नेताओं के नाम थोपने की आलोचना से कुछ पाठक असहमत हैं। अतः यह कैफियत। 

आखिर सामान्य नेता और महान नेता में अंतर क्या है? किसी पार्टी के लिए आजीवन काम करना किसी का कार्य-क्षेत्र भर है। जैसे किसान खेत पर, व्यापारी अपनी दुकान और शिक्षक अपने स्कूल में करता है। जब तक कोई खास उपलब्धि न दिखे, तब तक किसी को सामान्य कहना उस की अवमानना नहीं है।

तो जनसंघ-भाजपा के किस नेता ने विशिष्ट देश-सेवा की? विधायिका, कार्यपालिका में अपनी पार्टी की संख्या बढ़ाना पार्टी-सेवा हुई। लेकिन देश की सुरक्षा, सुव्यवस्था या सामाजिक उन्नति की दृष्टि से कोई जिक्र नहीं आता कि अमुक ने यह विशिष्ट किया जिस के फलाँ लाभ हुए। स्वयं पार्टी द्वारा जारी जीवनी में नेताओं की किसी ठोस उपलब्धि के बजाए केवल उन के पार्टी/सरकारी पदों का उल्लेख भर रहता है। किन्तु इन पदों पर अनेक रहे और रहेंगे। उन पदों के लिए नेताओं का अभाव नहीं, बल्कि मारा-मारी है। अतः अमुकजी पार्टी अध्यक्ष या महासचिव रहे वा मंत्री बने, इस से उन की कोई राष्ट्रीय देन नहीं बनती। 

चिंतन-दर्शन में भी जनसंघ-भाजपा नेताओं का कोई योगदान आना शेष है। कोई स्मरणीय दस्तावेज क्या, वे ढंग का एक नारा तक न दे सके जिस से उन की पहचान हो। अपने आरंभ, 1951 से जनसंघ-भाजपा ने अब तक चार-पाँच नारे बदले, जो कोरे जुमले भर थे। यदि नारे भी सुविचारित होते, तो उन्हें पुराने कपड़ों की तरह एक-एक कर छोड़ा न जाता। 

पहले ‘हिन्दू राष्ट्र’, फिर ‘गाँधीवादी समाजवाद’, ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ और अब ‘विकांस’। इन सब का न कोई स्पष्ट अर्थ आया, न इन में कोई तारतम्य रहा। फिर, ये बार-बार बदले क्यों गए? निरंतर बदलती जुमलेबाजी लक्ष्यहीनता का संकेत है। राष्ट्रीय हित की दृष्टि से वैचारिक रणनीतिक खालीपन भी। इस पर ध्यान देना चाहिए। 

आजकल वे ‘एकात्म मानववाद’ रट रहे हैं, जो जनसंघ में पचास वर्ष पहले जोड़ा गया था। किन्तु जब 1980 में भाजपा बनी तो ‘गाँधीवादी समाजवाद’ क्यों लहराया गया? तब समाजवाद का वैश्विक बोलबाला था। उसी नकल में भाजपा ने भी ‘समाजवाद’ उठा लिया। यानी उस के पास अपना विचार नहीं था, या अपने विचार पर भरोसा न था। यदि ‘एकात्म मानववाद’ में कुछ होता, तो उसे छोड़ ‘गाँधीवादी समाजवाद’ का झंडा न उठाते। फिर जल्द ही (सोवियत संघ के पतन के बाद) उन्होंने उस समाजवाद को भी छोड़ दिया! यानी, सब खाली जुमले थे। जैसे अब ‘विकांस’ का जुमला है। इस दावे से कि सारी समस्याओं का निदान इसी में है! जबकि किसी भाजपा नेता का दो पन्ने का लेख या एक पाराग्राफ पार्टी-घोषणा भी नहीं मिलती, जहाँ ‘विकास’ की ऐसी सर्वरोगनाशक प्रस्थापना की गई हो! तब यह भी खाली जुमला होने में क्या संदेह? 

मनमर्जी जुमले गढ़ना चिंतन नहीं, विचारहीनता है। यह अकारण नहीं कि जनसंघ-भाजपा के दशकों के असंख्य प्रकाशनों में ‘हिन्दू राष्ट्र’ या ‘गाँधीवादी समाजवाद’ पर कोई पुस्तिका भी आज नहीं मिलती। यानी सब तात्कालिक प्रचार जैसी चालू बातें थी। इसीलिए उन के सर्वोच्च नेताओं के जुमले राष्ट्रीय क्या, पार्टी नारा भी न बन सके! 

वस्तुतः राजनीतिक चिंतन और दृष्टि बड़ी ऊँची चीज होती है। ऐसे चिंतक, नेता दुनिया में कभी-कभार होते हैं जो नया ज्ञान दे सकें या पहले से उपलब्ध ज्ञान का सदुपयोग कर दिखाएं। यद्यपि भारत में ऐसे ज्ञान-कर्मयोगी हाल में भी हुए। जैसे, दयानन्द, विवेकानन्द, श्रीअरविन्द, सावरकर, राम स्वरूप, सीताराम गोयल, आदि। किन्तु नीति-निर्माण या प्रशिक्षण में उन की सीखों का उपयोग नहीं हुआ। क्योंकि वे अपनी ‘पार्टी’ के नहीं थे! इस से जो राष्ट्रीय हानियाँ होती रही, उस का दोष कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा पर भी है।

