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कश्मीर में अमन बहाली की बात

केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह जम्मू कश्मीर के दौरे पर हैं। उन्होंने अलग अलग समूहों से मुलाकात की है और स्थायी शांति बहाली के उपायों पर चर्चा की है। उन्होंने सबको साथ लेकर संवाद करते हुए भरोसा बढ़ाने और स्थिरता लाने की बात कही है। उन्होंने दावा किया है कि कश्मीर में अमन बहाली के साफ आसार दिख रहे हैं। 

उन्होंने जम्मू कश्मीर को अलग और विशेष पहचान देने वाले संवैधानिक प्रावधानों पर भी राज्य के लोगों को भरोसा दिलाया। उन्होंने कहा कि सरकार राज्य के लोगों को भरोसे में लिए बगैर कोई भी पहल नहीं करेगी। 

राजनाथ सिंह ने संविधान के अनुच्छेद 35ए पर जम्मू कश्मीर के लोगों को भरोसा दिलाया कि सरकार लोगों को भरोसे में लेकर कोई भी कदम उठाएगी। अनुच्छेद 35ए नागरिकता को परिभाषित करती है। इसके कई प्रावधान बहुत भेदभाव वाले हैं। इसकी वजह से ही दूसरे राज्य का कई व्यक्ति जम्मू कश्मीर में जमीन खरीद कर बस नहीं सकता है। यहां तक कि राज्य की लड़कियां अगर किसी बाहरी व्यक्ति से शादी कर लेती हैं तो वह भी अपने सारे अधिकार खो देती है। 

पिछले कुछ दिनों अनुच्छेद 35 की चर्चा ज्यादा हो रही थी और अनुच्छेद 370 की चर्चा बंद हो गई थी। जबकि पहले अनुच्छेद 370 भाजपा का कोर मुद्दा हुआ करती थी। राज्य में पीडीपी के साथ सरकार बनाने के बाद भाजपा ने उस पर चर्चा ही बंद कर दी। क्या उसी तरह से 35ए पर भी चर्चा बंद कर दी जाएगी? क्या राज्य में शांति बहाली के लिए अनिवार्य रूप से इन दोनों अनुच्छेदों को बनाए रखा जाएगा और इस पर चर्चा को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

यह भी एक बड़ा सवाल है कि आखिर राज्य में स्थायी शांति बहाल होने की उम्मीदों का आधार क्या है? क्या सरकार को लग रहा है कि अलगाववादी गतिविधियां खत्म हो जाएंगी और सारे संगठन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल हो जाएंगे? या सरकार यह मान रही है कि आतंकवादी और विध्वंसक गतिविधियों की फंडिंग की एनआईए से कराई जा रही जांच अंततः तार्किक परिणति पर पहुंचेगी और सारे अलगाववादी संगठनों की कमर टूट जाएगी और वे मजबूर होकर मुख्यधारा में लौटेंगे? 

जो अलगाववादी हैं और जिन्होंने घाटी के एक एक नागरिक के मन में भारत के विरोध में जहर भर रखा है, उनका हृदय परिवर्तन आखिर कैसे होगा? सरकार एक तरफ भरोसा बढ़ाने वाले कदम उठा रही है तो दूसरी ओर एनआईए का डंडा भी चला रही है। इस दोहरी रणनीति का क्या फायदा होता है, यह अगले कुछ दिन में पता चलेगा। 

केंद्रीय गगृह मंत्री राजनाथ सिंह ने ऐसे संकेत दिए हैं कि सरकार सभी पक्षों के साथ वार्ता के लिए राजी है। उन्होंने पत्रकारों के सवालों के जवाब में कहा कि वे स्थायी शांति के लिए किसी के साथ भी बातचीत के लिए तैयार हैं और जरूरी हुआ तो पचासों बार राज्य का दौरा कर सकते हैं। उन्होंने अलगाववादियों से लेकर पाकिस्तान तक के बारे में यहीं बात कही। लेकिन इस बातचीत से पहले हिंसा रूकनी चाहिए। अलगाववादी संगठन लोगों को भड़काना बंद करें और भारतीय संविधान के दायरे में बातचीत के लिए राजी हों तो सरकार बात करेगी। लेकिन इसकी पहले उनको करनी होगी और उससे पहले सरकार अपनी कार्रवाई नहीं रोकेगी। 

जम्मू कश्मीर में स्थायी शांति बहाली के रास्ते में एक बड़ी बाधा पाकिस्तान है। वह कश्मीर में लगातार दखल देता है और आतंकवादी गतिविधियों को भड़काता है। वह सीमा पार से घुसपैठ कराता है और हिंसक वारदातों को अंजाम दिलाता है, जो सुरक्षा बलों के लिए बड़ी चुनौती है। 

पिछले साल सितंबर के महीने में ही भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक करके नियंत्रण रेखा के पार स्थित कई आतंकवादी शिविरों को नष्ट किया था। लेकिन उसके बाद भी सेना और सुरक्षा बलों के ऊपर आतंकी हमलों में कमी नहीं आई है, बल्कि उसके बाद से ज्यादा हमले हुए हैं और सुरक्षा बलों के ज्यादा जवान मारे गए हैं। 

राजनाथ सिंह ने कहा है कि पाकिस्तान सीमा पार से घुसपैठ बंद कराए और भारत विरोधी गतिविधियों के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल बंद कराए तो उसके साथ बात हो सकती है। भारत को पाकिस्तान से बात करने में कोई दिक्कत कभी भी नहीं रही है। समग्र वार्ता होती रही है। लेकिन हर बार पाकिस्तान ने धोखा दिया है और कोई न कोई ऐसी कार्रवाई की है, जिससे वार्ता टूटी है। सो, इस मामले में भी पहल पाकिस्तान के हाथ में है कि वह बातचीत के जरिए कश्मीर समस्या का हल चाहता है नहीं।

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