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सऊदी-कतर की लड़ाई के हैं वैश्विक खतरे!

फारस की खाड़ी में संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा है। और यह संकट इतना गंभीर रूप धारण कर चुका है कि रोजाना कोई न कोई ऐसी घटना और बयानबाजी हो रही है जिससे दुनिया स्तब्ध है। अभी तक किसी के भी गले ये बात नहीं उतरी है कि सऊदी अरब आखिरकार क्यों कतर को राजनयिक रूप से अलग-थलग करने के अपने फैसले पर अड़ा हुआ है? इसके अलावा सऊदी अरब के नए राजकुमार मुहम्मद बिन सलमान की नए राष्ट्र प्रमुख के रूप में ताजपोशी ने इस संकट में आग में घी का काम किया है? दूसरे मुसलिम राष्ट्रों सहित पूरा अरब जगत इस बात को लेकर हैरत में है कि मध्य-पूर्व में आखिर ये हो क्या रहा है और संकट किस दिशा में बढ़ रहा है? खाड़ी के इस ताजा संकट से जो संकेत पूरी दुनिया में गए हैं, उनसे अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी सकते में है।  

यह जगजाहिर है कि मध्य-पूर्व में जो कुछ भी होता है, उसके पीछे कहीं न कहीं सऊदी अरब होता है। दरअसल इस्लाम के सबसे पवित्र स्थानों की रक्षा-सुरक्षा, देखभाल करने और तेल का भारी-भरकम खजाना होने की वजह से सऊदी अरब अपने को पूरे इलाके का शुरू से सरदार समझता है। लेकिन बाद में शिया बहुल राष्ट्र ईरान भी क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभरने लगा। सन 2003 में इराक से सद्दाम हुसैन को हटाए जाने के बाद ईरान ने इराक को न सिर्फ मदद दी, बल्कि सीरिया में अपनी पैठ बनाते हुए वह सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद के बचाव में भी उतर आया। और इस तरह ईरान ने इलाके में एक बड़े और नए खेल के जरिए अपनी धमक बनानी शुरू की। 

सन 2015 में ईरान से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटने के बाद ईरान और खुलकर आ गया और यह उसकी  सीधी–सीधी सऊदी अरब के लिए चुनौती थी। तभी मध्य-पूर्व की राजनीति में कतर का उदय हुआ। आज कतर खाड़ी में न सिर्फ ऐसा दूसरा देश है जिसके पास अकूत गैस है, बल्कि पूर्व से आने वालों के लिए रोजगार का भी सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। अपने  गैस भंडार और धन-प्रबंधन कौशल की वजह से थोड़े से वक्त में ही कतर ने खाड़ी क्षेत्र और पूरी दुनिया को कूटनीतिक रूप से अपनी ताकत का अहसास करा दिया है। 

खाड़ी क्षेत्र में कतर ही एकमात्र ऐसा मुल्क है जिसका अपना खबरिया चैनल अलज जीरा है। अलजजीरा के जरिए ही कतर अपनी ताकत दिखाता है, सहयोगी देशों को बढ़ावा देता है और सऊदी अरब के शाही परिवार की आलोचना करता है। इसके अलावा कतर खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के सदस्य देशों पर इस तरह से अपना कब्जा रखता है कि उनकी नीतियों को अपने हिसाब से मोड़ सके और विदेश नीति को प्रभावित कर सके। और इसमें ज्यादातर उसका निशाना सऊदी अरब ही होता है। 

दोहा ने जिस तरह से ईरान के साथ मधुर रिश्ते बनाए और मिस्र में मौजूदा राष्ट्रपति अल-सीसी के बजाय मुसलिम ब्रदरहुड को समर्थन देने की जो नीति अपनाई है, वह सऊदी अरब को नागवार गुजरी। जबकि सीरिया में चल रहे मौजूदा संकट में कतर और सऊदी अरब दोनों ही असद के शासन का विरोध कर रहे हैं, लेकिन दोनों ही लड़ाकू गुटों को मदद भी दे रहे हैं। इसलिए कतर अब एक ऐसे देश के रूप में उभर कर सामने आया है जिसकी अपनी एक विदेश नीति है। इलाके में धमक है।    

इसलिए पांच जून को सऊदी अरब ने कतर को सबक सिखाने का जो फैसला किया, उसके मूल में कतर की अपनी स्वतंत्र विदेश नीति है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और दूसरे सहयोगियों के साथ कतर को कूटनीतिक तौर पर घेरा गया। इसके बाद दूसरे छोटे अरब और अफ्रीकी राष्ट्र भी कतर के खिलाफ सऊदी अरब के फैसले के साथ हो लिए। इसका कुल मिला कर नतीजा ये निकला कि आज कतर पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया है और न केवल अरब जगत से बल्कि दुनिया भर से।

