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कश्मीर के पुनर्वास कानून पर नोटिस

नई दिल्ली। जम्मू कश्मीर से जुड़े एक अहम मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। सर्वोच्च अदालत ने पूछा है कि देश के बंटवारे के समय जो लोग पाकिस्तान चले गए थे उनके वंशजों को फिर से भारत में बसने की इजाजत कैसे दी जा सकती है। गौरतलब है कि कश्मीर का पुनर्वास कानून आजादी के समय और उसके सात साल बाद तक पाकिस्तान जा चुके लोगों को राज्य में बसने की इजाजत देता है।

सर्वोच्च अदालत ने कश्मीर पैंथर पार्टी की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार से यह सवाल भी किया कि जम्मू कश्मीर में पुनर्वास के लिए अभी तक कितने लोगों ने आवेदन किया है? यह कानून 1947-1954 के बीच पाकिस्तान जा चुके लोगों को हिंदुस्तान में पुनर्वास की इजाजत देता है। याचिकाकर्ता का दावा है कि यह कानून असंवैधानिक और मनमाना है। इसके चलते राज्य की सुरक्षा को खतरा हो गया है। केंद्र सरकार ने भी याचिकाकर्ता का समर्थन किया है।

नेशनल कांफ्रेंस के वरिष्ठ नेता अब्दुल रहीम रादर की ओर से आठ मार्च, 1980 को पेश किए गए जम्मू-कश्मीर पुनर्वास विधेयक को तत्कालीन नेशनल कांफ्रेंस सरकार की ओर से केंद्र की कांग्रेस सरकार को भेजा गया था। जम्मू कश्मीर विधानमंडल के दोनों सदनों ने अप्रैल 1982 में विधेयक पारित किया था लेकिन तत्कालीन राज्यपाल बीके नेहरू ने इसे फिर से विचार के लिए वापस कर दिया था। फारूक अब्दुल्ला सरकार के दौरान इस विधेयक को दोनों सदनों से फिर पारित किया गया था और तत्कालीन राज्यपाल को अपनी सहमति देनी पड़ी थी।

उस समय के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने, हालांकि इसकी संवैधानिक वैधता के संबंध में अदालत की राय लेने के लिए राष्ट्रपति के संदर्भ के तौर पर इसे सर्वोच्च अदालत के पास भेजा था। यह मामला अदालत में करीब दो दशकों तक लंबित रहा। आखिरकार, तत्कालीन चीफ जस्टिस एसपी भरूचा के नेतृत्व में पांच सदस्यों की संवैधानिक खंडपीठ ने इसे आठ नवंबर, 2001 को बिना जवाब दिए वापस कर दिया था। इसके बाद जम्मू कश्मीर की पैंथर्स पार्टी ने सर्वोच्च अदालत में इस कानून को चुनौती दी है।

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