राष्ट्रीय पार्टियों में अध्यक्ष का मतलब

अजित द्विवेदी
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के किसी नेता को पांच साल के लिए अध्यक्ष बनाने की चुनौती देकर पुरानी बहस को फिर से छेड़ दिया है। भाजपा के नेता पहले भी यह कहते रहे थे कि भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन बनेगा, यह किसी को पता नहीं है पर कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के बारे में सब जानते हैं। पहली बार प्रधानमंत्री इस बहस में शामिल हुए हैं। हैरान करने वाली बात है कि वंशवाद की जिस मौजूदगी को भारतीय लोकतंत्र में अनिवार्य रूप से स्वीकार किया जा चुका है और खुद भारतीय जनता पार्टी में नेताओं की कई कई पीढ़ियां एक साथ सक्रिय हैं और कई जगह तो सबको यह भी पता है कि अगला नेता कौन बनेगा। फिर भी यह प्रधानमंत्री मोदी की हिम्मत है कि उन्होंने कांग्रेस को निशाना बनाया। 

जब तक भाजपा के दूसरे नेता यह सवाल उठा रहे थे तब तक कांग्रेस इसकी अनदेखी करती रही पर इस बार कांग्रेस ने जवाब दिया। पी चिदंबरम ने 1947 के बाद बने 15 कांग्रेस अध्यक्षों के नाम दिए, जो गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के हैं। कांग्रेस नेताओं ने यह भी याद दिलाया कि पिछले 29 साल से गांधी-नेहरू परिवार का कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री नहीं बना है, जबकि इस अवधि में 15 साल कांग्रेस का राज रहा। आखिरी कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे। इसी क्रम में कांग्रेस नेताओं ने भाजपा के अध्यक्षों का मुद्दा भी उठाया। सो, अब सवाल है कि कांग्रेस हो या भाजपा इनमें राष्ट्रीय अध्य़क्षों का क्या मतलब होता है? ये किस तरह से प्रादेशिक पार्टियों के अध्यक्षों या कम्युनिस्ट पार्टियों के महासचिवों से भिन्न होते हैं?

असल में राष्ट्रीय पार्टियों में अध्यक्ष का मतलब तभी होता है, जब उनमें चुनाव जिताने का करिश्मा हो अन्यथा उनकी हैसियत ऑफिस चलाने वाले एक सामान्य कर्मचारी से ज्यादा नहीं होती है। और वह हैसियत भी करिश्माई नेता या नेताओं के रहमोकरम पर होती है। यह ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि इक्का दुक्का अपवादों को छोड़ कर राष्ट्रीय पार्टियों का अध्यक्ष चुनने में पार्टी के सामान्य कार्यकर्ताओं की कोई भूमिका नहीं होती है। पार्टी के शीर्ष नेता नाम तय करते हैं और पार्टी उस पर मुहर लगाती है। जैसे पी चिदंबरम ने जो 15 नाम बताए हैं, उनमें एकाध को छोड़ कर बाकी सब पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के चुने हुए थे। 

आजादी के बाद हुआ कांग्रेस अध्यक्ष का पहला चुनाव बड़ा दिलचस्प था। 1950 में उस समय के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कांग्रेस के दिग्गज नेता और आचार्य जेबी कृपलानी का समर्थन किया था, जबकि उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने पुरुषोत्तम दास टंडन को चुनाव में उतारा था। नेहरू के तमाम समर्थन के बावजूद कृपलानी चुनाव हार गए थे। ऐसे मौके भारत की राजनीति में इक्का दुक्का होंगे, जब नेहरू जैसे करिश्माई प्रधानंमत्री के समर्थन के बावजूद उनका उम्मीदवार हार जाए। इससे पहले 1938 में ऐसा वाकया भी कांग्रेस में ही हुआ था, जब महात्मा गांधी के समर्थन के बावजूद उनके उम्मीदवार पट्टाभि सीतारमैया को नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने हरा दिया था।  

