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सीरिया को यह लड़ाई कहां ले जाएगी?

श्रुति व्यास
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सीरिया का मतलब है दुनिया में सभी देशों को डराने वाला गृहयुद्व। भारत में श्रीश्री रविशंकर से ले कर जम्मू-कश्मीर के लिए नियुक्त वार्ताकार सीरिया के हवाले हम नागरिकों को चौंका चूके हैंं। इसी सीरिया पर पिछले हफ्ते बीबीसी ने एक सीरिज का प्रसारण किया। शीर्षक था- ‘सीरिया द वर्ल्डर्स वार।’ मशहूर पत्रकार जो लीसे डॉश, जो सीरिया संघर्ष के शुरू से ही इसकी रिपोर्टिंग कर रहे हैं, ने स्थानीय लोगों और वैश्विक नेताओं के भीतर झांकते हुए इतिहास और वर्तमान को एक साथ रख कर यह जानने-समझने की कोशिश की कि आखिर सीरिया में हुआ क्या है? जो दिखाया गया है, वह हालांकि है तो बहुत ही शानदार, लेकिन इससे दुनिया को एक ऐसी बर्बरता भी देखने को मिली है जो हुई थी और हो रही है और जिसने सीरिया को निगल लिया है। तभी यह सवाल आखिर तक बना ही रहेगा कि सीरिया और दुनिया यहां तक कैसे पहुंच गई है और इसका अंत आखिर कहां होगा? 

दीवार पर घसीटे मार कर लिखी गई वह छोटी-सी लाइन कुल मिलाकर ज्यादा कुछ नहीं थी। मार्च, 2011 में देराआ के दक्षिणी शहर में चार बच्चे एक दीवार पर लिख देते हैं- ‘अब तुम्हारी बारी है डॉक्टर’-। आगे ब्रिटेन में एक नेत्र विशेषज्ञ के रूप में तैयार हुए और फिर स्वयंभू सुधारक बने सीरियाई राष्ट्रपति बशर अल असद को ले कर लिखा गया कि तुम्हारी सत्ता उसी तरह चली जाएंगी, जैसे ट्यूनीशिया में बेन अली की सत्ता गई, मिस्र में होस्नी मुबारक की सत्ता गई और लीबिया में कर्नल गद्दाफी की। 

वह सिर्फ दीवार पर कुछ घसीटामार लिखावट नहीं थी, बल्कि बर्बरता की शुरुआत और मानवता के खात्मे का संकेत था। 

इन चारों बच्चों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद स्थानीय लोगों ने इन्हें छुड़ाने के लिए शहर की सड़कों पर जो मुहिम चलाई, वह सिर्फ इनकी रिहाई के लिए ही नहीं थी, बल्कि असद के शासन के खात्मे के लिए हुंकारा था। जैसा कि इतिहास हमें बताता है, और भविष्य भी बताएगा कि जब एक तानाशाह को चुनौती दी जाती है, तो उसकी प्रतिक्रिया बहुत ही निर्दयी होती है। और देराआ में फिर वही हुआ। असद की फौज बंदूकों के साथ उतरी और लोगों के खात्मे में जुट गई। इस खूनखराबे में अब तक पांच लाख लोग मारे जा चुके हैं। हर जनाजे के साथ विरोध और तेज होता गया, ज्यादा लोग सड़कों पर उतरते गए और दूसरी ओर सत्ता के सैनिक और ज्यादा हिंसा करते गए। जल्द ही यह हिंसा होमस, दमिश्क और दूसरी जगहों पर फैलती गई। और वही हुआ जिसकी कि उम्मीद थी। उम्मीद यह थी कि असद को भी ठीक वैसा ही भुगतना होगा जैसा दूसरे अरब राष्ट्रों में तानाशाहों को भुगतना पड़ा।

दरअसल, बशर अल असद मध्यपूर्व के अपने समकालीनों से अलग हट कर हैं। वे अपने समकालीनों जैसे नहीं हैं। सीरिया में अरब क्रांति का आगाज नहीं हो पाने की वजहें इसके जातीय मूल में हैं। असद अलवायती समुदाय से हैं। जबकि सीरिया सुन्नी बहुल देश है और अलवायती समुदाय यहां अल्पसंख्यक है। सत्ता में अलवायती समुदाय के अलावा ईसाई और शिया मुसलमान जैसे अल्पसंख्यक समुदायों की भागीदारी भी है और एक तरह से सत्ता पर इन्हीं का कब्जा है। इसलिए ऐसे में विरोधियों यानी सुन्नियों को कुचलना असद के लिए आसान हो गया। 

