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नरसिम्हा राव से सीखें मनमोहन सिंह

बलबीर पुंज
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गुजरात में 14 दिसंबर को वोटिंग के साथ ही दो चरणों में हो रहे विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो गया। अब सभी को 18 दिसंबर की प्रतीक्षा है, जब मतगणना के पश्चात गुजरात के साथ हिमाचल प्रदेश के भी परिणाम घोषित किए जाएंगे। हर चुनाव की भांति इस बार भी, विशेषकर गुजरात का राजनीतिक परिदृश्य आरोप-प्रत्यारोपों से भरा रहा, जोकि भारत के जीवंत लोकतंत्र और उसके अच्छे स्वास्थ में होने का सूचक भी है। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो आरोप 10 दिसंबर को कांग्रेस पर लगाए- वह न केवल गंभीर है, अपितु लोकतांत्रिक व्यवस्था, राष्ट्र सुरक्षा और संप्रभुता के लिए किसी खतरे से कमतर नहीं है।

गुजरात विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में प्रचार के दौरान पालनपुर में प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया, "जिस दिन मुझे 'नीच' कहा गया था, उससे एक दिन पहले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ने भेंट की थी।" प्रधानमंत्री मोदी ने सवाल किया, "आखिर पाकिस्तान में सेना और खुफिया विभाग में उच्च पदों पर रहे लोग गुजरात में अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने की मदद की बात क्यों कर रहे हैं?

प्रधानमंत्री के उपरोक्त आरोप उस रात्रिभोज से संबंधित है, जो मणिशंकर अय्यर के घर छह दिसंबर को आयोजित किया गया था- जिसमें पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अतिरिक्त भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त, पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी, पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर, पूर्व विदेश सचिव सलमान हैदर, पाकिस्तान में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त टीसीए राघवन, शरत सबरवाल, के.शंकर वाजपेयी सहित कई अन्य पूर्व अधिकारी शामिल हुए थे।

अपने कार्यकाल में देश के संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला अधिकार घोषित करने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस विवाद पर लिखित प्रतिक्रिया दी है। उनके अनुसार, उस बैठक में गुजरात चुनाव पर कोई बात नहीं हुई, केवल भारत-पाकिस्तान संबंध चर्चा के केंद्र में रहा। पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर भी इस बैठक में शामिल होने की पुष्टि कर चुके है।  

इस घटनाक्रम और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आरोपों को लेकर जो सार्वजनिक विमर्श बन रहा है, उसमें एक ऐसे घातक सत्य की अवहेलना की जा रही है, जो संभवत: स्वतंत्र भारत में चली आ रही एक स्वस्थ परिपाटी में आजतक प्रकाश में नहीं आई है।

भारत और विश्व के किसी भी देश के संबंधों का भविष्य- दो राष्ट्र के निर्वाचित सरकारों की कूटनीति और उसके द्वारा निर्धारित नीतियों से तय होता है। इसमें किसी तीसरे पक्ष की सीधी उपस्थिति नहीं होती, चाहे वह संबंधित दोनों देशों के विपक्षी दल ही क्यों न हो। स्वतंत्र भारत के 70 वर्षों में से 49 वर्ष कांग्रेस ने देश पर शासन किया। भले ही राजनीतिक और वैचारिक कारणों से विभिन्न-विभिन्न दलों में मतभेद हो, किंतु राष्ट्रहित के समक्ष यह सब गौण जाते है और ऐसा होना भी चाहिए। इस लोकतांत्रिक परिपाटी का पालन भी अबतक होता आया है। 1994 का ऐतिहासिक घटनाक्रम इसका आदर्श उदाहरण है।

वर्ष 1994 में पाकिस्तान ने कश्मीर में मानवाधिकारों के तथाकथित उल्लंघन को लेकर मुस्लिम देशों के समूह इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) के माध्यम से भारत को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में घेरने की रणनीति बनाई। यदि उस समय कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप भारत पर साबित हो जाता, तो संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद न केवल भारत पर कई प्रतिबंध थोप देता, साथ ही यह कश्मीर मुद्दे के अंतरराष्ट्रीयकरण का कारण भी बन सकता था।

पाकिस्तान के भारत विरोधी प्रस्ताव पर सुनवाई के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर और राष्ट्रहित को सर्वोच्च मानते हुए, उस समय के नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का मुखिया बनाकर जिनेवा भेजा था, जिसमें सलमान खुर्शीद और जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला भी शामिल रहे थे।

