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पेट्रोल-डीजल पर यह क्या सफाई?

पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों को न्यायसंगत ठहराने का प्रयास सरकार की ओर से तेज हो गया है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की महंगाई को सही ठहरा रही है। हालांकि दो साल पहले जब पेट्रोल और डीजल के दाम कम हुए थे, तब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका श्रेय लिया था और कहा था कि यह उनका नसीब है, जिसका फायदा देश के लोगों को मिल रहा है। लेकिन अब उनकी सरकार के मंत्री दाम बढ़ने को वाजिब ठहराने में लगे हैं।

पेट्रोल और डीजल के दामों पर केंद्र सरकार सीनाजोरी पर उतर गई है। कुछ दिन पहले सरकार के एक नए बने मंत्री केजे अल्फोंस ने कहा था कि गाड़ी रखने वाले लोग भूखों नहीं मर रहे हैं, वे पेट्रोल और डीजल महंगी कीमत पर खरीद सकते हैं। तब माना गया था कि वे नया मुल्ला हैं, इसलिए ज्यादा प्याज खा रहे हैं। लेकिन अब खुद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि सरकार को सार्वजनिक कल्याण की योजनाएं चलाने के लिए राजस्व की जरूरत होती है, इसलिए कर लगाया गया है। 

सवाल है कि क्या यह तर्क पिछली सरकार पर नहीं लागू होता है? फिर क्यों भाजपा के सारे नेता पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ने पर सड़क पर उतरते थे? उस समय तो पेट्रोलियम उत्पादों की महंगाई से हर चीजों के महंगी होने का तर्क दिया जा रहा था! लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार नरेंद्र मोदी का तो एक नारा भी था – बहुत हुई पेट्रोल, डीजल की मार, अबकी बार मोदी सरकार! 

वित्त मंत्री ने एक और सीनाजोरी दिखाई और कहा कांग्रेस और सीपीएम के शासन वाले राज्य क्या अपने हिस्से का कर छोड़ देंगे? हैरानी है कि इससे दो दिन पहले ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि देश के 18 राज्यों में भाजपा और उसकी सहयोगियों की सरकार है और 67 फीसदी आबादी इसके तहत आती है। 

सवाल है कि जब दो तिहाई राज्यों में भाजपा की सरकार है तो वह अपने शासन वाले राज्यों से क्यों नहीं वैट कम करने को कह रही है? कांग्रेस और सीपीएम का शासन तो एक-एक, दो-दो राज्यों में है!

वित्त मंत्री ने पेट्रोलियम उत्पादों की महंगाई से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि राज्य सरकारें वैट वसूलती हैं। लेकिन हकीकत इससे अलग है। राज्य सरकारों से करीब डेढ़ गुना ज्यादा कर केंद्र सरकार वसूल रही है। राज्यों की सरकारें वैट के रूप में एक लीटर पेट्रोल पर 14 रुपए ले रही हैं तो केंद्र सरकार उत्पाद शुल्क के रूप में 21 रुपए वसूल रही है। इसी तरह डीजल पर केंद्र सरकार 17 रुपए प्रति लीटर से ज्यादा कर वसूल रही है। 

राज्यों पर आरोप लगाने से पहले केंद्र सरकार को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। 2014 में सरकार में आने के बाद अगले दो साल में यानी 2016 तक केंद्र सरकार ने उत्पाद शुल्क में नौ बार बढ़ोतरी की है। केंद्र की यूपीए सरकार जब हटी तब पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क नौ रुपए 48 पैसे प्रति लीटर था और डीजल पर उत्पाद शुल्क तीन रुपए 56 पैसे था। 

अभी पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क 21 रुपए 48 पैसे और डीजल पर 17 रुपए 33 पैसे है। इस तरह पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क में 226 फीसदी और डीजल पर 486 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जाहिर है बढ़ती कीमत के लिए ज्यादा जिम्मेदार केंद्र सरकार है। यूपीए सरकार के समय पेट्रोल महंगा होने का कारण यह था कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत मौजूदा कीमत के दोगुने से ज्यादा थी। तब लोगों की जेब से पैसा निकाल कर सरकार अपना खजाना नहीं भर रही थी। 

भारत में पेट्रोल की वास्तविक कीमत 26 रुपए 65 पैसे है। इसके ऊपर भारत सरकार की पेट्रोलियम मार्केटिंग करने वाली कंपनियां प्रति लीटर तीन रुपए 31 पैसे अपना कमीशन लेती हैं। पेट्रोल पंप के डीलरों का कमीशन तीन रुपए 24 पैसे होता है।

दोनों के कमीशन जोड़ कर पेट्रोल की कीमत 33 रुपए 20 पैसे होती है। इसके ऊपर केंद्र सरकार 21 रुपए 48 पैसे और राज्य सरकारें औसतन 14 रुपए 76 पैसे कमीशन लेती है। इस तरह पेट्रोल की कीमत 69 रुपए प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है। कुछ राज्यों में यह कीमत 80 रुपए है तो उसका कारण केंद्र और राज्यों के टैक्स और ज्यादा होने का है। 

एशिया के ज्यादातर देशों में पेट्रोल की कीमत भारत से कम है। इनमें कई देश ऐसे भी हैं, जो भारत से लेकर पेट्रोल बेचते हैं। सबसे सस्ता पेट्रोल मलेशिया में है। वहां पेट्रोल की कीमत 32 रुपए और डीजल की 31 रुपए है। पाकिस्तान में पेट्रोल 42 रुपए और डीजल 47 रुपए लीटर बिकता है। 

श्रीलंका में पेट्रोल साढ़े 53 रुपए और डीजल 40 रुपए लीटर है। इंडोनेशिया में पेट्रोल 40 रुपए और डीजल 43 रुपए लीटर है। भारत के अलावा 60 रुपए से ऊपर पेट्रोल की कीमत नेपाल, बांग्लादेश और भूटान में है। इनमें नेपाल और भूटान में कीमत भारत से कम है।

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