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जजों ने लिखी थी चिट्ठी!

नई दिल्ली। सर्वोच्च अदालत के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ प्रेस कांफ्रेंस करके सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले चार सबसे वरिष्ठ जजों ने अपनी शिकायतें लेकर न सिर्फ चीफ जस्टिस से मुलाकात की थी, बल्कि उनको एक लंबा चौड़ा पत्र भी लिखा था। प्रेस कांफ्रेंस के दौरान यह सात पन्नों की चिट्ठी भी जारी की गई। कॉलेजियम के चार सदस्यों ने दो महीने पहले यह चिट्ठी चीफ जस्टिस को लिखी थी।

अपनी इस चिट्ठी में चार सबसे वरिष्ठ जजों ने चीफ जस्टिस के अपने को ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ कहे जाने पर भी निशाना साधा है। इसमें जजों ने लिखा है कि चीफ जस्टिस समानों में प्रथम होता है, न इससे ज्यादा और न इससे कम। गौरतलब है कि कुछ समय पहले एक मामले में चीफ जस्टिस ने खुद को मास्टर ऑफ द रोस्टर बताते हुए कहा कहा था कि किस मुकदमे की सुनवाई कौन सी बेंच करेगी यह तय करने का अधिकार सिर्फ चीफ जस्टिस को है। इसी सिलसिले में यह आरोप लगते रहे हैं कि अहम और विवादित मुद्दों को वरिष्ठ जजों की अनदेखी करके जूनियर जजों की बेंच को दिया गया है।

बहरहाल, सात पन्नों की चिट्ठी में कहा गया है - मुकदमों के लिए बेंच बनाने का अधिकार चीफ जस्टिस को अदालत के सुचारु रूप से कार्य संचालन और अनुशासन बनाए रखने के लिए है, न कि चीफ जस्टिस के अपने सहयोगी जजों पर अधिकारपूर्ण सर्वोच्चता स्थापित करने के लिए। इस प्रकार से मुख्य न्यायाधीश का पद समान स्तर के न्यायाधीशों में पहला होता है, न उससे कम और न उससे अधिक।

चार जजों ने चुनिंदा ढंग से मुकदमे सुनवाई के लिए चुनिंदा जजों को आवंटित किए जाने का आरोप लगाते हुए पत्र में कहा है कि रोस्टर तय करने के लिए परिभाषित प्रक्रिया व परंपराएं चीफ जस्टिस को दिशानिर्देशित करतीं हैं, जिनमें किस किस्म के मुकदमों की सुनवाई के लिए कितने जजों की पीठ बनाई जाए, उसकी परंपराएं भी शामिल है। जजों ने कहा है कि इन परंपराओं और नियमों की अनदेखी से न केवल अप्रिय स्थिति बनेगी, बल्कि संस्था की विश्वसनीयता प्रभावित होगी और गंभीर नतीजी होंगे।

पत्र में उन्होंने कहा कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनका देश और न्यायपालिका पर दूरगामी असर पड़े हैं। चीफ जस्टिस ने कई मुकदमों को बिना किसी तार्किक आधार पर सिर्फ अपनी पसंद के हिसाब से पीठों को आवंटित किया है। ऐसी बातों को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए। उन्होंने यह भी लिखा कि न्यायपालिका के सामने असहज स्थिति पैदा न हो, इसलिए वे अभी इसका ब्योरा नहीं दे रहे हैं लेकिन इसे समझा जाना चाहिए कि ऐसे मनमाने ढंग से काम करने से संस्था की छवि कुछ हद तक धूमिल हुई है।

जजों ने कहा है कि इस बात को बहुत गंभीर चिंता के विषय के रूप में लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि चीफ जस्टिस अन्य जजों से सलाह करके इस स्थिति को ठीक करने और उसके लिए समुचित कदम उठाने के कर्तव्य से बंधे हैं।

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