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मनमोहन ने किया धर्मनिरपेक्षता का बचाव

नई दिल्ली। कांग्रेस और भाजपा दोनों के नेताओं के बार बार मंदिरों, मस्जिदों के चक्कर लगाने की मौजूदा राजनीति के बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का मौलिक स्वरूप है और इसे हर हाल में बचाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि एक संस्था के रूप में न्यायपालिका के लिए यह बेहद जरूरी है कि वह संविधान में निहित धर्मनिरपेक्षता के स्वरूप का संरक्षण करने की अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी को नजरंदाज न करे।

मनमोहन सिंह ने मंगलवार को सीपीआई की ओर से आयोजित कॉमरेड एबी वर्धन स्मृति व्याखान में कहा - संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का संरक्षण करने के मकसद को पूरा करने की मांग पहले के मुकाबले मौजूदा दौर में और भी अधिक जरूरी हो गई है। राजनीतिक विरोध और चुनावी मुकाबलों में धर्मिक तत्वों, प्रतीकों, मिथकों और पूर्वाग्रहों की मौजूदगी भी काफी अधिक बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कि सैन्य बलों को भी धार्मिक अपीलों से खुद को अछूता रखने की जरूरत है। मनमोहन सिंह ने कहा कि भारतीय सशस्त्र बल देश के शानदार धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि सशस्त्र बल खुद को सांप्रदायिक अपीलों से अछूता रखें। उन्होंने सीपीआई की ओर से धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र की रक्षा विषय पर आयोजित दूसरे एबी बर्धन व्याख्यान को संबोधित करते हुए कहा - हमें निःसंदेह यह समझना चाहिए कि अपने गणतंत्र के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को कमजोर करने कोई भी कोशिश व्यापक रूप से समान अधिकारवादी सोच को बहाल के प्रयासों को नष्ट करेगी।

मनमोहन सिंह ने बाबरी मस्जिद मामले का जिक्र करते हुए कहा कि 1990 के दशक के शुरुआती दौर में राजनीतिक दलों और राजनेताओं के बीच बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों के सह अस्तित्व को लेकर शुरू हुआ झगड़ा असंयत स्तर पर पहुंच गया। उन्होंने कहा - बाबरी मस्जिद पर राजनेताओं का झगड़े का अंत सुप्रीम कोर्ट में हुआ और जजों को संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को फिर परिभाषित कर बहाल करना पड़ा। उन्होंने बाबरी मस्जिद ध्वंस को दर्दनाक घटना बताते हुए कहा - छह दिसंबर 1992 का दिन हमारे धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र के लिए दुखदायी दिन था और इससे हमारी धर्मनिरपेक्ष प्रतिबद्धताओं को आघात पहुंचा।

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