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विपक्षी एकता मजबूत हुई!

अजित कुमार -- केंद्र सरकार के खिलाफ विपक्ष के लाए अविश्वास प्रस्ताव के बाद अब राज्यसभा के उप सभापति पद के चुनाव में भी विपक्षी एकता की झलक दिखी है। यह अलग बात है कि विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव पर भी हार गया था और उप सभापति के चुनाव में भी हार गया। पर इन दोनों घटनाओं से पक्ष और विपक्ष के बीच लड़ाई की रेखा खींच गई। 

साथ ही पार्टियों की पहचान भी हो गई है कि रेखा के किस ओर कौन खड़ा है। जिनको अंततः भाजपा के साथ जाना है उनकी पहचान हो गई है। अच्छा हुआ कि लोकसभा चुनाव में समय रहते इसकी पहचान हो गई। यह तय हो गया है कि तेलंगाना में सरकार चला रही तेलंगाना राष्ट्र समिति को भाजपा के साथ जाना है। वाईएसआर कांग्रेस अंततः भाजपा के साथ जाएगी। शिव सेना को भी अंत पंत भाजपा के साथ ही रहना है। 

बीजू जनता दल ने भी साफ संकेत कर दिया है कि वह भाजपा से दूर नहीं है, भले राज्य में कैसी भी लड़ाई चल रही हो। हालांकि ऐसा नहीं है कि जिन लोगों ने अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति के चुनाव में भाजपा का विरोध किया है वे सब सेकुलर राजनीति के खिलाड़ी हैं और बाद में किसी मुकाम पर भाजपा से नहीं जुड़ेंगे। पर कम से कम लोकसभा चुनाव से पहले उनका मोर्चा स्पष्ट है। वे भाजपा से लड़ रहे हैं और इस लड़ाई में विपक्ष के साथ रहेंगे। 

यह आमतौर पर कहा जा रहा है कि अगर विपक्ष एकजुट होता तो राज्यसभा के उप सभापति का चुनाव विपक्षी उम्मीदवार जीतता। पर यह एक मिथक है। विपक्ष की कई पार्टियां ऐसी हैं, जिनका रूझान शुरू से भाजपा के प्रति रहा है और अहम मौकों पर वे भाजपा का साथ देते रहे हैं। 

इनमें ज्यादातर ऐसी पार्टियां हैं, जो पहले भाजपा के साथ रह चुकी हैं। और कुछ ऐसी भी पार्टियां हैं, जो भविष्य में भाजपा के साथ जाना चाहती हैं। जो पार्टियां अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति चुनाव में विपक्ष के साथ नहीं आईं, असल में विपक्षी खेमा पहले से उनको अपने साथ नहीं मान रहा था। जिनके साथ रहने का पहले से भरोसा था वे साथ रहे। 

कांग्रेस के साथ वामपंथी पार्टियां खड़ी रहीं तो तृणमूल कांग्रेस भी खड़ी रही। सपा, बसपा और राजद यानी उत्तर भारत में 120 लोकसभा सीटों वाले दो राज्यों के मजबूत क्षत्रप विपक्ष के साथ रहे। दक्षिण के तीन सबसे बड़े क्षत्रप चंद्रबाबू नायडू, एमके स्टालिन और एचडी देवगौड़ा की पार्टी विपक्षी खेमे के साथ जुड़ी रही। जो, अलग रहे वे अगले लोकसभा चुनाव की विपक्षी रणनीति में बहुत अहम नहीं दिख रहे हैं। 

अगले चुनाव में भाजपा का विजय रथ रोकने के लिए जिन पार्टियों की जरूरत है वे विपक्ष के साथ रहे। इस लिहाज से समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का खास महत्व है। दोनों अगर साथ लड़ते हैं और विपक्ष के खेमे में रहते हैं तो भाजपा को बड़ा झटका लगेगा। ये दोनों लगातार विपक्षी खेमे के साथ हैं। इसी तरह अगर कांग्रेस, तृणमूल और लेफ्ट साथ रहे तो पश्चिम बंगाल में भाजपा का खाता नहीं खुलेगा। ये तीनों अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति के चुनाव में साथ रहे हैं। 

आगे क्या होगा यह नहीं कहा जा सकता है पर अभी तीनों साथ हैं। इसी तरह राष्ट्रीय जनता दल दोनों मौकों पर कांग्रेस के साथ रहा। झारखंड मुक्ति मोर्चा का कोई राज्यसभा सांसद नहीं है पर अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में उसने विपक्ष का साथ दिया। इसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस का एलायंस दोनों मौकों पर मजबूत दिखा। भाजपा का साथ छोड़ने वाली टीडीपी कम से कम अगले लोकसभा चुनाव तक विपक्ष के साथ हैं। इसी तरह इस बार दक्षिण में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें जीतने वाली संभावित पार्टी डीएमके भी कम से कम लोकसभा चुनाव तक विपक्ष के साथ है। 

अविश्वास प्रस्ताव और उप सभापति का चुनाव जीतने से भाजपा और एनडीए का मूड बम बम हैं। भाजपा लगातार जीत कर खुश है और साथ ही इस बात को लेकर भी खुश है कि विपक्ष एकजुट नहीं हो सका। पर असल में इन दोनों मामलों में जो पार्टियां विपक्ष के साथ नहीं आईं उनका रुख विपक्ष के सामने पहले से स्पष्ट था। विपक्षी खेमा उनको अपने साथ मान कर नहीं चल रहा है। 

विपक्ष के रणनीतिकारों को लग रहा है कि अगर इन पार्टियों ने भाजपा का विरोध किया तो ठीक है और नहीं किया तब भी ठीक है। इसलिए कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे नेताओं ने इनके ऊपर ज्यादा भरोसा नहीं किया और न इनसे बात की। संसद के मॉनसून सत्र में हुई दोनों घटनाओं ने विपक्षी एकता को मजबूत किया है तो साथ ही विपक्ष की एकजुटता की फाल्टलाइन भी जाहिर कर दी है। अब विपक्षी नेता मान रहे हैं कि उनको अगले लोकसभा चुनाव के लिए रणनीति बनाने में इससे आसानी होगी। 

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