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चीन से रिश्तों में नया अध्याय क्या संभव?

बलबीर पुंज
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विश्व में जिस प्रकार के घटनाक्रम सामने आ रहे है और उससे वैश्विक राजनीति का प्रभावित होना स्वाभाविक है। उस पृष्ठभूमि में क्या भारत-चीन के संबंध प्रगाढ़ हो सकते है? गत दिनों चीन ने 28 भारतीय दवाओं (अधिकतर कैंसर विरोधी दवा) से आयात शुल्क हटा दिया। अब तक चीन से आयात-निर्यात में भारी असमानता के कारण भारत को कई वर्षों से 50 अरब डॉलर से अधिक का घाटा उठाना पड़ रहा है। इस पृष्ठभूमि में चीन का यह निर्णय भारतीय घाटे को कम करने में सहायक हो सकता है, क्योंकि चीन में कैंसर दवाओं का सालाना बाजार लगभग 19-20 अरब डॉलर का है। 

इसके अतिरिक्त, सीमा पर तनाव कम करने हेतु दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों ने कुछ दिन पहले बैठक भी की, साथ ही दोनों देशों के सैन्य मुख्यालयों के बीच हॉटलाइन सेवा शुरू करने संबंधित खबर भी सामने आई। जो चीन- विशेषकर उसकी सरकारी मीडिया, डोकलाम विवाद से उग्र शब्दावलियों का उपयोग कर भारत को धमकाने का प्रयास कर रहा था- उसके स्वरों में आज "रिश्तों का नया अध्याय" जैसे शब्द के पीछे का भावार्थ क्या है? 

उपरोक्त घटनाक्रमों की पटकथा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच 27-28 अप्रैल को वुहान में हुई अनौपचारिक बैठक ने लिखी है। किसी भी कूटनीतिक विजय का मापदंड संबंधित देशों के राष्ट्राध्यक्षों की राजनीतिक बुद्धिमत्ता, उसकी कार्यकुशलता और निर्णयों पर निर्भर करता है। इस भेंट से जो परिणाम अबतक सामने आए है, वह भारत के हित में है। यही कारण है कि भारत में जो भी बुद्धिजीवी या चिंतक (विरोधी सहित) प्रधानमंत्री मोदी के हालिया चीन दौरे का आकलन कर रहे है, उनमें से अधिकतर इस घटनाक्रम को एशियाई महाद्वीप में दो बड़े देशों के संबंधों में आई कड़वाहट को दूर करने के प्रयास के रूप में देख रहे है। 

वुहान में मोदी-शी के बीच हुई बैठक का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है, जिसका संबंध क्षेत्रीय और वैश्विक घटनाक्रमों से है, जो दोनों देशों को प्रभावित भी करता है। जिस समय विश्व की नजरें मोदी-शी की पहली अनपौचारिक बैठक की ओर थी, उसी दौरान दो शत्रु कोरियाई देशों के प्रमुख 30 वर्षों में पहली बार वार्ता के लिए एक मेज़ पर आमने-सामने बैठे थे। अमेरिका समर्थित दक्षिण-कोरिया के नेता मून-जे-इन से उत्तरी-कोरियाई तानाशाह किम-जोंग उन की भेंट स्वाभाविक रूप से चीन की महत्वकांशी आकांक्षाओं को निर्विवाद रूप से असहज कर रही होंगी। 

कोरियाई प्रायद्वीप पर चीन अपना दबदबा और रचनात्मक भूमिका को यथेष्ट बनाए रखना चाहता है, जिसमें उसका साथ वैचारिक सामानता के कारण उत्तरी-कोरिया भी देता आ रहा है। बीते डेढ़ माह में दो बार किम-जोंग का बीजिंग (25-28 मार्च) और डालियान (8 मई) में राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मिलना, साथ ही प्योंगयांग (3 मई) की दुर्लभ यात्रा के दौरान चीनी विदेश मंत्री वांग यी का किम-जोंग से भेंट करना- स्पष्ट करता है कि कोरियाई प्रायद्वीप में अपनी पकड़ कमजोर होने से चीन विचलित है। 

अब यदि किम-जोंग उन और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच होने वाली संभावित बैठक से कोई ठोस परिणाम निकलता है, तो नि:संदेह यह साम्यवादी चीन की विस्तारवादी मानसिकता व उसके अमेरिका विरोधी अभियान पर एक और करारी चोट होगी। 

दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था- अमेरिका और चीन के बीच छिड़ा व्यानपारिक युद्ध भी विश्व को प्रभावित कर रहा है। ट्रंप अधीन अमेरिका के कारण जिस तरह विश्व में संरक्षणवाद का दौर लौटा है, उसका प्रतिकार चीन भी अपनी संरक्षणवादी नीतियों के साथ कर रहा है। इस बीच अमेरिका, ईरान के साथ परमाणु समझौता भी निरस्त कर चुका है। वर्ष 2015 में हुए इस सौदे में अमेरिका-ईरान के अतिरिक्त ब्रिटेन, चीन, जर्मनी और रूस भी शामिल थे। एक ओर जहां चीन का अमेरिका से व्यापारिक युद्ध, तो दूसरी तरफ एशियाई-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्रों में बहुपक्षीय व्यापार और चीन के साम्राज्यवादी राजनीति को ध्वस्त करने की दिशा में भारत-अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया का एक मंच पर साथ आने से- चीन असहज राजनीतिक-आर्थिक स्थिति में पहुंच चुका है। 

