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फर्स्ट पास्ट द पोस्ट चुनाव प्रणाली की उपयोगिता खत्म!

हैदराबाद। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी एस कृष्णमूर्ति ने कहा कि भारत में वर्तमान फर्स्ट पास्ट द पोस्ट चुनाव प्रणाली अपनी उपयोगिता पूरी कर चुकी है और उन्होंने आनुपातिक प्रतिनिधित्व या न्यूनतम वोट प्रतिशत जीतने वाले के निर्वाचन का पक्ष लिया।

फर्स्ट पास्ट द पोस्ट चुनाव प्रणाली के अनुसार हर निर्वाचन क्षेत्र में सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त से पीटीआई भाषा ने जब आनुपातिक प्रतिनिधित्व के बारे में उनकी राय पूछी तो उन्होंने कहा, यह संभव है, ऐस क्यों नहीं हो सकता? आखिरकार फिलहाज फर्स्ट पास्ट द पोस्ट चुनाव प्रणाली की जो व्यवस्था चल रही है वह अपनी उपयोगिता पूरी कर चुकी है क्योंकि महज 15 फीसदी मतदान होने पर भी महज एक वोट अधिक पाने वाला निर्वाचित हो सकता है।

उन्होंने कहा, आनुपातिक प्रतिनिधित्व या कोई अन्य तरीका यह है कि डाले गए वोटों में कम से कम 50 फीसदी मत हासिल करने वाला व्यक्ति ही निर्वाचित होगा। यह 50 फीसद सबसे अधिक आंकडा है। मैं कहूंगा कि शुर में पहले पांच सालों के लिए यह 33 फीसद या एक तिहाई होना चाहिए, केवल तभी किसी को (निर्वाचित) घोषित किया जाए ताकि वह किसी जाति, या समुदाय या भाषाई समूह का नहीं बल्कि निर्वाचन क्षेत्र का अच्छी तरह प्रतिनिधित्व करे।

चुनाव सुधार और व्यवस्था को स्वच्छ बनाने पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि फलस्तीन में 50 फीसद लोग राष्ट्रीय रप और बाकी निर्वाचन क्षेत्र के हिसाब से चुने जाते हैं। लेकिन उदाहरण के तौर पर भारत में ज्यादातर चुनाव निर्वाचन क्षेत्र के हिसाब से होते हैं जहां जाति, भाषा या समुदाय , जिससे उम्मीदवार का संबंध है, मायने करता है।

उन्होंने कहा, मान लीजिए कि यदि हर भारतीय किसी राष्ट्रीय नेता के लिए मतदान करता है तो आपके पास राष्ट्रीय आधार के कम से कम 25-30 प्रतिशत प्रतिनिधि हो सकते हैं और तब कम से कम सांसद का यह संकीर्ण दृष्टिकोण खत्म होगा। इससे लोकतंत्र की गुणवत्ता सुधरेगी।

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