हिन्दू जोड़ो या तोड़ो? (भाजपा का दिग्भ्रम)

शंकर शरण
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‘देवालय से ज्यादा जरूरी शौचालय है’, ‘‘आर्थिक विकास सारी समस्याओं का समाधान है’’ जैसे गहन विचार तथा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ जैसा लक्ष्य रखने वाले नेता अब इन बातों को नहीं दुहरा रहे। इस के बदले जहाँ-तहाँ अंधेरे में सिर पटक रहे हैं कि कोई हैंडल मिले। 

इस बीच, उन के समर्थक क्या करें? केवल इंतजार, कि दैवयोग से कोई घटना हो जिस से अपने नेता और दल के समर्थन में किसी तरह का अभियान चला सकें। इतनी शक्ति मिल जाने के बाद भी ऐसी बेबसी वैचारिक दिवालिएपन का ही उदाहरण है! आखिर, सही विचारों के बिना सही दिशा नहीं मिल सकती।   हम यह भी नहीं कहते या कि यह या वह काम होना चाहिए था। जबकि निस्संदेह अनेक ऐसे मूल्यवान काम निर्विवाद और बिना अतिरिक्त बजट के किए जा सकते थे, जिस से बड़े राष्ट्रीय हित सधते। पर अभी वह छोड़ें। केवल यह देखें कि क्या गलत और फूहड़ बयानबाजियों से भी नहीं बचा जा सकता था? वह भी जब तत्काल कोई चुनाव नहीं लड़ना था। 

यदि सारी ताकत और संसाधन हाथ में लेकर यदि कांग्रेस-मार्का ‘विकास’ ही करना था तो प्रश्न उठता है कि भाजपा की सत्ता से क्या बदलता है, या कि कुछ नहीं बदलता? 

सब से पहले, तो देश का राजनीतिक-बौद्धिक विमर्श नहीं बदलता। जो दशकों से सत्ता बल से ही निर्धारित होते रहे हैं। समाजवाद, सेक्यूलरवाद, शिक्षा का राजनीतिकरण व हिन्दू-विरोधीकरण, दलित-पिछड़ा, आदि करके हिन्दुओं को विखंडित करना, चर्च-विस्तारवाद को सामान्य रूप में देखना, मुस्लिम नेताओं की गैर-कानूनी, देश-विरोधी, भंगिमाओं के बावजूद उन्हें ‘वंचित’ बताना, कश्मीर से हिन्दुओं के विस्थापन को आई-गई घटना जैसा स्वीकार्य कराना, अंग्रेजी को दिनो-दिन जीवन के हर क्षेत्र में विशेषाधिकारी, बल्कि एकाधिकारी बनाना, आदि। यह सब भाजपा शासनों में यथावत चलता रहता है। बल्कि कुछ को उत्साहपूर्वक बढ़ाया तक गया है।  

ध्यान दें, उक्त कामों में से एक भी जनता की इच्छा, अथवा किन्हीं सामाजिक संगठनों के दबाव से नहीं हुआ था। सब कुछ सीधे किसी सत्ताधारी की मनमर्जी या कुछ वामपंथी एक्टिविस्टों की प्रेरणा और साँठ-गाँठ से हुआ। 

सरदार पटेल के देहांत (1950 ई.) के बाद से, उक्त सभी प्रवृत्तियाँ और तदनुरूप विमर्श सीधे सरकार के माध्यम से स्थापित हुए। अतः उसे बदलने की कुंजी भी सरकारी पहलकदमी में ही है! किसी सुविचारित कदम से उक्त हरेक मुद्दे पर विमर्श तुरत उलट सकता है। यदि पहले से चली आ रही हिन्दू-विरोधी नीतियों पर नए सत्ताधारी चुप रहने के बजाए कोई उचित कदम उठाते या वैसी घटनाओं पर स्पष्ट बोलते, तो सेक्यूलर, वामपंथी तत्वों को झक मार कर उसे स्वीकार करना पड़ता। जैसे, उन्होंने भाजपा के पक्ष में चुनाव परिणामों को किया। 

किन्तु भाजपा शासनों ने कभी किसी मुद्दे पर हिन्दू-विरोधी राजनीतिक, वैचारिक दबदबे को बदलने के लिए एक तिनका तक नहीं उठाया। उलटे वे इस से सायास बचते रहे। गैर-राजनीतिक किस्म के नारे देना, और उसी पर हवा बाँधने की आदत इसी का उदाहरण है। उन की भंगिमा रही कि हिन्दू-विरोधी कानूनों, शिक्षा या गतिविधियों को रोकने का काम उन का नहीं है। 

भाजपा सत्ताधारियों ने हैरतअंगेज प्रदर्शन करते हुए (जिसे यहाँ तमाम हिन्दू-विरोधी खुशी से देखते हैं) रूटीन सड़क-बिजली और स्थापित सेक्यूलर, हिन्दू-विरोधी नीतियों के ही पालन का डंका पीटा! वे इसे अपनी सदाशयता मानते हैं। पर हिन्दू-विरोधी ताकतें इसे उन की हीनता समझती हैं और ठीक ही समझती हैं। 

आखिर, जिन नीतियों, परंपराओं का विरोध करते हुए किसी दल ने दशकों से जनाधार बनाया हो – वह सत्ता में आकर गैस-चूल्हे, इन्कम-टैक्स और सड़क निर्माण के बढ़े आँकड़े देकर अपनी वाह-वाही करे, तो उस का भगोड़ापन किस दुश्मन को समझ में नहीं आएगा? 

