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प्रदूषण के नाम यह कैसी दिशाहीन जंग?

अभी हाल में दीपावली पर पटाखों की ब्रिकी पर प्रतिबंध संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय सामने आया। यह फैसला केवल दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्रों तक सीमित है तथा इसकी समयसीमा भी अल्पकालिक है। प्रदूषण नियंत्रित करने की दिशा में अदालत का फैसला स्वागत योग्य है, किंतु अपने पीछे यह कई ज्वलंत प्रश्न खडे कर गया है। 

दीपावली से 10 दिन पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने गत 9 अक्टबूर को दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री और भंडारण पर रोक लगा दी। अदालत ने लोगों की सेहत और पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए नवंबर 2016 के अपने ही एक निर्देश को बरकरार रखा है। यह फैसला न्यायमूर्ति ऐके सीकरी, अभय मनोहर सप्रे और अशोक भूषण की खंडपीठ ने सुनाया है। शर्तो के साथ पटाखों की बिक्री की स्वीकृति देने वाले न्यायालय के गत 12 सितंबर के आदेश के विरुद्ध कई अर्जियां दाखिल हुईं थी, जिसमें अदालत से उस आदेश में परिवर्तन करने की मांग की गई थी। 

खंडपीठ के अनुसार, "हमें कम से कम एक दिवाली पर पटाखे मुक्त त्योहार मनाकर देखना चाहिए।" अदालत ने स्पष्ट किया है कि शर्तो के साथ दिल्ली-एनसीआर में पटाखा बिक्री की अनुमति देने वाला उनका आदेश एक नवंबर से पुन: प्रभावी होगा। 

नि:संदेह, दिवाली पर पटाखों के उपयोग से प्रदूषण का स्तर बढ़ जाता है। पर क्या केवल पटाखें ही दिल्ली में प्रदूषण बढ़ने का एकमात्र कारण है? आईआईटी कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, वाहनों से निकलने वाला धुआं दिल्ली के प्रदूषण में 25 प्रतिशत से अधिक योगदान देता है। लचर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के कारण रोजाना वाहनों की बढ़ती संख्या और सड़कों पर मीलों लंबे यातायात जाम की समस्या भी प्रदूषण को बढ़ाने में सर्वाधिक जिम्मेदार है। 

2014-15 में दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या 88 लाख थी, जो वर्तमान समय में एक करोड़ से अधिक हो गई है। इस दिशा में न्यायालय और सरकार द्वारा कालांतर में कई निर्णय भी लिए गए, किंतु सभी वाहनों पर एक साथ प्रतिबंध नहीं लगाया। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश और राजस्थान में किसानों द्वारा फसलों के अवशेष अर्थात् पराली जलाए जाने के कारण भी दिल्ली-एनसीआर की आबोहवा बिगड़ रही है। 

दमघोंटू गैस चैंबर में परिवर्तित होते हमारे पर्यावरण ने समाज के हर वर्ग को बुरी तरह प्रभावित किया है। दूषित पर्यावरण को बचाने का दायित्व भारत के सत्ता-अधिष्ठानों के साथ-साथ प्रत्येक समाज के हर व्यक्ति पर है। आज जिन कारणों से भी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र को क्षति पहुंच रही है- उसके निवारण के लिए मनुष्य को आदर्श जीवन शैली का अनुसरण और वातावरण को दूषित करने वाले सभी तत्वों को चिन्हित कर उसे नियंत्रित करना, समय की मांग बन चुके है। किंतु क्या इस संबंध हमारे समाज में निष्पक्ष विवेचना हो रही है? 

भारत विविधताओं का देश है। यहां विभिन्न मजहबों के लाखों-करोड़ों अनुयायी न केवल सभी मौलिक अधिकारों के साथ जीवन-ज्ञापन करते है, साथ ही वह अपने-अपने रीति-रिवाजों, त्योहारों, संस्कृति और परंपराओं के निर्वाहन के लिए भी स्वतंत्र है। इस सामाजिक व्यवस्था की जड़े भारत की सनातन बहुलतावादी संस्कृति से सिंचित है और हमारा संविधान इसका प्रतिबिंब। 

अक्सर देखा जाता है कि देश में जब भी दिवाली, होली आदि हिंदू पर्व निकट होते है, उस समय समाज का एक वर्ग- जो स्वयं को उदारवादी और प्रगतिवादी भी कहता है- वह पर्यावरण को क्षय, प्राकृतिक संसाधनों की कमी और मनुष्य जीवन को खतरे का हवाला देकर दीपावली पर पटाखों के धुंए, होली पर पानी की बर्बादी, जन्माष्टमी पर दही-हांडी प्रतियोगिता, गणेश चतुर्थी और दुर्गा पूजा पर मूर्ति विसर्जन आदि परंपराओं से एकाएक व्यथित हो उठता है। इन सभी त्योहारों को "इको-फ्रेंडली" रुप से मनाने पर बल देने के साथ-साथ अदालत की चौखट तक भी पहुंच जाता है। यही नहीं, इसी वर्ष जनवरी माह में दिल्ली की केजरीवाल सरकार में मंत्री इमरान हुसैन प्रदूषण रोकने के लिए हिंदुओं के अंतिम संस्कार में लकड़ियों के प्रयोग पर प्रतिबंध लगाने की अनुशंसा कर चुके हैं। 

पर्यावरण की रक्षा एक सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसमें विश्व के सभी देशों और उसमें निहित वर्गों का सहयोग व बलिदान आवश्यक है। किंतु क्या भारत जैसे विशाल देश में प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों पर केवल हिंदुओं के रीति-रिवाज और पर्व ही प्रतिकूल प्रभाव डालते है? क्या अन्य मजहबों की परंपराएं और जीवन-शैली पर्यावरण के अनुकूल है? 

