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फांसी की सजा समाधान नहीं!

अजित द्विवेदी
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इन दिनों देश जम्मू कश्मीर के कठुआ और उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार कांड को लेकर उद्वेलित है। भारतीय जनमानस में ऐसा उद्वेलन गाहेबगाहे होता रहता है और जब भी समाज ऐसे उद्वेलित होता है तो तत्काल उस पर पानी डाल कर उसे ठंडा करने के लिए सरकारी पार्टी सक्रिय हो जाती है और उनके साथ ही सक्रिय हो जाते हैं सरकारी बुद्धिजीवी, जो पहले सिर्फ मीडिया में दिखते थे, और अब सोशल मीडिया में भी दिखने लगे हैं। याद करें 2012 के निर्भया कांड को! तब आरोपियों को जल्दी सजा देने का जबरदस्त हल्ला मचा था और इसलिए आनन फानन में साकेत अदालत में एक फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाया गया था, जिसका उद्घाटन करने चीफ जस्टिस खुद गए थे। छह साल बाद वह मामला सुप्रीम कोर्ट में है और देश के ज्यादातर लोग उसे भूल कर कठुआ और उन्नाव में उलझे हैं।

कठुआ में आठ साल की एक मासूम बच्ची के साथ कई दिनों तक कई लोगों ने बलात्कार किया और उसके बाद हत्या कर दी गई। कोई भी मनुष्य कितनी विकृत मानसिकता का हो सकता है या कितना नृशंस हो सकता है, यह घटना उसकी मिसाल है। इसी तरह उन्नाव में एक युवती के साथ बलात्कार हुआ और उसकी शिकायत करने पर उसके पिता को पीटा गया और जेल में डाल दिया गया, जहां उसकी मौत हो गई। यह घटना ताकत से संचालित होने वाले भारतीय समाज की प्रतिनिधि घटना है। कठुआ की घटना के बाद जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ्ती ने नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करने वालों का फांसी की सजा देने का कानून बनाने जा रही हैं। उनसे पहले राजस्थान, मध्य प्रदेश और हरियाणा की सरकारों ने ऐसा कानून बना दिया है। केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने नाबालिग बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाए गए पोक्सो कानून में बदलाव करके इसमें फांसी की सजा जोड़ने का प्रस्ताव किया है। हो सकता है कि वे इस प्रयास में सफल हो जाएं। पर क्या बलात्कार की सजा फांसी कर देने से बलात्कार रूक जाएंगे? यह बहुत गंभीर सवाल है, जिस पर बेहद संवेदनशीलता के साथ विचार करने की जरूरत है।

कठुआ और उन्नाव की घटना के फर्क को देखेंगे तो उससे भी यह संकेत मिलेगा की नाबालिग बच्चियों के बलात्कारियों के लिए मौत की सजा का प्रावधान करना कितना गलत फैसला हो सकता है। कठुआ और उन्नाव का फर्क यह है कि कठुआ की छोटी सी मासूम बच्ची अब इस दुनिया में नहीं है। इस घटना को लेकर चल रहे हल्ले के बीच तीन और बिल्कुल इसी तरह की खबरें आई हैं। गुजरात के सूरत में नौ साल की एक बच्ची के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। बिहार के सासाराम में भी आठ-नौ साल की बच्ची की बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई और असम में भी एक 12 साल की बच्ची के साथ बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई है।

राजनीतिक दलों और सरकारों को इस बात से मतलब नहीं है कि छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार करने वालों के लिए मौत की सजा की बात करके वे उन बच्चियों का जीवन खतरे में डाल रहे हैं। उन्हें सिर्फ तात्कालिक फायदा चाहिए। वे अभी लोगों के गुस्से को ठंडा करना चाहते हैं। वे इन हालिया घटनाओं के बाद यह दिखाना चाहते हैं कि वे कुछ कर रहे हैं। असल में यह भारतीय लोगों की मानसिकता है, जो ऐसे बड़े और अक्सर बेसिरपैर के वादों से संतुष्ट हो जाता है। वह अपने प्रयास को सफल मानने लगता है और सिमट कर अपने खोल में चला जाता है। इसके बाद दुनिया फिर अपनी गति से चलने लगती है।

बहरहाल, नाबालिग बच्चियों से बलात्कार करने वालों को फांसी की सजा देने का प्रावधान लागू करने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि बलात्कारी फिर उस बच्ची को जीवित नहीं छोड़ेगा। उसका प्रयास होगा कि वह सबूत मिटाए। तभी सजा बढ़ाने की बजाय सजा सुनिश्चित करने की व्यवस्था होनी चाहिए। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कोई भी बलात्कारी सजा से नहीं बचेगा। अभी भारत की पुलिस व्यवस्था खास कर उसकी जांच और अपराध न्याय प्रणाली इतनी जटिल की है, बिल्कुल ओपन एंड शट केसेज में यानी बहुत स्पष्ट मामलों में भी सजा दिलाने में बरसों और दशकों लग जाते हैं। इतनी लंबी और खर्चीली प्रक्रिया में अक्सर पीड़ित पक्ष थक जाता है। आमतौर पर गरीब, पिछड़े और निचले तबके की बच्चियां ऐसी बर्बरता का शिकार होती हैं, जिनके परिजन लंबा मुकदमा लड़ने में सक्षम नहीं होते हैं। सबूत मिटाने, गवाहों की खरीद फरोख्त और दूसरे माध्यमों से न्याय को प्रभावित किया जाना इतना आम है कि आम लोग न्याय की उम्मीद छोड़ देते हैं।

इसलिए सजा बढ़ाने की बजाय सजा सुनिश्चित करनी होगी। इसके लिए पुलिस सुधार सबसे जरूरी हैं। कानून व्यवस्था बहाल करने वाली पुलिस और जांच करके आरोपियों को अदालत के कठघरे में सजा दिलाने वाली अभियोजन की पुलिस को अलग अलग करना होगा। त्वरित न्याय प्रणाली विकसित करनी होगी और इस तरह सजा का भय अपराधियों के मन में बैठाना होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि भारत में हत्या सहित कई अपराधों के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है पर कितने लोगों को फांसी हो पाती है! फांसी की सजा का प्रावधान होने से हत्याएं नहीं रूकी हैं, बल्कि हर साल इनमें इजाफा हो रहा है! सो, यह तय मानें की फांसी की सजा किसी बात का समाधान नहीं है।  दूसरे, जब समाज खुल कर बलात्कारी का बचाव करने लगे, बलात्कार के आरोपी के समर्थन में तिरंगा झंडा लेकर जुलूस निकाले जाने लगें, जाति के आधार पर सरकारें और पुलिस प्रशासन बलात्कार के आरोपी का बचाव करें तो पुलिस और अदालत से पहले उस सड़ते हुए समाज को सुधारने की जरूरत होती है।  

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