दशकों से जनसंघ-भाजपा ने अपनी जो छवि बनाई, उस के अनुसार एक भी काम करने की उस की इच्छा नहीं दिखती। तमाम हानिकारक कांग्रेसी-वामपंथी नीतियों का ही अनुपालन वही चीज है। जाति-गत आरक्षण को सीमित समय में खत्म करने, जो संविधान का आदेश था, के बजाए उसे बढ़ाने का काम भी उसी का उदाहरण है। यह हिन्दू-विभाजक ब्रिटिश नीति को ही दोहराना बन गया है। भारतीय परंपरा में जाति का ऐसा जड़ अर्थ या व्यवहार कभी न था। अतः कुछ लोगों को स्थाई आरक्षण, आदि दिए रखने का उद्देश्य दलगत राजनीति है, यह तो लाभ उठाने वाले भी जानते हैं। पर इस से समाज विभक्त रहता है। 

दुर्भाग्यवश हिन्दुओं में बाहरी साम्राज्यवादी विचार-तन्त्रों का अध्ययन करने की प्रवृत्ति नहीं रही। जो करे, उसे भी सहयोग नहीं मिलता। राष्ट्रवादी संगठन दावा करते हैं कि भारत में हिन्दुओं को बाँटने, तोड़ने के पीछे विदेशी शक्तियों के सचेत प्रयास हैं। पर वे समस्या का शोध करने और उस का प्रतिकार करने का कोई उपाय नहीं करते। ध्यान दिलाने पर भी निष्क्रिय रहते हैं। उन का सारा ध्यान केवल पार्टी-बंदी और अपनी चुनावी उन्नति पर रहता है।

तब इस्लामी रणनीतिकार और क्रिश्चियन मिशनरी क्यों न यहाँ अपना शिकंजा कसते जाएं? वे हिन्दू नेताओं की गफलत का ही लाभ उठाते हैं। अरब में बैठे ईमाम, शेख और अयातुल्ला भारत की घटनाओं में हस्तक्षेप करते रहे हैं। रोम में बैठे पोप यहाँ बनते कानूनों पर नजर रखते हैं। और हम, ठीक दिल्ली में, लाखों इस्लामी घुसपैठियों के आ बसने, उन के जमीन-मकान खरीदने तक पर ध्यान नहीं देते! केवल गाल बजाते रहते हैं, कि हमारा संगठन इतना बड़ा है, इतने सदस्य हो गए, आदि। जबकि इन्हीं के सत्तासीन होने पर भी हालत वही की वही बनी रहती है। मगर गाल बजाना और अनाम विदेशियों को कोसना चालू रहता है। 

ऐसे घोर अज्ञान और हीन-भावना से अच्छा रुटीन शासन भी नहीं होता। देश की उन्नति करना तो दूर की बात है। आश्चर्य है कि स्वामी विवेकानन्द को अपना आदर्श मानने वाले ऐसे वैचारिक दिवालिएपन से ग्रस्त हों! देश भर के संसाधन हाथ में लेकर भी उन्हें करने को कोई काम और देने को कोई विचार न हो! ले-देकर पिटी चालें, काठ की हाँड़ी और अपने मुँह मिया मिट्ठू बनना यही दिखाता है कि उन्होंने केवल विवेकानन्द की मूर्ति और फोटो बनवाई है। उन से एक शब्द नहीं सीखा।   विवेकानन्द ने कहा था कि भारत में किसी प्रकार का सुधार या उन्नति की चेष्टा करने के पहले धर्मप्रचार आवश्यक है। भारत को राजनीतिक विचारों से भरने के पहले आवश्यक है कि उस में आध्यात्मिक विचारों की बाढ़ ला दी जाए। उन्होंने निर्देश दिया था कि संसार के सभी राष्ट्रो में अपने शास्त्रों का प्रचार करना ही हमारी सनातन वैदेशिक नीति होनी चाहिए। पर पृष्ठभूमि में विवेकानन्द की फोटो के साथ इंटरव्यू देने वाले भाजपा सत्ताधारियों ने इस निर्देशों के ठीक विपरीत सारे काम किए हैं। वे आर्थिक विकास करके, चतुर दलबंदी और बार-बार बदलती लफ्फाजी करके, केवल सत्ता में बने रहना अपनी सफलता मानते हैं।  पर उन्हें और हमें भी स्वामी विवेकानन्द की यह चेतावनी याद रखनी चाहिए, ‘‘यदि तुम धर्म को फेंक कर राजनीति, समाजनीति अथवा अन्य किसी दूसरी नीति को अपनी जीवन-शक्ति का केन्द्र बनाने में सफल हो जाओ, तो उस का फल यह होगा कि तुम्हारा अस्तित्व तक न रह जाएगा।’’ 

क्या भाजपा के नेतागण इसी दिशा में जाने के लिए सारी शक्ति लगा रहे हैं? समय ही उत्तर देगा। 

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