सेना में इन अल्पसंख्यक समूहों की भागीदारी काफी है। इससे असद और उनकी सत्ता को काफी बल मिला। इसके अलावा असद रासायनिक बमों के इस्तेमाल का खौफ दिखाने से भी नहीं हिचके। असद और उनकी फौज से मुकाबला करने के लिए बहुत सारे गुट मैदान में आ गए। इन्हीं में से एक- फ्री सीरियन आर्मी (एफएसए) है। लेकिन एफएसए एक सच्ची लड़ाकू फौज के बजाय भाड़े की फौज निकली।  जब असद और उनकी फौज सीरिया को तबाह करने में लगी थी, तब वैश्विक सत्ता के केंद्र में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा थे। ओबामा ने समस्या से निपटने के लिए कूटनीति और प्रतिबंध जैसे हथियारों का इस्तेमाल किया। लेकिन समस्या का समाधान निकालने के बजाय कूटनीति ने हालात और जटिल बना डाले। यह कूटनीति युद्ध में तब्दील होती गई और अमेरिका व इसके सहयोगियों ने कठोर कदम उठाने शुरू कर दिए। 

वर्ष 2014 तक सीरियाई विपक्ष में जेहादी गुट उठ खड़े हुए थे। ये गुट बिना किसी बाहरी मौजूदगी के ही इतने ताकतवर होते चले गए कि राष्ट्रवादी विपक्ष के लिए भी एक तरह के हथियार बन गए। हालांकि ओबामा ने ऐसी किसी भी योजना को खारिज कर दिया था। बल्कि ओबामा ने सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण फैसला यह किया कि अमेरिका के क्षेत्रीय सहयोगियों को सीरियाई विपक्ष के हाथ मजबूत करने की इजाजत दे डाली। 

कई खाड़ी देशों से सीरिया में पैसा आ रहा था। इससे हुआ यह कि असद के खिलाफ लड़ रहे जेहादी गुट और बंटते चले गए और मजबूत बनते गए। और इस तरह 2014 के आखिर तक सीरिया जिस तरह के संकट में फंसा, आज तक उसी में फंसा पड़ा है। विद्रोहियों के खिलाफ असद की फौज ने जिस तरह रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल किया, उसके सबूत मौजूद हैं, शरणार्थियों का भागना जारी है, जेहादी गुटों को पैसा पहुंच ही रहा है, और नए लड़ाके मैदान में कूद रहे हैं। असद की सत्ता की तरफ से हेजबुल्लाह और ईरान समर्थित गुट लड़ रहे हैं, तो उत्तर-पूर्व में कुर्दिश लड़ाके जंग के मैदान में हैं और अपना अस्तित्व बचाए रखना चाहते हैं। यानी सीरिया चारों ओर से आतंकी और जेहादी गुटों से भरता चला गया है। 

यह सीरिया के जातीय संकट की कहानी है। दुनिया के ताकतवर मुल्कों का अखाड़ा है। और सबसे बड़ी और दुखद बात तो यह कि नागरिक ही इसका खमियाजा भुगत रहे हैं। सब सोच रहे होंगे, तानाशाह के हटने पर कौन इस टूटते हुए राष्ट्र की कमान संभालेगा। 

सीरिया के जंगी मैदान में अमेरिका, रूस, ईरान, तुर्की, इजराइल, कतर और दूसरे अरब राष्ट्र कूद पड़े हैं और इस लड़ाई को अपने-अपने हिसाब से चला रहे हैं, पैसे से लेकर हथियारों और बमों तक से। इसलिए सीरिया की यह लड़ाई महज अब लड़ाई नहीं रह गई है। लेकिन जैसा कि बीबीसी ने दिखाया है, यह विश्व युद्ध की शक्ल ले चुकी है। और जब मामला खासतौर से युद्ध का आता है, और वह भी तब जब गृह युद्ध विश्व युद्ध में बदलने लगे, तो इस पर पूर्णविराम लगाना बहुत ही मुश्किल हो जाता है। 

'द बैटल फॉर सीरिया : इंटनेशनल राइवलरी इन द न्यू मिडिल ईस्ट ' के लेखक क्रिस्टोफर फिलिप्स ने लिखा है- अगर आप गृह युद्धों के इतिहास पर नजर डालें तो स्पष्ट तौर पर यह देखेंगे कि इसमें ज्यादा से ज्यादा विदेशी ताकतें संलिप्त रहती हैं, और इसलिए इससे भी ज्यादा मुश्किल यह हो जाता है कि यह खत्म कैसे हो। और इस युद्ध में कोई भी तब तक नहीं निकलना चाहता जब तक कि उसे अपने हित पूरे होते दिखाई न दें।

और यह विश्व युद्ध चलता रहेगा। इसकी कीमत सीरिया की भावी पीढ़ियां ही चुकाएंगी। सीरिया से आने वाली तस्वीरें हमें डराती रहेंगी और हम इन्हें भूलते जाएंगे। सीरिया की कहानी बर्बरता और निर्दोषों की मौत की कहानी बन चुकी है। हम इस पर विलाप कर सकते हैं और ईश्वर से इसे रोकने की प्रार्थना कर सकते हैं। लेकिन लंबा वक्त गुजर चुका है। इसलिए अब इसका खात्मा जरूरी है।  

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