इसके अतिरिक्त, राव सरकार ने रणनीति के अंतर्गत अपने विदेश मंत्री दिनेश सिंह को ईरान भेजा, जहां चीन के विदेश मंत्री भी पहले से मौजूद थे। कश्मीर के संबंध में पाकिस्तान का झूठ अटल बिहारी वाजपेयी की बुद्धिमत्ता व तर्कपूर्ण पैरवी और नरसिम्हा राव सरकार की नीति के समक्ष टिक नहीं पाया। इस दौरान भारत को पाकिस्तान के विरुद्ध चीन और ईरान का समर्थन भी प्राप्त हुआ था।

हालिया घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में महाभारत में उल्लेखित एक प्रसंग काफी प्रासंगिक है। जब पांडव वनवास में थे, तब एक समय दुर्योधन को किसी शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने के समाचार ने युधिष्ठिर को चिंतित कर दिया। उन्होंने भीम से कहा, हमें दुर्योधन की रक्षा करनी चाहिए। किंतु यह बात सुनकर भीम नाराज हो गए और कहा, आप उस व्यक्ति की रक्षा की बात कह रहे हैं, जिसने हमारे साथ बुरा व्यवहार किया। द्रोपदी चीरहरण और फिर वनवास आप भूल गए। भीम की बातों को युधिष्ठिर चुपचाप सुनते रहे। अर्जुन भी वहां मौजूद थे। यही बात युधिष्ठिर ने अर्जुन से कही, तो वह समझ गए और अपना गांडिव उठाकर दुर्योधन की रक्षा के लिए चले गए। अर्जुन कुछ देर बाद आए और उन्होंने युधिष्ठिर से कहा, शत्रु को पराजित हो गया है और दुर्योधन अब मुक्त हैं। तब युधिष्ठिर ने भीम से कहा, कौरवों और पांडवों में भले ही आपस में कितना भी बैर हो, किंतु संसार की दृष्टि में तो हम सभी भाई हैं। भले ही कौरव 100 हैं और हम पांच। ऐसे में हम में से किसी एक का भी अपमान 105 लोगों का अपमान है।" क्या कांग्रेस नेताओं द्वारा सुरक्षा हेतु निर्धारित राष्ट्र नीति को लांघना देश का अपमान नहीं?

मई 2014 से विपक्षी दल, विशेषकर कांग्रेस- राजनीतिक, वैचारिक और व्यक्तिगत कारणों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए इतने ललायित है कि वह न केवल अमर्यादित भाषा का खुलकर उपयोग कर रहे है, साथ ही उस राष्ट्र से भी सहायता लेने को तत्पर दिखते है, जिसका हर एजेंडा भारत को केंद्र में रखकर तैयार किया जाता है और वहां का बड़ा जनमानस भारत की बहुलतावादी सनातनी संस्कृति व उससे संबंधित हर चीज को मिटाना अपना मजहबी कर्तव्य दायित्व मानता है। प्रतिकूल इसके, संप्रगकाल में केंद्रीय मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर ने कुछ माह पूर्व पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल पर साक्षात्कार देते हुए कहा था, "यदि पाकिस्तान भारत से अच्छे रिश्ते चाहता है, तो बातचीत से पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटाना होगा। इनको (भाजपा) हटाइए और हमें ले आइए।

पाकिस्तान, जोकि वैश्विक आतंकवाद के केंद्र के रुप में स्थापित है, उसके प्रति भारत की राष्ट्र नीति गत कई वर्षों से स्पष्ट है कि जबतक वह अपनी धरती से भारत के खिलाफ आतंकवाद को प्रोत्साहित और आतंकवादियों को समर्थन देता रहेगा, उससे भविष्य में कोई वार्ता नहीं की जाएगी। इस पृष्ठभूमि में पाकिस्तानी नेताओं और राजनयिकों के साथ कांग्रेस की बैठक का औचित्य क्या है?

यदि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस को पाकिस्तानी नेताओं और राजनयिकों से भेंट करनी ही थी, तब वह भारतीय विदेश मंत्रालय को इसकी जानकारी दे सकते थे, ताकि बातचीत व एजेंडे के ब्योरे को सुरक्षित रख लिया जाता और उसे सार्वजनिक भी किया जाता। क्या 6 दिसंबर को मणिशंकर अय्यर के घर हुई मुलाकात में इस प्रक्रिया का पालन हुआ?

मामला केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। इसी वर्ष डोकलाम विवाद के समय भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आठ जुलाई को चीनी राजनयिकों से मुलाकात कर राष्ट्रहितों की अवहेलना की थी। राजनीति अपनी जगह है और देश की छवि, राष्ट्रनीति, सुरक्षा, संप्रभुता अपनी जगह। खेद है कि पांच दशकों तक देश पर एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस ने बतौर विपक्ष इस स्वस्थ परंपरा का पालन नहीं किया।

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