सामान्य परिस्थितियों में खाड़ी देशों के बीच जब गंभीर विवाद हो जाते हैं तो अमेरिका हल्का-फुल्का दखल देता है। लेकिन इस बार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनालल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ पूरी तरह से एकजुटता दिखाई है। दुनिया के 140 देश ट्रंप के साथ हैं। बाकी ब्रिटेन, यूरोप, भारत, रूस, चीन – सभी कूटनीतिक रूप से ‘देखो और इंतजार करो' की नीति पर चल रहे हैं। अभी तक कोई इस बात को नहीं समझ पाया कि आखिर सऊदी अरब और उसके सहयोगी यूएई ने कतर के खिललाफ इस तरह की कूटनीतिक कार्रवाई क्यों की? कतर पर कार्रवाई को न्यायोचित ठहराने में सऊदी अरब ने जो देरी की उससे वाशिंगटन भी निराश है। कुल मिलाकर मध्य-पूर्व में इस अशांति और कतर को अकेला छोड़ देने की एकमात्र वजह ‘समर्थित आतंकवाद’ नहीं हो सकती। तो फिर सवाल उठता है कि इसके लिए किसे दोषी ठहराया जाए? और मध्य-पूर्व की ये अशांति दुनिया को किस तरह से प्रभावित करने जा रही है?

सबसे पहले हमें एक बात पर स्पष्ट रूप से विचार करना होगा। मध्य-पूर्व में कोई भी देश फरिश्ता नहीं है। क्षेत्र के सारे देश- कतर, कुवैत या सऊदी अरब- जेहाद और राजनीतिक इस्लाम को पालते-पोसते हैं, उन्हें बढ़ावा देते हैं और उसका कट्टरता से समर्थन करते हैं। और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसा देश नहीं है जो इनका विरोध कर सके या इन्हें अलग-थलग कर सके, क्योंकि दुनिया का तेल इन्हीं के पास है और आज जीवन के लिए तेल ही सब कुछ है।  

कहने का मतलब यह है कि कतर पर सऊदी अरब का तात्कालिक गुस्सा इसलिए निकला क्योंकि वह कतर की ओर से मिल रही चुनौतियों को महसूस कर रहा था। सऊदी अरब के लिए ये ऐसी धमकी-चुनौती है जो उसे कतर और ईरान दोनों से मिल रही है। ये दोनों ही राष्ट्र एकजुट हैं और साथ ही स्वतंत्र देश भी हैं। कतर-सऊदी के बीच चल रही ये लड़ाई दरअसल ताकत की लड़ाई है। कौन खाड़ी क्षेत्र के मुखिया के रूप में स्थापित हो और किसका बर्चस्व बना रहे, संघर्ष के केंद्र में यही मसला है। सऊदी अरब के नए शासक मोहम्मद बिन सलमान का उदय इसी का संकेत हैं, क्योंकि सलमान खाड़ी क्षेत्र में किसी भी कीमत पर अपना दबदबा कम नहीं होने देना चाहते और इसलिए ही उन्होंने कतर को लेकर जबर्दस्त आक्रामक रुख अख्तियार किया है। अफवाहें तो ऐसी भी चल रही हैं कि अगले कुछ महीनों में खाड़ी देशों की कमान सऊदी शासक खुद अपने हाथ में ले लेंगे। दूसरी ओर कतर अपनी ताकत बढ़ाते हुए सऊदी अरब से निपटने की कोशिश कर रहा है।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए यह सब नुकसानदायक हो सकता है। ऐसी अटकलें हैं कि अगर ये गतिरोध कुछ दिनों और ऐसे ही बना रहा तो दुनिया को तेल-गैस संकट का सामना करना पड़ सकता है और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लग सकता है। पिछले दो दशक से चले आ रहे सऊदी-कतर रिश्तों का अंत खाड़ी में एक ऐसी अस्थिरता को जन्म दे सकता है जो पूरे मध्य-पूर्व के लिए किसी भी तरह से हित में नहीं होगी। कुल मिला कर मध्य-पूर्व को इतिहास में देखें तो एक क्रोधी-उतावले तानाशाह के फैसलों से जब-जब हालात बिगड़े तो  उससे पैदा लड़ाई का कभी कोई नतीजा नहीं निकला है।

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