बहरहाल, आजादी के बाद से लेकर सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने तक के 50 साल में 15 अध्यक्ष ऐसे हुए, जो गांधी-नेहरू परिवार के नहीं थे। पर इनमें से एकाध को छोड़ कर लगभग सभी गांधी-नेहरू परिवार की कृपा या उनके समर्थन से ही अध्यक्ष बने थे। सो, इनके अध्यक्ष होने का कोई खास मतलब नहीं था। इसका एक कारण यह भी था कि आजादी के बाद धीरे धीरे पार्टी की सारी ताकत प्रधानमंत्री में निहित होती चली गई। जो प्रधानमंत्री होता था वह पार्टी का सबसे बड़ा नेता होता था। यहां तक कि पीवी नरसिंह राव भी प्रधानंमत्री होकर कांग्रेस के सबसे बड़े नेता हो गए थे। 

कमोबेश यहीं स्थिति भारतीय जनता पार्टी में भी रही। भाजपा का गठन 1980 में हुआ तो अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने और छह साल तक रहे। उसके बाद लालकृष्ण आडवाणी और फिर मुरली मनोहर जोशी रहे। पहले 13 साल तक ये तीन नेता अध्यक्ष रहे। भाजपा के कुल 38 साल के इतिहास में आधे समय यानी 19 साल तक ये तीन ही नेता अध्यक्ष रहे हैं। भाजपा से पहले भारतीय जनसंघ में भी वाजपेयी 1969 में और आडवाणी 1971 में अध्यक्ष बने थे। इनके अलावा राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और मौजूदा अध्यक्ष अमित शाह को छोड़ दें तो बाकी अध्यक्ष वाजपेयी, आडवाणी और जोशी के बनवाए थे और उनके हिसाब से ही काम करते थे। कुशाभाऊ ठाकरे, जना कृष्णमूर्ति, बंगारू लक्ष्मण या वेंकैया नायडू नाम के ही अध्यक्ष रहे। 

यानी जो हैसियत कांग्रेस में गांधी-नेहरू परिवार की थी वहीं भाजपा में वाजपेयी, आडवाणी, जोशी की थी और अब मोदी-शाह की है। मतलब यह है कि राष्ट्रीय पार्टियों में जो करिश्माई नेता होगा, जिसमें चुनाव जिताने की क्षमता होगी वह अध्यक्ष रहे या नहीं रहे, वहीं पार्टी का सबसे बड़ा नेता होगा और जो भी पार्टी अध्यक्ष होगा वह उसके हिसाब से काम करेगा। इससे ज्यादा अध्यक्ष की कोई हैसियत नहीं होती है। इसलिए प्रधानमंत्री के कहे का कोई मतलब नहीं है कि किसी नेता को पांच साल अध्यक्ष बना कर दिखाए कांग्रेस! जब 15 साल परिवार से बाहर के किसी नेता को प्रधानमंत्री बना दिया कांग्रेस ने और गांधी-नेहरू परिवार की सत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ा तो पांच साल किसी के अध्यक्ष रहने से स्थिति नहीं बदलनी है। 

राष्ट्रीय और प्रादेशिक पार्टियों का फर्क यह है कि प्रादेशिक पार्टियों में अध्यक्ष का पद वंशानुगत और आरक्षित होता है। और नेता के चुनाव जिताने की क्षमता खत्म होने के बावजूद उसी के पास रहता है। प्राचीन और मध्यकाल की तरह वहां सत्ता का हस्तांतरण राजमहल की दुरभिसंधियों या फिर बाहुबल के आधार पर होता है। इस लिहाज से पार्टियों के अंदर का वास्तविक लोकतंत्र कम्युनिस्ट पार्टियों में होता है, जहां अपनी योग्यता, काबिलियत और पार्टी कार्यकर्ताओं के समर्थन से महासचिव चुने जाते हैं। और एक बार जो महासचिव बन जाता है उसके पास अपने हिसाब से पार्टी को चलाने की क्षमता आ जाती है। तमाम गुटबाजियों के बावजूद वह पार्टी में सर्वोच्च होता है और पार्टी की लाइन तय करता है।  

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