निस्संदेह, यह कांग्रेस ने शुरू किया। गाँधी-नेहरू नेतृत्व ने ऐसा संकीर्ण मतवाद, अंधभक्ति और जैसे-तैसे जन-समर्थन पाने की सनक बनाई, जो सभी दलों में व्याप गई। इसीलिए सच्चे मनीषियों के बदले कांग्रेसी नकल में अब भाजपा नेताओं को महान बताया जा रहा है। ध्यान दें, इस अभियान में ‘हिन्दू राष्ट्र’ या ‘गाँधीवादी समाजवाद’ का उल्लेख तक नहीं होता। गत कई वर्षों के भाषण, प्रचार खंगाल कर देख लीजिए! वे सब खाली जुमले न होते, तो भाजपा की नीतियों, कार्यों में उस की कोई झलक दिखती। 

यह सब से बड़ी विडंबना है। स्वतंत्र भारत में ज्ञान-शून्य, हिन्दू-विरोधी, विखंडनकारी बौद्धिकता का दबदबा राजकीय शिक्षा-तंत्र से ही बना। राजनीति-ग्रस्त शैक्षिक दस्तावेज, पाठ्यक्रम, पार्टी-प्रचार जैसी घटिया इतिहास व साहित्य पुस्तकें उस के साधन बने। उस का एक निशाना शुरू से ही संघ-भाजपा भी थे। फिर भी, दशकों से विभिन्न राज्यो में सत्ताधारी रह कर भी शिक्षा को स्वस्थ, सार्थक बनाना भाजपा की चिन्ता नहीं रही। तब उन के सर्वोच्च नेताओं चिंतकों ने उन्हें आज तक क्या सिखाया? वही, जो सर्कस आज चारो ओर दिख रहा है। राजनीति-शून्य तमाशे, आडंबर, आत्म-प्रचार तथा समय, संसाधनों की बर्बादी।

प्रायः भाजपा नेताओं के भाषणों, क्रिया-कलापों से चिंतन क्या, किसी स्पष्ट लक्ष्य का भी संकेत नहीं मिलता। अधिकांश बातें जुमलेबाजी, परनिंदा या अपना गुण-गान होती हैं। यह न सांस्कृतिक हुआ, न राष्ट्रीय, न हिन्दू दर्शन, न हिन्दू-हित। व्यवहार में भी अपने ही उठाए मुद्दों पर उन्होंने सत्ता में आकर चुप्पी या उल्टी चाल दिखाई है। तब उन के किस नेता को महान कहें और क्यों?

इस की तुलना में देखें कि भारत में हिन्दू-विरोधी समूहों ने बिना कोई पार्टी बनाए एक से एक रणनीतिक बढ़त हासिल की – जो उन्हें पचास वर्ष पहले नहीं थीं। वह बढ़त भाजपा सत्ता बनते रहने पर भी किसी बिन्दु पर एक इंच भी नहीं घटी। तो हिन्दुओं की इस तुलनात्मक अनवति में जनसंघ-भाजपा की क्या भूमिका या विफलता है, क्या उन्होंने कभी विचार किया? यदि नहीं किया, तो क्या किसी को नहीं करना चाहिए? 

पार्टी-सेवा और देश-सेवा में बुनियादी अंतर है। निर्दलीय देशसेवक, विचारक भी होते हैं। जनसंघ-भाजपा ने उन्हें कभी महत्व नहीं दिया। यह निरी पार्टी-भक्ति के कारण था। इन की तुलना में कम्युनिस्ट, इस्लामी, मिशनरी संगठनों में राजनीतिक चेतना का स्तर कई गुना ज्यादा है। उन के कार्य पार्टी-केंद्रित नहीं, मुद्दा- केंद्रित रहते हैं। इसीलिए दूरगामी प्रभाव डालते हैं। जबकि भाजपा प्रायः कठपुतलों, ढोल या गाल बजाने वालों को बढ़ाती रही। यहाँ हिन्दू या राष्ट्रवादी राजनीति की दुर्गति का यह प्रमुख कारण है।

इस बीच विविध कारणों से भाजपा बढ़ी जरूर। किन्तु पार्टी-उन्नति को देश-उन्नति समझना, या उस की पूर्वशर्त मानना बड़ी भूल है। लेकिन भाजपा नेतृत्व इसी भूल में आकंठ डूबा रहा है।

वस्तुतः जनसंघ-भाजपा का अब तक का इतिहास ‘हिन्दू राष्ट्र’, ‘गाँधीवादी समाजवाद’ होते हुए अब ‘विकांस’ और ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ के बदलते जुमलों तक किसी सधे कदम नहीं, बल्कि नींद में चलते जाने का इतिहास है। अतः उन के हिचकते, भटकते, झूमते नेता सामान्य राजनीतिकर्मी कहे जाएंगे। उस में कुछ महान नहीं। उन का ‘विकांस’ का चालू नारा भी कम्युनिस्टों का अंधानुकरण है, जो हर समस्या को अर्थव्यवस्था से जोड़ते थे। स्वामी विवेकानन्द या श्रीअरविन्द के चिंतन में यह कतई नहीं है।

कुल मिलाकर भाजपा नेताओं की चिंता सत्ता में आने और जैसे-तैसे बने रहने की चाह के सिवा अधिक नहीं दिखी है। निजी जीवन में भला, सादा या अविवाहित होने से राजनीतिक उपलब्धि का कोई संबंध नहीं है। इसीलिए जैसे सामान्य कर्मचारी, व्यापारी, पत्रकार होते हैं, उसी तरह सामान्य राजनीतिकर्मी भी। राज-कोष से उन का नाम व फोटो रोज अखबारों में छपाने से इस में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। न देश हित में कुछ जुड़ेगा।

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