वर्ष 2014-15 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम अर्थात् यू.एन.ई.पी की रिपोर्ट में बीफ (गौमांस) को पर्यावरणीय रूप से सबसे हानिकारक मांस बताया है। रोम स्थित संस्था खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार- मांस विशेषकर बीफ का सेवन करना, वैश्विक पर्यावरण के लिए सबसे अधिक खतरनाक हैं। औसतन एक साधारण बीफ-बर्गर के कारण पर्यावरण में तीन किलो विषैली गैस कार्बन का उत्सर्जन होता है। 

यू.एन.ई.पी ने एक स्वीडिश अध्ययन का उपयोग करते हुए अपनी रिपोर्ट में कहा है, ‘ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के मामले में घर में एक किलो बीफ का सेवन 160 किलोमीटर तक किसी मोटरवाहन का इस्तेमाल करने के समान है।’ इसका अर्थ यह है कि दिल्ली से अलवर जाने वाले वाहन से उतना ही कार्बन उत्सर्जन होगा, जितना कि एक किलो बीफ के सेवन से होगा। विशेषज्ञों का सुझाव है कि बीफ का सेवन छोड़ने से पृथ्वी पर वैश्विक "कार्बन फुटप्रिंट" कम होगा। यह कमी वाहनों का उपयोग छोड़ने से कार्बन अंश में आने वाली कमी से कहीं अधिक होगी। अर्थात् खतरनाक गैसों के उत्स र्जन के माध्यम से ग्लोबल वार्मिंग में जितना योगदान वाहनों का है, उससे कहीं अधिक बीफ उत्पा द का है। 

अब यदि तथाकथित पर्यावरण रक्षक दिवाली पर वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका के कारण पटाखों पर प्रतिबंध की मांग करते है, तो वही लोग भारत में बीफ (गौमांस) का सेवन छोड़ने के लिए अभियान क्यों नहीं चलाते? इस्लामी पर्व ईद-उल-अज़हा के अवसर पशुओं (गोवंश, बकरे, ऊंट) की कुर्बानी और उसके मांस के सेवन की परंपरा है। ईसाई मत में भी बीफ आदि मांस का सेवन किया जाता है। यक्ष प्रश्न है कि जो बीफ जलवायु के लिए इतना घातक है, क्या आजतक उसपर कोई प्रतिबंध लगा? 

देश में जब भी संस्कृति व आस्था के आधार पर गौवंश की हत्या और उसके मांस के उपभोग पर प्रतिबंध की मांग जाती है, तो उसे व्यक्ति के पसंदीदा भोजन करने के अधिकार पर कुठाराघात बताकर उसे तुच्छ और सांप्रदायिक मानसिकता से प्रेरित कहा जाता है। अब यदि इसी तर्क को आधार बनाया जाए, तो क्या दीपावली पर इस तरह व्यवधान को आस्था के मूलभूत अधिकारों पर चोट नहीं माना जाएगा? 

भारत सहित विश्व में ऊर्जा और विद्युत की प्रचंड खपत भी तापमान बढ़ने और भू-मंडलीय ऊष्मीकरण का कारण है। ऐसे में पर्यावरण के स्वयंभू संरक्षक देश में क्रिसमस और नववर्ष के अवसरों पर घरों, दुकानों और मॉल्स को बड़े-बड़े विद्युत उपकरणों के माध्यम से रोशनी से जगमग करने की परंपराओं के खिलाफ मुहिम क्यों नहीं चलाते? 

देश में इस विकृति का मुख्य कारण वह नीतियां और विमर्श है, जिसे सेकुलरवाद के नाम पर स्वतंत्र भारत में गत 70 वर्षों से प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसका आधार ही बहुसंख्यक हितों व अधिकारों को सांप्रदायिक घोषित कर देशविरोधी और कट्टर मजहबी मानसिकता का पोषण है। 1950 के दशक में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.नेहरु की सरकार द्वारा संसद में हिंदू कोड बिल को बहुमत के आधार पारित करवाना, इसका बड़ा उदाहरण है। 

पर्यावरण की रक्षा मानवता के हित में है और हिंदुत्व दर्शन ही प्रकृति संरक्षण का एक आदर्श प्रतिरुप है। आवश्यकता इस बात की है कि सभी शोधों की पृष्ठभूमि में समग्र त्योहारों की समीक्षा की जाए। जबतक एक विशेष समुदाय के पर्वों को निशाना बनाकर निर्णय लिए जाएंगे, तबतक समाज में इस तरह के प्रश्न खड़े होते रहेंगे।

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