Loading... Please wait...

पतन बाद तो सोचो वामपंथियों!

शंकर शरण
ALSO READ

त्रिपुरा में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की हार एक अर्थ में वक्त की मार है। बंगाल और केरल में माकपा के माथे बड़े-बड़े पाप हैं, जो त्रिपुरा में नगण्य था। देश के अन्य मुख्यमंत्रियों की तुलना में त्रिपुरा में माणिक सरकार एक आदर्श रहे थे। फिर भी उन की हार हुई। यह दुनिया भर में कम्युनिस्टों की विदाई का ही क्रम है, जिस से कोई बच नहीं सकता। 

फिर भी, आश्चर्यजनक है कि यहाँ सर्वाधिक संख्या में बौद्धिकों से भरी कम्युनिस्ट पार्टियों में ही वैचारिक रूप से अधिक मूढ़ता रही है। दो दशकों से लगातार कमजोर होते जाने पर भी वे सही समीक्षा तक न कर सके कि ऐसा क्यों हुआ? समीक्षा के नाम पर भी वे लफ्फाजी ही अधिक करते रहे। जैसे, एक कम्युनिस्ट नेता यहाँ अपने पतन का कारण 1990 के दशक से जाति और धर्म-मजहब राजनीति की जड़ें जमना बताते हैं। जबकि मजहबी राजनीति को स्वयं कम्युनिस्टों ने सक्रिय समर्थन देकर पाकिस्तान बनवाया था। उसी तरह, जाति राजनीति भी लोहिया ने बहुत पहले स्थापित की थी जो स्वयं समाजवादी और नरम मार्क्सवादी थे। फिर कम्युनिस्टों ने भी भाजपा को हराने के नाम पर घनघोर जातिवादियों को समर्थन दिया। इस हद तक कि कई कम्युनिस्ट नेता उन्हीं जातिवादी पार्टियों में चले गए। सो, मजहबी, जातिवादी राजनीति को बल पहुँचाने में कम्युनिस्टों का बड़ा योगदान है। इसलिए इन के पतन के कारण कुछ और हैं। 

सोवियत संघ के खात्मे और चीन के फिर पूँजीवादी बन जाने से मार्क्सवाद का खोखलापन 28 साल पहले ही जग-जाहिर हो गया। फिर भी वही विचारधारा पकड़े रहने से भारतीय कम्युनिस्ट अपना नैतिक बल खोने लगे। जब तक कम्युनिज्म एक विकल्प दिखता था, तब तक उन के कार्यकर्ताओं, समर्थकों में एक मनोबल था। सोवियत विघटन के बाद वह नहीं बचा। इस पर सोचने के बदले, पहले की तरह मार्क्सवाद को सही ठहराने और यथावत चिन्हित ‘दुश्मनों’ के विरुद्ध लफ्फाजी से वामपंथी श्रीहीन होने लगे। उन्होंने बदले समय को पहचानने से इंकार किया। 

उसी वैचारिक जड़ता ने वामपंथियों को मोर्चा राजनीति करने में भी बार-बार छला। उन्होंने जनवादी-जनविरोधी, उत्पीड़ित-उत्पीड़क, आदि की पहचान ठोस सचाई के बदले बने-बनाए फार्मूले से करने की आदत बनाए रखी। समाज के मित्र व शत्रु वे पहले तय कर लेते हैं। फिर उस के लिए तर्क, तथ्य, घटनाएं, आँकड़े खोजते रहते हैं। 

पहले यहाँ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) सब से बड़ी वामपंथी पार्टी थी। उस की कांग्रेस के साथ पुरानी दोस्ती थी। लेकिन 1977 में इंदिरा गाँधी की करारी हार के बाद भाकपा ने माकपा की नकल में कांग्रेस-विरोध अपना कर अपना नाश कर लिया। जबकि स्वयं इंदिरा ने कम्युनिस्ट नेता मोहित सेन से आग्रह किया था कि साथ रहें। पर भाकपा ने कांग्रेस को सदा के लिए खत्म मान लिया, और जनता दल के सम्मोहन में चली गई। फिर समय बदलने पर माकपा भी कांग्रेस के साथ गई। लेकिन अंततः मनमोहन सिंह सरकार का विरोध कर उस ने भी अपनी हैसियत खोने का उपाय कर लिया। 

यह सब जड़ मतवाद की पूजा का ही फल था। भाजपा-विरोध को ‘विचारधारा’ बनाकर तमाम वामपंथियों ने हिन्दू-विरोधी, इस्लामी अलगाववादी, जातिवादी, भ्रष्ट, अपराधी नेताओं तक को समर्थन दिया। किसी सामान्य व्यक्ति को भी जो सत्य दिखता था, उस से भी इंकार कर वामपंथियों ने विचित्र सैद्धांतिक कसरतें की। अपनी ही लफ्फाजी से अपना माथा चकरा लिया। 

इस का सब से बड़ा प्रमाण हैः आतंकवाद, अलगाववाद और सांप्रदायिकता पर वामपंथियों का रुख। सारी दुनिया में दशकों से चल रहे जिहादी आतंकवाद पर उन्होंने शुतुरमुर्गी रवैया अपनाया। दुनिया भर के मुस्लिम शासकों, इस्लामी चरमपंथियों को ‘प्रगतिशील’ बताने की जिद की। इस्लामी संगठनों ने देश-विदेश में कितने ही नर-संहार किए, उन सब पर या तो चुप रहे या बचाव किया। यह उत्पीड़क मुसलमानों का पक्ष लेकर उत्पीड़ित हिन्दुओं का क्रूर मजाक उड़ाने के सिवा कुछ न था। लेकिन इसे अपनी ‘विचारधारा’ मानकर वामपंथी आज भी गर्वान्वित हैं। जेएनयू में इसी की उदाहरण घटनाएं आए-दिन होती हैं।

