सत्य से साक्षात्कार का समय!

अजित द्विवेदी
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सत्य से साक्षात्कार का अलग अलग लोगों का समय अलग अलग होता है। राजकुमार सिद्धार्थ को बहुत भटकने के बाद हुआ। तब वे बुद्ध बन गए थे। राजनीति में नेताओं को जैसे ही टिकट नहीं मिलती है या मंत्री पद नहीं मिलता है, वैसे ही उनको सत्य से साक्षात्कार होने लगता है। उन्हें ऐसा साक्षात्कार जीवन काल में अनेक बार होता है। सरकारी अधिकारियों को नौकरी से रिटायर होने के बाद अक्सर सत्य से साक्षात्कार होता है। 

अभी कहा जा सकता है कि भारतीय नौकरशाही के लिए सत्य से साक्षात्कार का समय चल रहा है। अरविंद सुब्रह्मण्यम का सत्य से साक्षात्कार हुआ है, ओपी रावत का हुआ है, जस्टिस जोसेफ कुरियन का हुआ है, लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा का हुआ है। क्या यह भारत राष्ट्र राज्य के लिए अच्छा है, इसकी तारीफ करनी चाहिए या नौकरशाहों का अवसरवाद समझ कर इस पर ध्यान नहीं देना चाहिए?

जनरल डीएस हुड्डा की राहुल गांधी ने तारीफ की है। उन्होंने कहा है कि हुड्डा ने एक सच्चे सिपाही की तरह अपनी बात कही है। सवाल है कि क्या सच्चा सिपाही जंग से लौट कर आने के बाद गोलियां चलाता है? सच्चे सिपाही को तो मोर्चे पर ही लड़ना होता है। लेकिन जब मोर्चा खुला तब जनरल हुड्डा चुप थे। मोर्चा खोला था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में। सितंबर 2016 में हुए सर्जिकल स्ट्राइक को प्रधानमंत्री ने चुनावी मुद्दा बनाया। उन्होंने और उनकी पूरी पार्टी ने चुनाव प्रचार में दावा किया कि 56 इंच के सीने से सर्जिकल स्ट्राइक किया गया है और पाकिस्तान के आतंकवादी नेटवर्क की कमर तोड़ दी गई है। 

ध्यान रहे सर्जिकल स्ट्राइक के समय जनरल डीएस हुड्डा उत्तरी कमान के प्रमुख थे। तब उन्होंने एक तरह से सरकार की लाइन का समर्थन किया था। उनको पता था कि सर्जिकल स्ट्राइक पहले भी होते रहे हैं। फिर भी सितंबर 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सेना ने न सिर्फ उसके फुटेज जारी किए, बल्कि प्रेस कांफ्रेंस करके इसकी जानकारी दी। अपनी किसी ऐसी कार्रवाई के लिए, जिसे गोपनीय रखने का चलन है, प्रेस कांफ्रेंस करने का यह पहला मौका था। 

अब जबकि जनरल हुड्डा रिटायर हो गए हैं तो उन्होंने दावा किया है कि सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक माहौल बनाया गया। उन्होंने कहा है कि उसका उतना फायदा नहीं हुआ, जितना बताया गया था और यह भी कहा कि कोई भी राजनीतिक नेतृत्व सर्जिकल स्ट्राइक की योजना नहीं बना सकता है। सवाल है कि जब यह तथ्य है तो वीडियो फुटेज जारी करने या प्रेस कांफ्रेंस करने की क्या जरूरत थी? 

यह सही है कि वे सेना के अनुशासन से बंधे थे लेकिन अगर कुछ इतना बड़ा गलत हो रहा था तो क्या उन्हें सवाल नहीं उठाना चाहिए था? सेना का मामूली सिपाही खाने में दाल खराब होने की शिकायत वीडियो के जरिए कर देता है तो जनरल की क्या कोई जिम्मेदारी नहीं बनती है? आज राहुल गांधी को हुड्डा की कही बात भले अच्छी लग रही हो पर यह एक मौकापरस्त जनरल की अवसरवादी टिप्पणी से ज्यादा कुछ नहीं है। 

जनरल हुड्डा की टिप्पणी बिल्कुल वैसी ही है, जैसी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविंद सुब्रह्मण्यम की है। नोटबंदी के फैसले को सुब्रह्मण्यम बेहद क्रूर फैसला बता रहे हैं और दावा कर रहे हैं कि उससे देश की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका लगा था। उन्होंने अपनी किताब की बिक्री बढ़ाने के लिए यह बात किताब में लिखी। एक दिन की सनसनी के अलावा उनकी इस टिप्पणी का कोई मतलब नहीं है। जब यह फैसला किया जा रहा था तब वे सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार थे। उनके पास अवसर था कि वे इस ‘बेहद क्रूर और आर्थिकी को झटका देने वाले’ फैसले को रूकवा दें। या कम से कम इसका विरोध करें, इस्तीफा दे दें। उन्होंने तब कुछ नहीं, बल्कि एक क्रूर फैसले के हिस्सेदार रहे और अब उस पर सवाल उठा रहे हैं। इससे उनका अपराध क्षम्य नही हो सकता है। वे भी इस क्रूरता के बराबर के दोषी हैं। 

नोटबंदी पर ही पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत ने रिटायर होने के बाद टिप्पणी की है। वे जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त रहे तब तक ईवीएम से लेकर चुनाव प्रक्रिया में हर गड़बड़ी की विपक्षी शिकायत को खारिज करते रहे। अब रिटायर होने के बाद उनको लग रहा है कि नोटबंदी से चुनाव में काले धन का इस्तेमाल बंद नहीं हुआ था, उलटे आयोग ने नोटबंदी के बाद हुए चुनावों में ज्यादा नकदी बरामद की। सवाल है कि जब नोटबंदी का ढिंढोरा पीटा जा रहा था और उसका राजनीतिक फायदा लिया जा रहा था तब वे चुप रहे थे। अब जब चौतरफा तथ्यों से यह प्रमाणित हो गया है कि नोटबंदी बेहद बरबादी कराने वाला फैसला था तब अपनी पोजिशनिंग के लिए वे इस तरह के बयान दे रहे हैं। 

जस्टिस जोसेफ कुरियन का मामला इन सबसे थोड़ा अलग है। वे रिटायर होने से पहले भी एक छोटी मोटी क्रांति का हिस्सा बने थे। 12 जनवरी की प्रेस कांफ्रेंस में वे शामिल हुए थे। उन्होंने खुद ही कहा है कि प्रेस कांफ्रेंस का आइडिया जस्टिस चेलमेश्वर का था। पर वे इसका बने थे। इसलिए उनकी बात गंभीरता से सुनने और समझने की जरूरत है। 

उन्होंने भारतीय न्यायपालिका में राजनीतिक दखल की बात का खुलासा किया। यह बताया कि देश के सर्वोच्च जज को रिमोट कंट्रोल से चलाया जा सकता है। सत्य के साथ उनके साक्षात्कार ने एक मौका दिया है कि न्यायपालिका की गड़बड़ियों को ठीक किया जाए। राजनीतिक और न्यायिक बिरादरी दोनों अगर इससे सबक लें और लोकतंत्र को बचाने का संकल्प लें तो एक बड़ी बीमारी को ठीक किया जा सकता है।

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