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गाँधी के विचार गैर-हिन्दू थे

भारत के हिन्दूवादियों द्वारा महात्मा गाँधी की जयकार में एक भारी विडंबना है। विदेशी अतिथियों को गाँधी-समाधि पर ले जाने जैसे नियमित अनुष्ठानों से यह और गहरी होती है। ऐसा कर के हमारे नेता क्या संदेश देते हैं?  

निस्संदेह, गाँधी जी ने अनेक अच्छे काम किए। पर उन की राजनीतिक विरासत अत्यंत हानिकर रही। उन्होंने अपने तमाम कार्यों का आधार अहिंसा एवं ब्रह्मचर्य बताया था। किन्तु इन विषयों में उन के विचार हिन्दू धर्म-दर्शन के विपरीत थे। फिर, उन की कथनी और करनी में भारी विसंगति रहती थी। ‘भारत विभाजन मेरे मृत शरीर पर होगा’ की घोषणा से पलटना मानव इतिहास में सब से बड़ा विश्वासघात था, जो गाँधी ने किया। न केवल पंजाब, बंगाल, बल्कि संपूर्ण हिन्दू समाज के लिए गाँधी एक तबाही साबित हुए। तब गाँधी-पूजा करके हिन्दूवादी किस चीज को गौरवान्वित करना चाहते हैं?  

गाँधी ने सदैव कहा कि हिंसक अत्याचारी द्वारा मारने पर भी ‘आप मर जाएं, पर मारें नहीं।’ यह सीख हिन्दू दर्शन के विरुद्ध है। पर इसी को गाँधी हिन्दू धर्म की शिक्षा भी बताते थे। यह उन का अज्ञान या चतुराई थी - कोई तीसरी स्थिति नहीं हो सकती। 

उन्होंने 29 मई 1924 को हिन्दू-मुस्लिम एकता पर लंबा वक्तव्य प्रकाशित किया था। उस में गाँधी ने आश्चर्य किया कि अहिंसा की उन की व्याख्या पर कोई प्रश्न कैसे उठा सकता है! तब महर्षि श्रीअरविन्द ने टिप्पणी की, ‘यह पढ़कर मैं आश्चर्य-चकित हूँ कि गाँधी अपनी व्याख्या को संदेह से परे समझते हैं।’ उसी वक्तव्य में गाँधी जी ने स्वामी दयानंद की निन्दा की थी कि उन्होंने ‘वेदों की अंध-पूजा’ जैसी आरंभ कर दी है। 

इस पर भी श्रीअरविन्द ने कहा कि अर्थशास्त्र में चरखा, खादी तथा धर्म-दर्शन में अहिंसा की गाँधी भी अंध-पूजा ही कर रहे हैं। उस वक्तव्य में गाँधी ने कुरान व बाइबिल की खूब प्रशंसा की थी। इस दोहरेपन पर भी श्रीअरविन्द ने कहा, ‘उन्होंने (वेदों की पूजा के लिए) आर्य समाज की आलोचना की, पर मुहम्मदियों को क्यों छोड़ दिया? गाँधी का वक्तव्य कुरान और ईसाइयत के प्रति अतिश्रद्धा से भरा है जो बाइबिल, ईसा और सलीब की अंध-पूजा ही करता है।’ 

यह उदाहरण हैं कि गाँधी के विचार कितने अ-हिन्दू थे। किसी भी हिन्दू ज्ञानी ने गाँधी विचारों को सही नहीं माना था। क्योंकि उन के अधिकांश विचार ईसाई मतवाद से प्रभावित और दोषपूर्ण थे। इस निष्कर्ष पर किसी के चकित होने पर श्रीअरविन्द ने स्पष्ट किया, ‘हाँ;  जब  यूरोपियन  लोग  कहते  हैं  कि  वह (गाँधी) अनेक  ईसाइयों  से  बढ़कर  ईसाई  हैं, और  “आज के ईसा मसीह हैं”  तो  वे  बिलकुल  ठीक  कहते  हैं।  उन  के  सभी  उपदेश ईसाइयत  से  लिए  हुए  हैं  और  यद्यपि  उन  उपदेशों  का  बाह्य-रूप भारतीय दिखता है, उस का सार-तत्व ईसाई  है।... वह  अपने उपदेशों  में  अधिकांशतः  टॉल्सटॉय,  बाइबिल  तथा  जैन-दर्शन  से  प्रभावित  हैं;  किसी  भी  स्थिति में भारतीय शास्त्रों से अधिक। उपनिषद, गीता की व्याख्या  वह  उसी  दृष्टि  से  करते  रहते  हैं।’  

तब किसी ने कहा कि अनेक भारतीय भी गाँधी को आध्यात्मिक संत समझते हैं। इस पर श्रीअरविन्द की टिप्पणी थीः ‘क्योंकि यूरोपीय उन्हें आध्यात्मिक कहते हैं। जो उपदेश वह देते हैं वह भारतीय अध्यात्म नहीं, बल्कि रूसी ईसाइयत, अहिंसा, कष्ट-सहन आदि से लिया गया है।’ 