सामाजिक नीतियों पर भी वामपंथी रुख मतवादी रहा है। उद्योगपतियों, व्यापारियों को नियमतः शत्रु मान कर औद्योगिक संबंधों को बिगाड़ने की नीति ने बंगाल के औद्योगिक वातावरण का सत्यानाश किया। जो बंगाल देश का अग्रणी औद्योगिक क्षेत्र था, वहाँ सिर्फ खंडहर रह गए। फिर, वोट-बैंक के लोभ में बंगलादेश से घुसपैठ को प्रश्रय देकर बंगाल में मार्क्सवादियों ने इस्लामी दबदबा कायम करवाया। इस से वहाँ मार्क्सवादी राज तो लंबा चला, किन्तु देश-विरोधी ताकतें मजबूत होती गईं। 

इन सब पापों की वामपंथियों ने कभी समीक्षा न की। बल्कि लीपा-पोती करते हुए केवल ‘हिन्दू-संप्रदायिकता’ का झूठा प्रचार कर हर प्रकार के अलगाववादियों, उग्रवादियों, आतंकियों का बचाव किया। इस ने जनता के बीच वामपंथियों को अविश्वसनीय बनाया और भाजपा को स्वभाविक बढ़त मिलती गई।  

वस्तुतः, वामपंथियों की स्थिति बनी रह सकती थी। यदि वे सचाइयों को स्वीकार कर नीतियाँ बनाते। सांप्रदायिकता और सेक्यूलरिज्म पर निष्पक्ष होते। तब आगे का मार्ग उन्हें स्वतः दिखता। मूल शक्ति-स्त्रोत सचाई में है, विचारधारा में नहीं। यह न समझने से ही मार्क्सवादी नेता और बौद्धिक बदलते समय में रास्ता नहीं खोज सके। उन्होंने विचारधारा से अपनी आँखों पर इतनी कस कर पट्टी बाँध ली, कि रूस और चीन के कम्युनिस्टों के मार्ग-परिवर्तन से भी कुछ न सीख सके। 

कवि अज्ञेय ने लिखा है, ‘‘हठ - लक्ष्य से चिपटने की, या कि रास्ते से? / कोई भी मार्ग छोड़ जा सकता है, बदला जा सकता हैः/ पथ-भ्रष्ट होना कुछ नहीं होता / अगर लक्ष्य-भ्रष्ट न हुए।’’ यदि वामपंथी सचमुच जन सेवा का लक्ष्य रखते, उत्पीड़ित जन के पक्षधर होना चाहते, तब पूर्व-निर्धारित निष्कर्षों, मुहावरों से चिपटे रहने की सनक से मुक्त होते। फिर उन्हें सही मार्ग स्वयं मिल जाता। 

कोई भी विचारधारा सचाई से ऊँची चीज नहीं है। दशकों तक भरपूर मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद घोंट कर अंततः चीनी देंग या रूसी गोर्बाचेव, सब ने पाया कि सचाई की ताकत विचारधारा से बहुत अधिक है। जैसा महान रूसी लेखक सोल्झेनित्सिन ने लिखा, ‘सचाई का एक शब्द पूरी दुनिया पर भारी पड़ता है।’ सो, अंत में झख मार कर चीनी-रूसी नेता लोग नतीजे पर पहुँचे कि अपनी विचारधारा की निष्फलता स्वीकारो। तभी से उन के देशों मे बुनियादी परिवर्तन आरंभ हुए। फलतः विचारधारा तो गई, मगर सचाई स्वीकार करने वाले कम्युनिस्ट नए रूप में प्रासंगिक बने रहे। 

यहाँ भी वामपंथियों को सोचना होगा कि यदि उन्हें देश के लिए उपयोगी बनना है तो सचाई का ही सहारा लेना होगा। मजहब, जाति का पक्षपाती उपयोग करने की चतुराई छोड़नी होगी। भारत में हिन्दू-विरोध देश-विरोध ही है, यह समझना होगा। फिर, शोषित-पीड़ित की सेवा प्रत्यक्ष ही संभव है। वह करने के लिए निष्ठा चाहिए, विचारधारा नहीं। इस टेक को आधार बनाकर वामपंथी अब भी अपने लिए सम्मानजनक स्थान बना सकते हैं।

643 Views

बताएं अपनी राय!

नीचे नजर आ रहे कॉमेंट अपने आप साइट पर लाइव हो रहे है। हमने फिल्टर लगा रखे है ताकि कोई आपत्तिजनक शब्द, कॉमेंट लाइव न हो पाए। यदि ऐसा कोई कॉमेंट- टिप्पणी लाइव हुई और लगी हुई है जिसमें अर्नगल और आपत्तिजनक बात लगती है, गाली या गंदी-अभर्द भाषा है या व्यक्तिगत आक्षेप है तो उस कॉमेंट के साथ लगे ‘ आपत्तिजनक’ लिंक पर क्लिक करें। उसके बाद आपत्ति का कारण चुने और सबमिट करें। हम उस पर कार्रवाई करते उसे जल्द से जल्द हटा देगें। अपनी टिप्पणी खोजने के लिए अपने कीबोर्ड पर एकसाथ crtl और F दबाएं व अपना नाम टाइप करें।

आपका कॉमेट लाइव होते ही इसकी सूचना ईमेल से आपको जाएगी।

© 2018 ANF Foundation
Maintained by Quantumsoftech