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राहुल के रास्ते की बाधा क्या है?

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेरिका की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में उस सवाल का जवाब दिया, जिसका सामना उनकी दादी, उनके पिता, उनकी मां और वे खुद बरसों से कर रहे थे, लेकिन कभी किसी ने दो टूक जवाब नहीं दिया था। उनसे वंशवाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सीना ठोक कर कहा कि वे वंशवाद की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। राहुल ने यह भी कहा कि भारत ही नहीं समूचे एशिया में और दुनिया के दूसरे देशों में भी राजनीति से लेकर दूसरे कई क्षेत्रों में वंशवाद से ही काम चलता है। 

अमेरिका दुनिया का सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश नहीं है, लेकिन मौजूदा समय में लोकतंत्र सबसे मजबूत और जीवंत वहीं पर है। वहां भी पिछले साल एक पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन ने राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा था और उससे पहले वे राज्य की विदेश मंत्री थीं। उससे आठ साल पहले जार्ज बुश जूनियर का राष्ट्रपति का कार्यकाल खत्म हुआ था, जिनके पिता भी देश के राष्ट्रपति रहे थे और भाई एक बड़े राज्य के गवर्नर थे। यह महज संयोग है कि जिस समय राहुल गांधी अमेरिका में अपने को वंशवादी राजनीति का प्रतिनिधि बता रहे थे, उसी समय जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत की यात्रा पर आए थे। गांधी-नेहरू परिवार के सबसे बड़े विरोधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में शिंजो आबे ने बताया कि उनके नाना नोबुशुके किशी प्रधानमंत्री के रूप में भारत आए थे तब राहुल गांधी के नाना जवाहरलाल नेहरू ने उनका कैसा भव्य स्वागत किया था।

सो, निश्चित रूप से भारत या एशिया के किसी भी देश में यहां तक की दुनिया के भी किसी देश में वंशवाद राजनीति के रास्ते की बाधा नहीं है, बल्कि सफलता का पासपोर्ट है। जाहिर तौर पर राहुल गांधी भी इस बात को जानते हैं और तभी उन्होंने भी इसे स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई। तब सवाल है कि आखिर राहुल गांधी के रास्ते की बाधा क्या है? क्या खुद उनकी राजनीति करने का तरीका उनके लिए मुश्किल पैदा कर रहा है या कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति उनके लिए बाधा है या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की कमान में भाजपा ऐसी राजनीति कर रही है, जिससे देश का मिजाज बदल रहा है और राहुल या कांग्रेस की राजनीति उसमें फिट नहीं बैठ रही है? 

इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं और तब तक पक्का जवाब नहीं मिलेगा, जब तक राहुल पूरी तरह से राजनीति में उतर कर, कांग्रेस की कमान संभाल कर अपने को आजमाते नहीं हैं। उन्होंने अब तक टुकड़ों टुकड़ों में राजनीति की है और वह भी बड़ी हिचक के साथ। उन्होंने 2009 में कांग्रेस की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। पार्टी महासचिव के नाते उन्होंने उत्तर प्रदेश में बड़ी मेहनत की, जहां आश्चर्यजनक रूप से कांग्रेस ने 22 सीटें जीतीं। लेकिन कोई भी उनको जीत का श्रेय नहीं दे रहा है क्योंकि खुद ही उस समय ऐसा मैसेज नहीं जाने दिया था कि वे चुनाव की कमान संभाल रहे हैं। 

कांग्रेस को 2009 के लोकसभा चुनाव में और उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों में मिली जीत का श्रेय राहुल गांधी को नहीं मिलने के पीछे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति भी जिम्मेदार है। अगर उस समय राहुल के करिश्मे को इस चमत्कार का श्रेय मिलता तो कांग्रेस के कई पुराने नेताओं की राजनीति पर ताले लग जाते। सो, इसे मनमोहन सिंह के प्रति मध्य वर्ग के रूझान, कांग्रेस के सामूहिक नेतृत्व की मेहनत और भाजपा के उस समय के चेहरे लालकृष्ण आडवाणी के लिए संघ की उदासीनता को कांग्रेस की जीत का श्रेय दे दिया गया। कांग्रेस के कई नेताओं ने सुविचारित तरीके से ऐसा किया ताकि उनकी राजनीति जमी रहे। 

अब भी ऐसे नेता कांग्रेस को मजबूत करने और भाजपा के मुकाबले मजबूत विकल्प के तौर पर उसे खड़ा करने की बजाय अपनी निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में डूबे हैं, जिससे कांग्रेस की राजनीति की भटकी हुई दिख रही है। राहुल गांधी के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा यह राजनीति है। वे अब अपनी हिचक छोड़ चुके हैं और अपनी नई टीम के साथ नए तरह की राजनीति करने के लिए तैयार हैं। वे कांग्रेस की समावेशी राजनीति का चेहरा बन सकते हैं, यह भारतीय राजनीति की आजमाई हुई हकीकत है। लेकिन कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति उनके लिए बाधा बन रही है। 

उनको इससे निकलने के लिए अपनी दादी इंदिरा गांधी की राजनीति से कुछ सीख लेनी होगी। आजादी के बाद गांधी-नेहरू परिवार की वे इकलौती सदस्य थीं, जिनको पार्टी में जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा था। पुराने नेताओं की तिकड़मों का सामना करना पड़ा था और उनको निपटाना पड़ा था। उनके मुकाबले राजीव और सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस में जमने की राह बहुत आसान रही थी। इन सबमें राहुल की राह मुश्किल दिख रही है वरना प्रधानमंत्री या पार्टी अध्यक्ष बनने के लिए किसी गांधी-नेहरू को 13 साल की सक्रिय राजनीति नहीं करनी पड़ती है।

दूसरी बाधा देश की राजनीति का बदलता मिजाज है, जिसके अनुरूप उनको खुद को बदलना होगा। भाजपा की हिंदुवादी राजनीति इसका एक पहलू है और कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित करने का प्रचार उसी का दूसरा पक्ष है। राहुल को इसका जवाब देना होगा और इसके साथ साथ भ्रष्टाचार की छवि से भी पार्टी को बाहर निकालना होगा। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि वंशवाद राहुल गांधी की समस्या नहीं है। उनकी समस्या पार्टी की अंदरूनी राजनीति और भाजपा के प्रचार तंत्र के जरिए कांग्रेस की बना दी गई छवि है, जिसे उनको तोड़ना है।

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