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नरम हिंदुत्व से कांग्रेस को नुकसान!

गुजरात के विधानसभा चुनाव ने चुनाव प्रचार का पूरा विमर्श बदला है। भारत में शायद ही कभी ऐसा हुआ है कि किसी मुख्यधारा की बड़ी पार्टी ने धर्म के आधार पर वोट मांगा हो। धार्मिक आधार पर पार्टियां जरूर बनीं हैं, लेकिन वे भी बातों का मुलम्मा चढ़ा कर वोट मांगती रही हैं। भाजपा और उससे पहले जनसंघ भी हिंदुत्व की राजनीति करती थे, लेकिन वोट इस नाम पर नहीं मांगे जाते थे। इस बार गुजरात में वह झीना सा परदा भी हट गया। भाजपा के चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि भाजपा असली हिंदुत्व की पार्टी है और कांग्रेस उसकी कमजोर नकल है। उन्होंने आगे कहा कि जब असली हिंदुत्व वाली पार्टी मौजूद है तो नकली हिंदुत्व वाली पार्टी को क्यों वोट देना! उन्होंने साफ साफ शब्दों में हिंदुत्व के नाम पर भाजपा के लिए वोट मांगे।

अब इस पर अलग से बहस हो सकती है कि जिस राज्य में भाजपा 22 साल से राज कर रही है और जिसे विकास का मॉडल बना कर पूरे देश में पेश किया गया, उस राज्य में विकास की बजाय हिंदुत्व पर वोट मांगने का क्या मतलब है? पर उससे अलग यह एक मुद्दा है कि हिंदुत्व बनाम कमजोर और नकली हिंदुत्व, जिसे सभ्य भाषा में नरम हिंदुत्व कहा जा रहा है, उसका क्या मतलब है? कांग्रेस जो राजनीति कर रही है क्या उसे नरम हिंदुत्व कह सकते हैं? क्या किसी पार्टी के नेता का मंदिर में जाना या पूजा अर्चना करना हिंदुत्व के नाम से चुनावी मुद्दा बन सकता है? अगर ऐसा है तो फिर देश के सारे नेता नरम हिंदुत्व की राजनीति करते हैं!

सेकुलर राजनीति के सबसे बड़े योद्धा लालू प्रसाद भी मंदिरों में जाते हैं और उनके यहां लगातार पूजा पाठ होता है यहां तक कि कई बार तांत्रिक गतिविधियों की भी खबरें आती हैं। मुलायम सिंह और अखिलेश यादव से लेकर कम्युनिस्ट पार्टियां भी स्थानीय स्तर पर धार्मिक गतिविधियों में शामिल होती हैं। पश्चिम बंगाल के सारे कम्युनिस्ट और तृणमूल के नेता दुर्गापूजा के मौके पर पंडालों के चक्कर लगाते हैं। इस आधार पर क्या उन सबको नरम हिंदुत्व की राजनीति करने वाला कहा जा सकता है? असल में यह एक राजनीतिक जुमला है, जो कांग्रेस की चुनावी संभावना को नुकसान पहुंचा सकता है। यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि 2002 में गुजरात में जब नरेंद्र मोदी की कमान में विधानसभा का पहला चुनाव हो रहा था, तब मध्य प्रदेश के उस समय के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को नरम हिंदुत्व की राजनीति करने की सलाह दी थी। उसी समय से कांग्रेस गुजरात की राजनीति को लेकर कंफ्यूजन में रही है। इस बार भी वह कंफ्यूजन उभर आया है। 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी को मंदिरों में दौड़ा रहे हैं। उन्होंने कोई दो दर्जन मंदिरों में माथा टेका है और इसी बीच उनके धर्म का विवाद भी उभर गया। कांग्रेस के नेता यह यह नहीं समझ रहे हैं कि उनको उस खेल में नहीं उतरना चाहिए, जिसके वे खिलाड़ी नहीं हैं। कांग्रेस ने कभी खुल कर धर्म की राजनीति नहीं की है। उसने हमेशा एक परदे की आड़ रखी। दूसरी ओर भाजपा इस खेल की माहिर खिलाड़ी है, खास कर गुजरात में, जो उसकी और संघ की प्रयोगशाला रही है। इसलिए कांग्रेस को इस खेल में उतरने से बचना चाहिए था।

वैसे भी कांग्रेस ने गुजरात में खेल का दूसरा मैदान सजाया था। उसने आरक्षण के लिए नाराज चल रहे पाटीदार नेताओं के साथ तार जोड़े थे और उनको आरक्षण का वादा किया था। उसने ओबीसी राजनीति करने वाले अल्पेश ठाकौर को पार्टी में शामिल किया था और दलित नेता जिग्नेश मेवानी का भी समर्थन लिया। इससे पहले भी गुजरात में जब कांग्रेस का खाम यानी क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम का समीकरण काम करता था तो कांग्रेस जीतती थी। यानी उसका जातीय कार्ड हमेशा चलता रहा है और इस बार भी उसने यह दांव चल दिया था। उसके खाम समीकरण में इस बार पटेल और ओबीसी भी शामिल दिख रहे थे। 

पर कांग्रेस नेता उत्तर प्रदेश में हुए ध्रुवीकरण को लेकर इतने आशंकित थे कि उन्होंने जातीय समीकरण के साथ साथ नरम हिंदुत्व का कार्ड भी चल दिया। राहुल गांधी को मंदिरों में दौड़ाया जाने लगा। इससे भाजपा को मौका मिला कि वह हिंदुत्व का कार्ड खेले। सो, उसने बहुत कायदे से हिंदुत्व का दांव खेला। कांग्रेस के नेता समझ नहीं पाए कि जब हिंदुत्व की बात होगी तो तमाम कोशिशों के बावजूद नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी का चेहरा नहीं टिकेगा। फिर भी उन्होंने हिंदुत्व के दांव पर मोदी के मुकाबले राहुल को उतारा। कांग्रेस को इसका लंबे समय में भारी नुकसान हो सकता है। उत्तर प्रदेश के स्थानीय निकाय चुनाव के नतीजों में इस नुकसान की झलक देखी जा सकती है।

गुजरात चुनाव के नतीजों पर इसका क्या असर होगा, यह नहीं कहा जा सकता है क्योंकि वहां अब भी हिंदुत्व और नरम हिंदुत्व की बहस के बीच जातीय समीकरण मजबूती से काम कर रहा है। पर इस नतीजे के बाद गुजरात के बाहर भी अगर चुनाव हिंदुत्व बनाम नरम हिंदुत्व का रहा तो क्या होगा? क्या कांग्रेस इस पर भाजपा और नरेंद्र मोदी का मुकाबला कर पाएगी? उससे भी बड़ा सवाल है कि क्या कांग्रेस इस नाम पर राजद, जदयू, बसपा, तृणमूल आदि पार्टियां, जिनके ऊपर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे हैं उनके साथ तालमेल कर पाएगी और अगर तालमेल नहीं हुआ तो फिर वह कहां टिकेगी? क्या अल्पसंख्यक उसे छोड़ कर प्रादेशिक क्षत्रपों को नहीं पकड़ेंगे, जिनके पास पहले से जातीय वोट का आधार है? अगर भारत में धर्म के नाम पर वोट पड़ रहे होते तो चुनाव लड़ने वाले सारे साधु संत जीत जाते या शिवसेना को सबसे ज्यादा सीटें आतीं और भाजपा को भी इतना संघर्ष नहीं करना पड़ता। 

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