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जजों की बगावत से बदलाव की उम्मीद!

अजित द्विवेदी
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सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने बागी तेवर दिखाए। चीफ जस्टिस के कामकाज को लेकर मीडिया में जाकर सवाल उठाए। पर सवाल है कि इससे क्या बदल जाएगा? शीर्ष जजों के बीच चल रही खींचतान के बीच सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने अपनी बैठक करके दो प्रस्ताव पास किए, जिसमें से एक में कहा गया कि ऐसा नियम बनना चाहिए कि हर जनहित याचिका पर सुनवाई का फैसला पांच जजों की कॉलेजियम करे। क्या इस उपाय से भविष्य में वैसे विवाद की संभावना खत्म हो जाएगी, जैसा विवाद अभी हुआ है?

अगर ऐसा होता कि पांच सर्वोच्च जजों की कॉलेजियम सारी समस्या का समाधान है तो न्यायपालिका के सामने कोई समस्या नहीं होती क्योंकि यह व्यवस्था पिछले ढाई दशक से चल रही है। 1993 में कॉलेजियम की व्यवस्था लागू होने के बाद भी जजों की नियुक्ति को लेकर अनगिनत विवाद हुए हैं। कई बड़े कानून के जानकारों ने फैसलों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए हैं। पिछले ढाई दशक में जज अपने लिखे फैसलों से ज्यादा अदालत में दिए अपने बयानों से मशहूर हुए हैं। कॉलेजियम की बैठकों में पारदर्शिता का मुद्दा इस बगावत से पहले से चल रहा है। प्रेस कांफ्रेंस का नेतृत्व करने वाले सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस जे चेलामेश्वर कॉलेजियम की बैठक का बहिष्कार भी कर चुके हैं। इससे जाहिर है कि हर मामला कॉलेजियम में भेजना किसी समस्या का समाधान नहीं है। 

असल में यह जजों की नियुक्ति और उनके कामकाज में अंतर्निहित समस्या का संकेत है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन से लेकर मौजूदा चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा तक जिस तरह के विवाद हुए हैं उनको बारीकी से देखा जाए तो उच्च और सर्वोच्च न्यायपालिका के कामकाज की कई कमियां दिखाई देंगी। भ्रष्टाचार के आरोपों से लेकर भाई भतीजावाद और राजनीतिक तरफदारी के कई किस्से सुनने को मिले हैं। देश का कोई जज और उसका परिवार भ्रष्टाचार के आरोपों के घेरे में आए या किसी जज के लिए यह सुनने को मिले कि वह किसी पार्टी का समर्थक है और उसके फैसलों पर इस बात की छाप दिखे तो निश्चित रूप से न्यायपालिका सवालों के घेरे में आती है। 

जस्टिस बालाकृष्णन से अभी तक का सफर यानी पिछले एक दशक का सफर इस ओर इशारा है कि बड़े बदलाव की जरूरत है। वह बदलाव सिर्फ कॉलेजियम की व्यवस्था बदलने से नहीं होगा। उसके लिए बड़ी पहल करनी होगी। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बना कर इसकी एक पहल की थी। लेकिन मुश्किल यह है कि सरकार जब भी इस तरह की पहल करती है तो उसका मकसद न्यायपालिका को अपने अधीन लाना होता है या उसके कामकाज में अपना दखल बढ़ाना होता है। मौजूदा सरकार ने भी इस कानून में ऐसे प्रावधान किए थे, जिससे न्यायपालिका के कामकाज में दखल बढ़ता। इस कानून के सुप्रीम कोर्ट में निरस्त हो जाने का अब भी सरकार को अफसोस है। जजों के वेतन और भत्ते बढ़ाने के बिल पर पिछले सत्र में बहस के दौरान कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बताया कि कैसे कॉलेजियम की व्यवस्था से पहले देश की सर्वोच्च न्यायपालिका ने मिसाल बनने लायक जज पैदा किए। 

सो, सर्वोच्च न्यायपालिका का विवाद सरकार को यह मौका दे रहा है कि वह उसके कामकाज में अपनी दखल बढ़ाए। इस काम में सत्तारूढ़ पार्टी को विपक्ष का सहयोग भी मिल सकता है। अगर ऐसा होता है तो सकारात्मक बदलाव की बजाय सब कुछ उलटा हो सकता है। भारत की न्यायपालिका बुनियादी रूप से स्वतंत्र व निष्पक्ष रही है और इस वजह से आम लोगों का भरोसा इसमें बना हुआ है। इसे राजनीति का हथियार बनाया गया तो इसका बड़ा नुकसान होगा। सर्वोच्च अदालत को देश की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले कई बड़े मुद्दों पर फैसला देना है। अगर उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है तो उसके फैसले भी टकराव का कारण बन सकते हैं। 

एक कहावत है कि न्याय होने के साथ साथ न्याय होते हुए दिखना भी जरूरी होता है। इसलिए सर्वोच्च अदालत के फैसलों के तटस्थ, निष्पक्ष, कानून सम्मत और स्वतंत्र हों यह जरूरी है पर अदालत का भी तटस्थ, स्वतंत्र और निष्पक्ष दिखना भी उतना ही जरूरी है। मौजूदा विवाद को राजनीतिक आधार पर जजों के विभाजन के तौर पर देखा जा रहा है। सोशल मीडिया में प्रचार हो रहा है और हैरानी की बात है कि कांग्रेस व भाजपा से जुड़े नेता या उनके समर्थक यह प्रचार कर रहे हैं कि प्रेस कांफ्रेंस करने वाले चार जज कांग्रेसी या वामपंथी हैं और चीफ जस्टिस हिंदुवादी हैं या भाजपा के हैं। जजों की दलीय प्रतिबद्धता का यह झूठा प्रचार न्यायपालिका की विश्वसनीयता के लिए बड़ा खतरा है। 

अदालत की साख और उसकी विश्वसनीयता को बचाने के लिए कुछ चीजों में बदलाव जरूरी है। अगर सब कुछ जस का तस रहा और सारे जज फिर पहले ही तरह कामकाज पर लौट गए तब भी लोगों का भरोसा टूटेगा। माना जाएगा कि अंदरखाने मिलजुल कर सब ठीक कर लिया गया। इसलिए सबसे अच्छा होगा कि संतुलन बनाने का प्रयास हो। चीफ जस्टिस मास्टर ऑफ द रोस्टर के नाते बेंच बनाने और मुकदमों के आवंटन के लिए स्वतंत्र है लेकिन उसकी स्वतंत्रता असीमित नहीं हो सकती है। उसे न्यायपालिका की उच्च परंपराओं का पालन करना होगा। इसकी एक व्यवस्था बनानी होगी, जिसमें चीफ जस्टिस की सर्वोच्चता भी बनी रहे और प्रशासनिक व्यवस्था भी बनी रहे। चार जजों ने इतना बड़ा कदम उठाया तो वह यूं ही जाया नहीं होना चाहिए। पूरी न्यायिक बिरादरी को एकजुट होकर बिना किसी बाहरी दखल के कुछ ठोस और सकारात्मक कदम उठाने होंगे।

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