गाँधी के अनुसार अहिंसा में ऐसी शक्ति है कि हिटलर से भी कठोर पत्थर-हृदय को पिघला सकती है। जबकि स्वयं गाँधी अपने मित्रों मुहम्मद व शौकत अली, या सुहरावर्दी, अब्दुल बारी, जिन्ना आदि किसी ‘मुस्लिम भाई’ तक को रंचमात्र न पिघला सके। जब मित्र और भाई ही न पिघला तो हिटलर पिघल जाएगा, यह कैसा विचित्र दावा था! वस्तुतः वह आत्मघाती भुलावा था। हिटलर पर गाँधी ने कहा कि ‘वह कोई बुरा आदमी नहीं है!’ फिर, गाँधी की समझ से रूजवेल्ट, चर्चिल और हिटलर एक जैसे युद्ध-अपराधी थे। ऐसी बातें न केवल राजनीति, बल्कि सामान्य ज्ञान का भी अभाव दर्शाती है। उन की कई बातें अज्ञान से भरी थीं। 

गाँधी का साबका केवल अंग्रेजों से पड़ा था जो लोकतांत्रिक थे और इस में गर्व करते थे। अंगेज अतिवाद से बचते, जनमत का ध्यान रखते तथा अपनी छवि के प्रति संवेदनशील होते हैं। वे दुनिया का मान-सम्मान भी चाहते हैं। इसीलिए, जब-तब गाँधी को सत्याग्रह से कुछ हासिल होता रहा था। अंग्रेज अपने हित का हिसाब लगाकर गाँधी की कोई माँग मानते थे, उन से प्रभावित होकर नहीं। यदि गाँधी को रूसी निहिलिस्टों, स्तालिनवादियों, नाजियों या खुमैनी, तालिबान जैसे किसी से उलझना पड़ता तो वे गाँधी को फौरन खत्म कर देते। तीन दशक तक उन का ‘आग्रह’ सुनने के लिए नहीं बैठे रहते। 

बल्कि यहीं, अपने मुसलमानों के बीच, गाँधी की रत्ती भर न चली। इसीलिए जिस हौसले से गाँधी नोआखाली गए थे (1946-47), उस के टूटने पर मौका मिलते ही बिहार चल दिए। जब कि घोषणा की थी कि मर जाएंगे पर लक्ष्य-पूर्ति से पहले नोआखाली से हटेंगे नहीं। पर यह कई बार देखा जा चुका कि इस्लामी हिंसा के सामने गाँधी बात बदल देते थे। तब उन की सत्य, अहिंसा की शक्ति थी क्या?

अतः गाँधी का विरुद गाने से पहले सोचें। महान लेखक जॉर्ज आर्वेल ने गाँधी का मूल्यांकन करते (1949) लिखा था, कि ‘क्या अभी रूस में कोई गाँधी है? यदि है तो वह क्या कर रहा है?’ तब रूस में स्तालिन का शासन था। आशय यह कि गाँधी प्रेस की, संगठन बनाने की आजादी, अपनी बात जनता तक पहुँचने, और जब चाहे कहीं जाकर लोगों को संबोधित कर सकने, आदि सुविधाएं फॉर-ग्रांटेड ले कर चलते थे। मानो यह सब तो हर कहीं, हर समय होती ही है! जबकि इन सुविधाओं के बिना ‘अहिंसा की शक्ति’ वाले गाँधी के सारे दावे अनर्गल रहते हैं। आर्वेल ने यही ध्यान दिलाया था।

वस्तुतः गाँधी के दावे वैसे भी अनर्गल थे। गाँधी उन तमाम सचाइयों की अनदेखी करते थे, जो उन के मतवाद के लिए असुविधाजनक पड़ती थी। इसीलिए शस्त्र-बल को ‘पशु बल’ कहना, उस का प्रयोग अनुचित बताना, तथा शस्त्रधारी योद्धाओं को ‘दिगभ्रमित’ कहना गाँधी का घोर अज्ञान था। हिन्दू दर्शन के विरुद्ध तो था ही। 

सच यह है कि अस्त्र-शस्त्र से जुल्म, अन्याय का प्रतिकार करने वाले भी ज्ञानी, सहृदय और धर्मनिष्ठ हो सकते हैं। हिंसा और अहिंसा का संबंध उद्देश्य से है, शस्त्र उठाने न उठाने से नहीं। किसी गाँधीवादी में भी हिंसा, घृणा भरी हो सकती है, चाहे वह अहिंसा-अहिंसा रटता हो। यह स्वयं गाँधी के सहयोगियों ने देखा था। जैसे, स्वामी श्रद्धानन्द, सहजानन्द सरस्वती और वांडा दीनोवस्का। इन्होंने गाँधी को प्रत्यक्ष बताया कि चरखा चलाने, खादी पहनने और अहिंसा की कसमें खाने वाले उन के कई निकट अनुयायियों में क्रोध, ईर्ष्या, घमंड और पाखंड था। वांडा के अनुसार स्वयं गाँधी भी उस से मुक्त नहीं थे।

इसीलिए गाँधी की कई बातें ईसाई मिशनरियों से सीखी गई अधकचरी चीजें थीं। हिन्दू धर्म का निर्देश है कि किसी दुष्ट या शत्रु के प्राण लेते हुए भी केवल कर्तव्य भाव रहे। साथ ही, कर्तृत्व-भाव न आए। वैसा शस्त्रधारी योद्धा अहिंसक, धर्मप्राण व्यक्ति है। पूरी रामायण, पूरी गीता यही सिखाती है। अतः गाँधी को हिन्दू संत तथा उन की बातों को हिन्दू विचार नहीं कहना चाहिए। न उन्हें सरकारी बल से नई पीढ़ियों पर थोपना चाहिए। यह हिन्दू जनता के साथ छल और हानिकारक, दोनों रहा है। 

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