अब इन हालिया घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि में संभवत: चीन समझ गया है कि विश्व में उसकी प्रतिकूल स्थिति में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश व भावी आर्थिकी महाशक्ति भारत के साथ टकराव जारी रखना और उसके प्रति अत्याधिक विरोधी मुद्रा अपनाना- उसे अबतक के सबसे बड़े भू-राजनीतिक संकट में फंसा सकता है। वर्तमान वैश्विक परिदृष्य से भारत भी अछूता नहीं है, उस स्थिति में बुद्धिमत्ता के साथ चीन से रिश्ते मजबूत करना उसके लिए लाभप्रद हो सकता है। आपसी सहयोग पर बल देने के अतिरिक्त अफगानिस्तान में भारत-चीन द्वारा एक संयुक्त आर्थिक परियोजना पर काम करने की सहमति देना- वुहान में मोदी-शी वार्ता का सबसे स्वागतयोग्य निर्णय है। अब क्योंकि कई चुनावी विश्लेषकों ने भविष्यवाणी की है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक और कार्यकाल पूरा करेंगे, तो यह भारतीय उपमहाद्वीप में स्थिरता के लिए अच्छा संकेत है। 

तानाशाह माओ-त्से-तुंग की मृत्यु के बाद अनंतकाल के लिए राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अधीन आ चुका चीन अच्छी तरह समझता है कि 1950-60 के दशक में पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनके बाद के कार्यकालों में जो भारत हुआ करता था- जिसमें उसे 1962 में शर्मनाक पराजय भी झेलनी पड़ी थी- वह 56 वर्ष पश्चात मोदी युग में पूरी तरह बदल चुका है। उस दौर में जिस प्रकार भारत साम्यवादी चीन के साम्राज्यवादी आतंक का शिकार हो रहा था, वह स्थिति भी 2018 में अब पूरी तरह परिवर्तित हो चुकी है। चीन अवगत है कि वर्तमान भारतीय नेतृत्व से युद्ध या दवाब की राजनीति से भारतीय क्षेत्रों पर कब्जा करने की अनुकूल स्थिति में तो वह बिल्कुल ही नहीं है। 

चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग को डोकलाम घटनाक्रम से तीन संकेत मिल चुके हैं। पहला- भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री इतने कमजोर नहीं है कि उनपर किसी प्रकार का दवाब काम आए। दूसरा- डोकलाम पर भारत का कड़ा रूख कोई आकस्मिक नहीं था, जिसे वह अपने अनुरूप सांचे में ढालने का प्रयास कर सकें। और तीसरा- यदि आवश्यकता हुई तो भारत अपने सभी शत्रुओं को उसी की भाषा में जवाब भी दे सकता है और उसकी आगामी रणनीति का भी अंदाजा लगा सकता है। 

डोकलाम विवाद एक ऐसा घटनाक्रम था, जिसमें चीन के साम्राज्यवादी नीति को सार्वजनिक रूप से भारत ने खुलकर चुनौती दी, जिसमें उसे अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों का साथ मिला। भारत द्वारा चीन की महत्वकांशी परियोजना "वन बेल्ट, वन रोड" का बहिष्कार करने, अमेरिका-जापान से सामरिक संधि, दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ते प्रभाव और इसी वर्ष दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन सम्मेलन व भारत-आसियान वार्ता से- चीन, विशेषकर राष्ट्रपति शी जिनपिंग भांप चुके हैं कि वह आज एक ऐसे प्रतिद्वंदी का सामना कर रहे है, जो नेहरुवादी युग के "हिंदी-चीनी भाई-भाई" के भ्रम से बाहर निकल चुका है, जिसमें भारतीय शासकों द्वारा उसकी कुटिल मंशा की अवहेलना की जा रही थी। 

यह सर्विदित है कि गत कई वर्षों से भारत के पड़ोसी देशों में निवेश के नाम पर चीन उसकी घेराबंदी कर रहा है और अस्थिर पाकिस्तान उसका सबसे बड़ा हथियार है। नेपाल में चीनी हस्तक्षेप से भारत अवगत है। हाल ही में भारत यात्रा पर आए चीनपरस्त नेपाली प्रधानमंत्री के.पी. ओली को संकेत मिल चुका हैं कि भारत अपने हितों की रक्षा करने के लिए तत्पर है और यदि अपने देश में बिजली उत्पादन परियोजनाओं के वित्तीय पोषण के लिए चीन को प्राथमिकता देता है, तो भारत उससे बिजली नहीं खरीदेगा। भारतीय हितों की रक्षा हेतु वर्तमान भारतीय नेतृत्व की इस दृढ़ता को वुहान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ चाय पी रहे चीनी राष्ट्रपति ने अवश्य अनुभव किया होगा। 

भारत-चीन के बीच संबंध सुदृढ़ हो- यह दोनों देशों के साथ-साथ शेष विश्व के हित में है। यह तभी संभव है, जब चीन स्वस्थ प्रतिस्पर्धा और आपसी सहयोग को बढ़ावा दें, अपनी साम्राज्यवादी महत्वकांशाओं और आतंकवाद पर दोहरे मापदंड का त्याग कर अपने सभी पड़ोसी देशों (भारत सहित) की संप्रभुता और उसकी अखंडता का सम्मान करना सीख जाएं।

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